नासा का दावा, पूरे चांद पर कब्जा करना चाहता है चीन, जानिए क्या सच में ऐसा हो सकता है
नई दिल्ली, 04 जुलाई। चीन अपनी विस्तारवादी नीतियों के लिए जाना जाता है। चीन तिब्बत, ताइवान, दक्षिण चीन सागर सहित कई क्षेत्रों पर अपनी दावेदारी ठोकता है तो। चीन की इस विस्तारवादी नीति के चलते दक्षिण-पूर्व एशिया के क्षेत्र में तनाव हमेशा बना रहता है। कई देशों के साथ चीन का टकराव इस विस्तारवादी नीति की वजह से चल रहा है। धरती परअपनी इस विस्तारवादी नीति के बाद अब चीन चांद पर भी अपनी दावेदारी ठोक रहा है। जी हां,नासा के एक शीर्ष अधिकारी बिल नेल्सन ने कहा है कि चीन पूरे चांद पर अपनी दावेदारी ठोक सकता है और यह दावा कर सकता है कि यह उसका सैन्य स्पेस ऑपरेशन का हिस्सा है।

चीन ने बयान को बताया काल्पनिक
फिलहाल ऐसा माना जाता है कि चांद पूरी दुनिया का हिस्सा है, ऐसे में जिस तरह से नासा के अधिकारी ने यह दावा किया है कि चीन चांद पर दावा कर सकता है उसके बाद कई गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। हालांकि नासा के अधिकारी बिल नेल्सन के बयान पर चीन ने पलटवार किया है। चीन की ओर से कहा गया है कि नेल्सन ने यह काल्पनिक बयान दिया है और वह जानबूझकर चीन को बदनाम करने की कोशिश कर रहे हैं।

आरोप से इनकार नहीं कर रहा चीन
लेकिन दिलचस्प बात यह है कि चीन ने कभी भी इस बयान को खारिज नहीं किया कि वह भविष्य में पूरे चीन पर अपना दावा कर सकता है। चीन ने अमेरिका, नासा पर निशाना साधते हुए कहा कि आपको शीतयुद्ध वाली मानसिकता से बाहर आना चाहिए और चीन को बदनाम नहीं करना चाहिए। लेकिन चीन की ओर से यह स्पष्ट तौर पर बिल्कुल नहीं कहा कहम कभी भी चांद पर अपनी दावेदारी नहीं करेंगे। ऐसे में क्या सच में चीन चांद पर कब्जा कर सकता है और इसके लिए वह किस रणनीति को अपना सकता है।

उपनिवेशी मानसिकता
मानवीय सभ्यता के इतिहास की बात करें तो जब भी मानव सभ्यता का विकास होता है तो वह आस-पास के इलाकों में अपना विस्तार करती है। मानवीय सभ्यता के इतिहास पर नजर डालें तो जब भी वह अपना विस्तार करती है तो आस-पास के इलाकों को अपना उपनिवेश बनाती है और फिर यहां के संशाधनों का दुरुपयोग किया जाता है। भारतकी बात करें तो यहां अंग्रेजों ने 200 साल तक शासन किया और भारत के संशाधनों को लूटा।

चांद बना प्रतिष्ठा का विषय
इंटरनेशनल स्पेस लॉ के अनुसार चांद पर उपनिवेश स्थापित करना गैरकानूनी है। कोई भी एक देश यह दावा नहीं कर सकता है कि चांद उसका है। लेकिन चांद पर अमेरिका और चीन की प्रतिस्पर्धा चल रही है। दोनों देशों के बीच मिशन चांद प्रतिष्ठा का विषय बना हुआ है। चांद पर खनन को लेकर आने वाले समय में दोनों देशों के बीच टकराव की स्थिति पैदा हो सकती है। संभव है कि आने वाले समय में दोनों देशों के बीच इसको लेकर टकराव देखने को मिले। लेकिन यहां गौर करने वाली बात यह है कि चांद को लेकर सिर्फ अमेरिका और चीन के बीच ही टकराव नहीं चल रहा है

चीन-रूस के बीच समझौता
चीन ने हाल ही में रूस के साथ स्पेस प्रोग्राम समझौता किया है, जिसके तहत दोनों देशों की योजना है कि वह चांद पर एक बेस बनाएंगे। चीन-रूस की योजना है कि 2036 तक दोनों देशों का अपना एक बेस होना चाहिए जहां पर दोनों देशों के नागरिक रहेंगे। ऐसे में उस वक्त सीमा के बंटवारे का सवाल खड़ा होगा। 2036 के बाद चीन-रूस की योजना है कि यहां पर दोनों देशों के एस्ट्रोनॉट रहेंगे।

क्या चीन चांद पर अधिकार हासिल कर सकता है?
ऐसे में अगर चीन-रूस को एक या दो साल के लिए अमेरिका से ज्यादा इस मिशन में सफलता मिलती और किसी वजह से अमेरिका का आर्टेमिस प्रोग्राम फेल हुआ तो चीन और रूस के पास जरूर यह मौका होगा कि वह पूरे चांद पर अपना दावा ठोक सकता है। यहां गौर करने वाली बात है कि चीन का मून मिशन सैन्य मिशन है, जबकि अमेरिका का अर्टेमिस मिशन सैन्य मिशन नहीं है, इसमे कई देश मिलकर काम कर रहे हैं।

क्या कहना है चीन का
अमेरिका ने आरोप लगाया है कि चीन अपने मून मिशन के नतीजों को साझा नहीं करता है। चीन यह नहीं चाहता है कि मून मिशन में वह जो भी उपलब्धि हासिल कर रहा है वह लोगों को पता चले। वहीं चीन का कहना है कि हम दो बार यूएन में 2008 और 2014 में अंतरिक्ष का सैन्यीकरण ना हो इसको लेकर प्रस्ताव ला चुके हैं लेकिन अमेरिका ने इसमे साथ नहीं दिया,लिहाजा अमेरिका खुद भविष्य में इस तरह की योजना को आगे बढा सकता है। अगर अमेरिका यह कह दे कि वह स्पेस में कभी हथियार का इस्तेमाल नहीं करेगा तो विवाद खत्म हो सकता है लेकिन अमेरिका ऐसा करने को तैयार नहीं है।












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