यूक्रेन में जंग से चीन को नुक़सान या फ़ायदा
फ़रवरी से शुरू हुए यूक्रेन संकट में अमेरिका-ब्रिटेन, यूरोपीय संघ और रूस की भूमिका क्या रहेगी इसका जवाब सभी के पास था.
लेकिन दूसरे विश्व युद्ध के बाद की सबसे बड़ी और लंबी कहे जानी वाले युक्रेन-रूस की जंग में 'चाइनीज़ ड्रैगन' किस करवट बैठेगा, इस पर सिर्फ़ क़यास ही थे.
जंग शुरू होते ही चीन ने रुख़ साफ़ कर दिया - किसी का साथ न देने का.
ज़ाहिर है, फ़ैसला मुश्किल था क्योंकि चीन के लिए रूस और यूक्रेन दोनों ही विदेश नीति में अपनी-अपनी जगह रखते हैं.
पहले बात चीन और यूक्रेन की.
यूक्रेन में बढ़ता चीनी निवेश
यूक्रेन में चीन के सामरिक हितों की ख़ास वजह है, उसकी बेहतरीन लोकेशन और यूरोपीय संघ के साथ यूक्रेन का फ़्री-ट्रेड समझौता. इन दोनों मुद्दों पर ही आधारित है, चीन को यूक्रेन से मिलने वाला खनिज और कृषि उत्पाद.
पिछले एक दशक के दौरान यूक्रेन में चीनी निवेश बढ़ता गया है.
सिलसिले की असल शुरुआत हुई थी 2013 में जब यूक्रेन के तत्कालीन राष्ट्रपति विक्टर यानकोविच चीन के लंबे दौरे पर आए थे और कई समझौतों को शक्ल दी गई. नतीजा साफ़ दिखा.
2019 में चीन रूस को पछाड़ते हुए यूक्रेन का सबसे बड़ा ट्रेडिंग पार्टनर बन चुका था और 2021 आते-आते दोनों देशों में 19 अरब अमेरिकी डॉलर के आपसी व्यापार का मतलब था साल 2013 की तुलना में पूरे 80% का इज़ाफ़ा.
अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर गहरी रिसर्च करने वाले अमेरिका के ब्रुकिंग्स इंस्टिट्यूट के डेरिक पाल्मर का मत है कि "निश्चित रूप से चीन को यूक्रेन में एक बहुत बड़ा बाज़ार मिल गया था क्योंकि यूक्रेन में चीन से सालाना 10 अरब डॉलर की हेवी मशीनरी और उपभोगता वस्तुएँ जा रही थीं. चीन की नज़र यूक्रेन के तकनीक बाज़ार पर भी थी जो अब एकाएक ठहर गई है".
डेरिक पाल्मर को लगता है, "बहुतों को नहीं पता कि चीन में आयरन ओर की डिमांड बढ़ती जा रही है क्योंकि शहरों-इंडस्ट्रीज़ के विकास के लिए स्टील चाहिए. अब चीन का आयरन ओर न अच्छी क्वॉलिटी का है और न ही उसकी खानों में ज़्यादा मौजूद हैं. तो चीन ऑस्ट्रेलिया और ब्राज़ील के अलावा यूक्रेन से भी इसे ख़रीद रहा था. अब उस झटके से उबरने के लिए नए बाज़ार तलाशने होंगे".
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चीन ने की अपील
यूक्रेन में बिगड़ते हालातों के मद्देनज़र चीन ने दोनों मुल्कों से संयम बरतने और झगड़े को बातचीत से सुलझाने की लगातार अपील की है.
यूनिवर्सिटी ऑफ़ न्यू साउथ वेल्स के प्रोफ़ेसर एलेक्जांडर कुरलेव ने हाल ही में "यूक्रेन में जंग के लिए चीन पुतिन की निंदा क्यों नहीं कर रहा है" टाइटल से रिसर्च पेपर लिखा है, जिसमें उन्होंने, "चीन की मॉस्को से दूरी न बनाने को एक ग़लत रणनीति क़रार दिया है".
उनके मुताबिक़, "रूस ने चीन को जंग शुरू करने से पहले उसकी जानकारी दी थी या नहीं, ये तय है कि बीजिंग को इस बात का आभास नहीं था कि यूक्रेन पर हमला इतना लंबा और भयावह तरीक़े से चलेगा. फिर भी चीन रूस की कार्रवाई को ग़लत नहीं ठहराएगा क्योंकि उसे पता है कि पिछले एक दशक से अमेरिका चीन की बढ़ती ताक़त को रोकने में लगा हुआ है. दूसरी बात ये कि बीजिंग भारत के रूस के प्रति नरम रुख़ पर भी नज़र बनाए हुए है".
