प्रत्यारोपण के लिए जिंदा कैदियों के भी अंग निकाल रहा है चीन, निशाने पर हैं ये समुदाय-रिसर्च
लंदन, 5 अप्रैल: चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना की सरकार के एक बहुत बड़े कारनामे का खुलासा हुआ है। चीन में मानवाधिकार उल्लंघनों के एक बड़े गवाह भारत में शरण लेकर रह रहे तिब्बती शरणार्थी हैं। लेकिन, जो अल्पसंख्यक चीन में बच गए हैं, उनके साथ जो कुछ भी हो रहा है, उसके बारे में जानकर मध्ययुगीन क्रूर शासकों की क्रूरता भी कम पड़ जाएगी। एक रिसर्च में यह बात सामने आई है कि चीन को जिन कैदियों को मौत की सजा देनी होती है, वह उसके जिंदा रहते ही उसके शरीर से सारे महत्वपूर्ण अंग निकालकर दे देता है। चीन के कम्युनिस्ट शासकों ने इसके लिए अपने यहां के अल्पसंख्यक समुदायों को पहला टारगेट बना रखा है। शायद यही वजह है कि चीन में अंगदान के ज्यादा डोनर सामने नहीं आने के बावजूद, अंग प्रत्यारोपण के लिए प्रतीक्षा समय बहुत ही छोटी है।

जिंदा कैदियों के भी अंग निकाल रहा है चीन
मिरर की एक रिपोर्ट के मुताबिक ऑस्ट्रेलिया में हुई एक नई रिसर्च में चीन में कुछ उपेक्षित समुदायों के जिंदा कैदियों के भी अंग निकालकर प्रत्यारोपित किए जाने का दावा किया गया है। चीन में मौत की सजा पा चुके कैदियों से अंग निकालना कानूनी तौर जायज है, लेकिन मानवाधिकार संगठनों की चिंता इसलिए बढ़ गई है कि यह एक अधिनायकवादी देश है और उन्हें लग रहा है कि कैदियों की मौत होने से पहले ही उनके शरीर से महत्वपूर्ण अंग निकाल लिए जा रहे हैं। दूसरे शब्दों में समझें तो मौत की सजा की तामील दरअसल, अंग निकालकर ही की जा रही है। News.com.au की एक रिपोर्ट के मुताबिक चीन में अंग प्रत्यारोपण के लिए प्रतीक्षा में लगने वाला समय दुनिया में सबसे कम में से है, बावजूद इसके है कि वहां अंग दान करने वाले लोगों की संख्या तुलनात्मक रूप से बहुत ही मामूली है।

ब्रेन डेड घोषित करने से पहले निकाले जा रहे कैदियों के अंग!
अब ऑस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी के मैथ्यू रॉबर्टसन ने अपनी नई रिसर्च में पाया है कि कुछ कैदियों को, जिनमें से अक्सर हाशिए पर रहने वाले फालुन गोंग या उइगर मुसलमान समुदाय होते हैं, ऐसी आशंका है कि उनका तभी ऑपरेशन करके महत्वपूर्ण अंग निकाल लिया जाता है, जब वे जीवित ही होते हैं। यह रिपोर्ट अमेरिकन जर्नल ऑफ ट्रांसप्लांटेशन में छपी थी। इसमें यह स्थापित करने की कोशिश की गई थी कि जब कैदी के शरीर से अंग निकाल लिया गया, तब उसे 'ब्रेन डेड' घोषित किया गया था ? उन्होंने लिखा, 'हमारी चिंता यह है कि क्या सर्जन ने ट्रांसप्लांट से पहले यह सुनिश्चित किया कि हार्ट या लंग्स निकाले जाने से पहले कैदी की मौत हो चुकी थी।'

कैदियों के अंग निकालकर मौत की सजा दे रहा है चीन-रिसर्च
उन्होंने अपनी रिसर्च में पाया कि चीन के ट्रासप्लांट पब्लिकेशन में 71 रिपोर्ट ऐसी थी, जिसमें 'ब्रेन डेथ की घोषणा सही तरीके से नहीं की गई थी।' उन्होंने यहां तक लिखा है कि, 'ऐसे मामलों में अंग लेने के दौरान हृदय का हटाया जाना निश्चित रूप से डोनर की मौत की मूल वजह रही होगी।' इसके बाद वाली लाइन कम्युनिस्ट चीन की मानवाधिकार-विरोधी मानसिकता पर मुहर लगाने के लिए काफी है। उन्होंने लिखा है, 'क्योंकि, यह ऑर्गन डोनर सिर्फ कैदी रहे होंगे, हमारी जांच पुख्ता तौर पर इस निष्कर्ष पर पहुंचती है कि पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना के डॉक्टरों ने अंग निकालकर मौत की सजा देने में भागीदारी निभाई है।'

चीन बहुत बड़े पैमाने पर कर रहा है ये कारनामा ?
वैसे चीन में कैदियों की सहमति लेकर मौत की सजा दिए जाने के बाद या अगर कोई शव का दावेदार नहीं हो तो अंग निकालने की अनुमति 1984 में दी गई थी। लेकिन, 2019 में एक इंटरनेशनल ट्रिब्यूनल ने पाया था कि चीन जबर्दस्ती कैदियों के अंग निकाल ले रहा है। वैसे चीन हर चीज की तरह अपने इस कारनामे से भी इनकार कर चुका है। रॉबर्टसन का मानना है कि उनकी रिसर्च का निष्कर्ष चीन में चल रहे इस भयानक खेल की एक छोटी झलक भर हो सकती है और हो सकता है कि कई सारे लोगों को इसी तरह जिंदा रहते हुए अंग निकालकर सजा-ए-मौत दी जा चुकी हो। (तस्वीरें-प्रतीकात्मक)
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