BRICS में चीन-पाकिस्तान बनाम हिन्दुस्तान... डेवलपमेंट नहीं, गुटबाजी का नया अड्डा बन गया है ब्रिक्स?

BRICS News: इस महीने 22 से 24 तारीख के बीच होने वाले ब्रिक्स देशों के सम्मेलन में शामिल होने के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी दक्षिण अफ्रीका की यात्रा करेंगे, लेकिन उससे पहले ब्रिक्स को लेकर कई मतभेद सामने आ रहे हैं। सबसे बड़ा मतभेद ब्रिक्स के विस्तार को लेकर है, जहां पाकिस्तान का आरोप है, कि भारत की वजह से उसे ब्रिक्स का सदस्य नहीं बनने दिया जा रहा है।

भारत लगातार ब्रिक्स के विस्तार का विरोध कर रहा है, जबकि चीन एससीओ के साथ साथ ब्रिक्स का विस्तार चाहता है, ताकि इन दो समूहों के जरिए उसकी शक्ति और प्रभुत्व का विस्तार हो। ब्रिक्स, जिसमें ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका हैं, उसमें शामिल होने के लिए इस बार बेलारूस ने आवेदन दिया है, लिहाजा पाकिस्तान, भारत की तरफ देख रहा है, कि बेलारूस को लेकर भारत क्या फैसला लेता है।

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भारत पर पाकिस्तान के आरोप क्या हैं?

चीन और पाकिस्तान का आरोप है, कि ब्रिक्स के अंदर भारत, पश्चिमी देशों के प्रभाव में काम कर रहा है। ब्रिक्स के अंदर खेमेबाजी हो चुकी है, क्योंकि हर राष्ट्र के अपने अलग अलग विदेशी हित हैं।

आरआईए नोवोस्ती की एक रिपोर्ट के मुताबिक, बेलारूस ने मई में "पारंपरिक भागीदारों और मैत्रीपूर्ण राज्यों के साथ बहुपक्षीय प्रारूपों में सहयोग का विस्तार करने के लिए एक तार्किक फैसला" लेते हुए ब्रिक्स में शामिल होने के लिए आवेदन किया है। इस साल एससीओ में भी बेलारूस की सदस्यता पर मुहर लगी है।

इस बीच, जून के अंत में, पाकिस्तान ने भारत पर ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के एक अतिरिक्त कार्यक्रम में उसकी भागीदारी को रोककर, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसे अलग-थलग करने की कोशिश करने का आरोप लगाया।

इस्लामाबाद और अन्य देश मानते हैं, कि नई दिल्ली पश्चिम की तरफ अपने "झुकाव" के कारण विकासशील देशों के हितों को आगे बढ़ाने में पूरी तरह से निवेश नहीं कर रहा है।

हालांकि, भारत की विदेश नीति पर किसी का भी प्रभाव नहीं है और भारत रूस पर प्रतिबंधों के साथ साथ, यूक्रेन में युद्ध पर जी7 (अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान और कनाडा) के फैसलों से असहमत रहता है और मॉस्को के साथ अपने पारंपरिक संबंधों की सख्ती से रक्षा करता है।

हालांकि, ऑब्जर्वर्स का कहना है, कि भारत, इस्लामाबाद-बीजिंग की मेल मिलाप को देखते हुए, ब्रिक्स को अड्डेबाजी और गैंगबाजी में नहीं बदलना चाहता है, इसलिए भारत, पाकिस्तान के ब्रिक्स में शामिल होने की मांग को खारिज कर देता है। इससे स्वाभाविक रूप से वाशिंगटन को लाभ होता है, जिसके इन देशों के साथ जटिल और तनावपूर्ण संबंध रहे हैं, और जो चीन के साथ एक भयंकर रणनीतिक प्रतिद्वंद्विता में उलझा हुआ है।

ब्रिक्स, जिसे कभी ढीला संगठन माना जाता था, वो अब काफी मजबूत हो चुका है और ये ग्रुप, दुनिया की 43 प्रतिशत आबादी, 26 प्रतिशत भूमि क्षेत्र और वैश्विक अर्थव्यवस्था का लगभग 30 प्रतिशत प्रतिनिधित्व करता है।

इस महीने जोहान्सबर्ग में होने वाले ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में, ब्लॉक में शामिल होने के दावेदारों में अर्जेंटीना, मिस्र, इंडोनेशिया, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, अल्जीरिया, बांग्लादेश और ईरान शामिल हैं और इन सभी देशों पर चीन का असर है।

क्या हो पाएगा ब्रिक्स का विस्तार?

साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट (एससीएमपी) की एक रिपोर्ट के मुताबिक, चीन नए सदस्यों को शामिल करने पर काम शुरू करने की योजना बना रहा था। हालांकि, भारतीय विदेश मंत्री सुब्रह्मण्यम जयशंकर ने पिछले महीने कहा था, कि विस्तार की प्रक्रिया पर काम अभी 'वर्क इन प्रोग्रेस' मोड में है।

जयशंकर ने नए सदस्यों को शामिल करने के लिए मानकों, मानदंडों और प्रक्रियाओं पर विचार-विमर्श करने की आवश्यकता का हवाला दिया है।

हालांकि, रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि भारत इस गुट के विस्तार का विरोध करने वाला अकेला देश नहीं है, भारत विशेष रूप से इस योजना से "सतर्क" है।

साउथ चायना मॉर्निंग पोस्ट (एससीएमपी) ने हार्वर्ड विश्वविद्यालय के कला और विज्ञान संकाय के एक साथी अनु अनवर के हवाले से कहा, कि पश्चिम की ओर भारत का हालिया झुकाव यह सुझाव देता है, कि यह ब्रिक्स में एक "बाहरी" है, और इसीलिए ब्रिक्स ब्लॉक का विस्तार करने की मांग हो रही है।

आपको बता दें, कि हाल के दिनों में, दिल्ली ने अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया और यूरोपीय संघ के साथ रक्षा और तकनीकी सहयोग को मजबूत किया है और क्वाड सुरक्षा समूह में सक्रिय भूमिका निभाई है, मुख्य रूप से भारत-प्रशांत क्षेत्र के लिए टीके का उत्पादन करके।

ब्रिक्स में दिलचस्पी क्यों?

विदेश मंत्री एस. जयशंकर और विदेश मंत्रालय के अधिकारियों ने इस बारे में अपना तर्क स्पष्ट नहीं किया है,स कि वे ब्रिक्स में सदस्यता मानदंड कैसे तैयार किए जाने चाहिए।

लेकिन, मॉडर्न डिप्लोमेसी में छपी एक लेख बताता है, कि यह मूल रूप से क्षेत्र में किसी देश के आर्थिक योगदान, उसके आकार, सांस्कृतिक प्रभाव और वे इस क्षेत्र का कितना अच्छा प्रतिनिधित्व करते हैं, उसके बीच की बात है। इसके अलावा, एशिया, अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका के ग्लोबल साउथ महाद्वीपों का समान रूप से प्रतिनिधित्व करने के बीच संतुलन बनाना होगा।

मोटे तौर पर, ब्रिक्स में दिलचस्पी का बढ़ना, अमेरिका और पश्चिमी देशों के हाथ से शक्ति निकलकर चीन की तरफ जाना है, जिसके खिलाफ अमेरिका ने 'जंग' छेड़ रखी है।

वहीं, यूक्रेन युद्ध के बाद ब्रिक्स के दशों के साथ साथ इस संगठन में शामिल होने की चाहत रखने वाले देशों में, अभी तक किसी ने भी रूस की आलोचना नहीं की है। ये देश, अभी तक यूक्रेन जंग को लेकर तटस्थ रहे हैं और इनकी ब्रिक्स में शामिल होने की कोशिश, अर्थव्यवस्था को लेकर ज्यादा है, ना कि राजनयिक या फिर सैन्य वजहों से।

यूक्रेन युद्ध के बाद अमेरिका ने जिस तरह से प्रतिबंधों को हथियार बनाकर इस्तेमाल किया है, उससे कई देश बुरी तरह से प्रभावित हुए हैं, लिहाजा ये देश, ब्रिक्स की छतरी में खुद को खड़ा देखना चाहते हैं।

पाकिस्तान के आरोप क्या हैं?

26 जून को पाकिस्तान ने भारत का नाम लिए बगैर कहा था, कि इस संगठन के एक देश उसकी एंट्री बार बार रोक रहे हैं। हाल ही में, ब्रिक की एक बैठक, जो वर्चुअल होने वाली थी, उसमें चीन की मदद से पाकिस्तान भी हिस्सा लेने वाला था, लेकिन भारत ने एन मौके पर पाकिस्तान की एट्री ब्लॉक कर दी।

पाकिस्तान ने आरोप लगाया, कि ब्रिक्स समूह के "एक सदस्य" ने आभासी बैठक में उसकी भागीदारी को रोक दिया। इसमें कहा गया है कि चीन, ब्रिक्स बैठकों से पहले पाकिस्तान के साथ बातचीत करने वाला मेजबान देश है, जहां सभी ब्रिक्स सदस्यों के साथ परामर्श के बाद निर्णय लिए जाते हैं, जिसमें गैर-सदस्यों को निमंत्रण देना भी शामिल है।

चीन, पाकिस्तान के गैर-सदस्य देश के तौर पर आमत्रित करना चाहता था, लेकिन भारत की आपत्ति के बाद पाकिस्तान को ब्लॉक कर दिया गया।

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