हक़ीक़त ये भी है कि यूक्रेन संकट के चलते चीन यूरोपीय संघ में निवेश और कनेक्टिविटी से जुड़ी चुनौतियों से भी जूझ रहा है.
पिछले कुछ सालों में बेल्ट एंड रोड इनीशिएटिव (BRI) के तहत चीन और यूक्रेन में नज़दीकियाँ बढ़ीं थीं, जिससे व्यापार की क़ीमत कम हुई थी और मात्रा बढ़ी थी.
यूक्रेन वैसे भी चीन-यूरोप रेलवे एक्सप्रेस सर्विस का एक स्टॉप है और यूरोपीय संघ के बाज़ारों में 'मेड इन चाइना' के बढ़ते साम्राज्य में इसकी भी एक भूमिका रही है, जो युद्ध से बाधित चल रही है.
चीन पिछले कुछ वर्षों में यूक्रेन से हथियार और सैन्य तकनीक के क्षेत्र में साझेदारी बढ़ा रहा था जो अब निश्चित रूप से थम जाएगा.
नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ़ सिंगापुर में एशियन स्टडीज़ के प्रोफ़ेसर कांति बाजपेयी को लगता है कि, "चीन अपनी विदेश नीति और देश के भीतर के आर्थिक विकास को साथ लेकर ही चलता है. इसमें सबसे ज़रूरी है प्रोडक्शन सप्लाई चेन का बाधित न होना और यही निर्धारित करता है कि उसका निर्यात किस क्षेत्र में कितनी मात्रा में बढ़ेगा. यूक्रेन से आयात पहले बहुत अहम थे. अब विकल्पों की तेज तलाश जारी रहेगी".
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क्या हैं फ़ायदे
अगर आर्थिक मसलों को थोड़ी देर के लिए चीन की भू-राजनैतिक रणनीति से हटा कर देखा जाए तो चीन को फ़ायदे की उम्मीद हो सकती है.
रूस के यूक्रेन के साथ उलझे रहने के बीच अमेरिका के साथ चीन की होड़ अब ज़्यादा बड़ी और व्यापक दिख रही है, जिसमें वही दो बड़े प्लेयर्स हैं.
इस पहलू में भी चीन की साख बढ़ी ही है क्योंकि जानकारों का मानना है कि यूक्रेन ने अमेरिका और नेटो से मशवरा करने के बाद रूस से लोहा लेने की ठानी.
जबकि दूसरी तरफ़ जंग के चलते पश्चिमी देशों द्वारा रूस पर लगी व्यापक आर्थिक पाबंदियाँ गहराती जाएंगी और रूस आर्थिक तौर पर पहले से ज़्यादा कमज़ोर पड़ेगा.
दिल्ली में फ़ोर स्कूल ऑफ़ मैनेजमेंट में चीन मामलों के विशेषज्ञ डॉक्टर फ़ैसल अहमद कहते हैं कि, "यूक्रेन जंग के चलते चाइना का प्रकोप इंडो-पैसिफ़िक रीजन से और आगे बढ़ेगा और वे मज़बूत होंगे. अफ़ग़ानिस्तान और इराक़ में अमेरिकी फ़ौजों के लड़ाई छोड़ने के फ़ैसलों के बाद कई ऐसे देश हैं जो चीन की तरफ़ सुरक्षा के अरमानों से देखेंगे".
दिलचस्प ये भी है कि कोविड महामारी के दौरान चीन के ख़िलाफ़ जो "वैश्विक ग़ुस्से" से सामना करना पड़ा था वो अब दुनिया भर में तेज़ होती चीनी साख में तब्दील हो सकती है. व्यापार, ग्लोबल गवर्नेंस, कनेक्टिविटी इसका आधार हैं और ग्लोबल सुरक्षा का इसमें प्रमुख योगदान रहने की उम्मीद है.
फ़ैसल अहमद के मुताबिक़, "हाल ही में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने एक 'ग्लोबल सिक्योरिटी इनीशिएटिव' का प्रारूप बनाने की बात कही है जो शीत युद्ध (कोल्ड वॉर) मानसिकता को ख़त्म करने पर आधारित है. ज़ाहिर है इस तरह की शिरकत में कई नए देश भी शामिल होना चाहेंगे".
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