ट्रंप-जिनपिंग की मीटिंग से पहले अपने प्रोजेक्‍ट में भारत को शामिल करने के लिए क्‍यों बेचैन चीन

मई में होने वाली है वन बेल्‍ट वन रोड (ओबीओआर) पर एक इंटरनेशनल कांफ्रेंस और भारत को हिस्‍सा बनने के लिए बेकरार हो रहा है। चीन की ओर से भारत पर इसमें शामिल होने के लिए डाला जा रहा है दबाव।

बीजिंग। अगले हफ्ते अमेरिका में राष्‍ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रंप और चीन के राष्‍ट्रपति शी जिनपिंग की पहली मुलाकात होने वाली है। इससे पहले चीन की ओर से वन बेल्‍ट वन रोड (ओबीओआर) से जुड़ी एक इंटरनेशनल कांफ्रेंस का ऐलान कर दिया गया है। अब चीन, भारत पर दबाव डाल रहा है कि वह भी इस कांफ्रेंस का हिस्‍सा बने। टाइम्‍स ऑफ इंडिया की ओर से दी गई जानकारी के मुताबिक चीन को यह अहसास हो गया है कि वह चीन पाकिस्‍तान आर्थिक गलियारा (सीपीईसी) के जरिए इस विचार को सफल नहीं बना पाएगा।

क्‍या है ओबीआर

क्‍या है ओबीआर

ओबीआर राष्‍ट्रपति जिनपिंग का फेवरिट प्रोजेक्‍ट है। ओबीओआर एक ऐसा प्रोग्राम है जिसके तहत रोड, रेल और बंदरगाह के इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर को शामिल किया जाएगा। यह प्रोग्राम चीन को दुनिया के कई हिस्‍सों से जोड़ेगा। पिछले कुछ दिनों से चीन के अधिकारियों और विशेषज्ञों की ओर से लगातार ऐसी टिप्‍पणियां आ रही हैं जिनसे साफ होता है कि चीन किस हद तक भारत को इस कांफ्रेंस में शामिल करना चाहता है।

रूस का नाम लेकर धमकाने की कोशिश

रूस का नाम लेकर धमकाने की कोशिश

चीन के एक विशेषज्ञ ने तो ओबीओर प्रोग्राम पर भारत के नजरिए को पक्षपाती तक करार दे दिया है। लिन मिनवांग जो कि शंघाई के फुदान यूनिवर्सिटी में इंटरनेशनल स्‍टडीज के विशेषज्ञ हैं, उन्‍होंने भारत को रूस का नाम लेकर शर्मसार तक करने की कोशिश की है। उन्‍होंने कहा, 'भारत को शर्मनाक स्थिति का सामना करना पड़ सकता है क्‍योंकि रूस ने ओबीओर पर सक्रियता से प्रतिक्रिया दी है और वह चीन और मंगोलिया के साथ एक इकोनॉमिक कॉरिडोर बनाएगा।'

रूस है खामोश

रूस है खामोश

लिन ने आगे कहा कि इस वर्ष की शुरुआत में ही ऐसी रिपोर्ट्स थीं जिनमें रूस और ईरान के सीपीईसी का हिस्‍सा बनने की बातें थीं, इस वजह से भारत और भी ज्‍यादा असहज स्थिति में आ गया है। हालांकि रूस की ओर से अभी तक ऐसे किसी भी कार्यक्रम का ऐलान नहीं किया गया जो ओबीओआर से जुड़ा हो सिवाय कुछ बयान देने के।

20 देशों की उम्‍मीद में चीन

20 देशों की उम्‍मीद में चीन

चीन को उम्‍मीद है कि कम से कम 20 देशों के मुखिया इस इंटरनेशनल कांफ्रेंस का हिस्‍सा बनेंगे। चीन, यूरोप और एशिया की सरकारों को इस कांफ्रेंस में आने के लिए राजी करने की कोशिशें कर रहा है। लेकिन वह भारत को इस कांफ्रेंस में शामिल करने के लिए काफी बेकरार है क्‍योंकि उसका मानना है कि भारत का शामिल होना इस प्रोग्राम को दक्षिण एशियाई देशों के लिए और भी आकर्षक बना सकता है।

 भारत के रवैये से चीन को दर्द

भारत के रवैये से चीन को दर्द

चीन के लिए भारत की नजरअंदाजगी इसलिए भी और भी ज्‍यादा कष्‍ट देने वाली है क्‍योंकि भारत के रुख की वजह से चीन, ओबीओर को नेपाल, बांग्‍लादेश, श्रीलंका और म्‍यामांर तक नहीं बढ़ा सकता है। वहीं लिन इस बात को यह कहकर टाल गए कि इन देशों ने इस प्रोग्राम में शामिल होने की रुचि दिखाई है।

भारत के साथ चाहिए एक ग्रैंड प्रोजेक्‍ट

भारत के साथ चाहिए एक ग्रैंड प्रोजेक्‍ट

लिन ने कहा कि चीन ने कई मौकों पर इस बात को लेकर इच्‍छा जाहिर की है कि वह भारत को अपने ग्रैंड प्रोजेक्‍ट में शामिल करना चाहता है जहां पर चीन, भारत, श्रीलंका, नेपाल, बांग्‍लादेश और म्‍यांमार को शामिल कर एक इकोनॉमिक कॉरीडोर तैयार करना चाहता है।

कश्‍मीर की वजह से भारत को आपत्ति

कश्‍मीर की वजह से भारत को आपत्ति

भारत को ओबीआर को लेकर अगर कोई आपत्ति है तो उसकी वजह से है चीन के इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर प्रोजेक्‍ट्स का पीओके से होकर गुजरना। भारत का कहना है कि इसी वजह से ओबीआर और सीपीईसी भारत के हितों को नुकसान पहुंचा रहे हैं और भारत हरगिज अपने हितों को किनारे नहीं करेगा। लिन ने भारत की ओर से इस चिंता को सिर्फ एक बहाना करार दिया है।

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