चीन की सरकारी कंपनी ने ऑस्ट्रेलिया की नदी पर किया कब्जा, ढीले कानून का उठाया फायदा
नई दिल्ली- चीन की एक सरकारी कंपनी ने ऑस्ट्रेलिया के एक बड़े जल क्षेत्र को खरीद लिया है। चीन ने जिस इलाके में अपनी सरकारी कंपनी के जरिए ऑस्ट्रेलिया में निवेश किया है, वह दो साल से भयंकर सूखे की चपेट में है, लेकिन वही इलाका ऑस्ट्रेलिया में 60 फीसदी अनाज का उत्पादन भी करता है और डेयरी उत्पादन भी वहीं ज्यादा होता है। अब ऑस्ट्रेलिया के लोगों के होश उड़े हुए हैं कि अगर चीनी कंपनी ने वहां के पानी को बेचना शुरू किया तो देश पर भारी आफत आ सकती है। हालांकि, ऑस्ट्रेलिया सरकार फिलहाल इस मामले को ज्यादा तूल देने के पक्ष में नहीं है और कोरोना के नाम पर अपनी चूक को शायद दबाने की कोशिश में है। लेकिन, ऑस्ट्रेलिया के लोगों को डर है कि कंपनी तो आखिर चीनी वामपंथियों की है, जो आगे चलकर क्या चालबाजियां करेगी भनक लग पाना भी मुश्किल है।

अब ऑस्ट्रेलिया को पानी के लिए मोहताज करेगा चीन!
चीन की एक बड़ी सरकारी कृषि कंपनी कोफ्को कॉर्पोरेशन से जुड़ी एक कंपनी ने ऑस्ट्रेलिया के उत्तरी साउथ वेल्स स्थित Gwydir रिवर सिस्टम की मरी-डार्लिंग बेसिन के 7,000 मेगा लीटर जल क्षेत्र को खरीद लिया है। चीन के लिए ऐसा करना इसलिए आसान हुआ है, क्योंकि ऑस्ट्रेलिया ने विदेशी कंपनियों के लिए 2014 में ही पानी खरीदने और बेचने की अनुमति दे दी थी। लेकिन, ऑस्ट्रेलिया के पूर्व फेडरल पुलिस कमिश्नर और मौजूदा इंस्पेक्टर जनरल माइक कील्टी के मुताबिक चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की स्वामित्व वाली कंपनी का उसके संसाधनों पर कब्जा करने से वहां के लिए बहुत ही परेशान हो गए हैं। क्योंकि, इस तरीके से तो उनके मूल संसाधनों पर ही धावा बोल दिया गया है। उनका कहना है कि, 'समाज में कई लोग कह रहे हैं कि उन लोगों को पानी का मालिकाना हक क्यों मिलना चाहिए, जिनकी कृषि में रूचि नहीं है।'

ऑस्ट्रेलिया की सरकार को चीन ने लगाया चूना ?
सबसे बड़ी बात है कि ऑस्ट्रेलिया का साउथ वेल्स इलाका पहले से ही पानी की किल्लत झेल रहा है। मरी-डार्लिंग अथॉरिटी के मुताबिक यह इलाका पिछले दो वर्षों से भयंकर सूखे की चपेट में है। अभी तक यह साफ नहीं हो पाया है कि कम्युनिस्ट पार्टी की कोफ्को कॉर्पोरेशन की कंपनी यूनीबेल (Unibale) यहां के पानी का क्या इस्तेमाल करने वाली है। हालांकि, कील्टी का कहना है कि विदेशी कंपनियों के लिए यह घोषित करना जरूरी है कि उनकी इच्छा क्या है, लेकिन वास्तव में उसने क्या बताया है, इसकी जानकारी सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध नहीं हो पाई है। दरअसल, सरकार पानी की खरीद-बिक्री को उसी तरह से नहीं देखती, जैसे कि सोना या बाकी मिनरल्स के मामले में होता है और इसी कारण ने ऑस्ट्रेलिया के लोगों को चिंतित कर दिया है। मरी-डार्लिंग बेसिन के किसान इसलिए और ज्यादा चिंतित हो गए हैं, क्योंकि वहां की सरकार का कहना है कि कोरोना वायरस महामारी के दौरान जितने भी विदेशी कंपनियों ने संपत्ति खरीदीहै वह सबकी समीक्षा करेगी। यानि, चीनी सरकारी कंपनी के साथ डील के दौरान ऑस्ट्रेलिया के लोगों के हितों की कहीं अनदेखी तो नहीं हो गई?

ऑस्ट्रेलिया के अनाज के कटोरे पर चीन का ग्रहण
ऑस्ट्रेलिया में पानी की अहमियत पर चर्चा तब शुरू हुई, जब कोरोना वायरस महामारी के दौरान पानी की सप्लाई के कुप्रबंधन से ये खुलासा हुआ कि जल्द ही इस देश में चावल खत्म हो जाने वाला है। बता दें कि मरी बेसिन का दक्षिणी इलाका, जो ऑस्ट्रेलिया के पूरे दक्षिण-पूर्वी प्रातों तक फैला हुआ है, वहां ऑस्ट्रेलिया का 60 फीसदी अनाज और डेयरी पदार्थों का उत्पादन होता है। आमतौर पर इस इलाके को 'ऑस्ट्रेलिया के अनाज का कटोरा' कहते हैं। पिछले दो वर्षों से जारी सूखे की वजह से यहां धान और डेयरी उत्पादों का उत्पादन नहीं हो पा रहा है। मरी-डार्लिंग बेसिन अथॉरिटी की एक पूर्व कर्मचारी मिसेज स्लैटरी के अनुसार 'निश्चित रूप से चावल के लिए बड़ा जोखिम है, क्योंकि हम यहां के पानी का इस्तेमाल नहीं कर पा रहे है, जो कि हमें चावल के उत्पादन के लिए ही मिला हुआ है।'

खाद्य सुरक्षा की समस्या की बात झूठ- एमडीबी अथॉरिटी
हालांकि, मरी-डार्लिंग बेसिन अथॉरिटी ने अनाज संकट को लेकर कही जा रही बातों पर जोरदार पलटवार किया है। इसका कहना है, 'हमारी खाद्य सुरक्षा के साथ कोई समस्या नहीं है और यह निहित स्वार्थी तत्वों द्वारा शरारतपूर्ण और भ्रामक प्रचार है, ताकि कोविड-19 के बहाने पक्षपातपूर्ण और गलत स्थिति की जानकारी फैलाई जा सके। '(तस्वीरें सौजन्य-सोशल मीडिया)












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