म्यांमार के कोको द्वीप पर सैन्य बेस बना रहा है चीन, अंडमान से सिर्फ 60 किमी की दूरी, भारत के लिए बड़ा खतरा
एक दिन पहले रिपोर्ट आई थी, कि चीन ने श्रीलंका के दक्षिणी हिस्से में भारत की सामरिक संपत्तियों की निगरानी के लिए श्रीलंका में एक रडार बेस स्थापित करने पर विचार कर रहा है।

Myanmar Chinese Spy Base: भारत के पड़ोसी देशों को अशांत कर चीन लगातार उनका फायदा उठा रहा है। पहले श्रीलंका को कर्ज में जाल में फंसाकर चीन ने उसके हंबनटोटा बंदरगाह पर 99 सालों के लिए कब्जा कर लिया और अब चीन, श्रीलंका से अपना बेस बनाने के लिए जगह मांग रहा है, वहीं टाइम्स ऑफ इंडिया की ताजा रिपोर्ट में कहा गया है, कि चीन म्यांमार के अंदर भी जासूसी बेस बनाने जा रहा है।
म्यांमार में जासूसी बेस बना सकता है चीन
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, इस मामले की जानकारी रखने वाले भारतीय अधिकारियों ने खुलासा किया है, कि भारत ने हाल के महीनों में चीन के खुफिया बेस को लेकर मिली सीक्रेट जानकारी के साथ म्यांमार से बात की है।
भारत सरकार के पास जो जानकारी है, उसके मुताबिक, चीन बंगाल की खाड़ी में स्थित एक द्वीप पर निगरानी चौकी बनाने में म्यांमार की मदद कर रहा है।
कहने के लिए ये बेस म्यांमार बना रहा है, लेकिन चीनी मदद के बाद इस बेस को बनाने के पीछे का मकसद आसानी से समझा जा सकता है।
रिपोर्ट में कहा गया है, कि भारत सरकार ने विभिन्न स्तरों पर म्यांमार के प्रतिनिधियों के सामने इस मुद्दे को उठाया है और सैटेलाइट तस्वीरें उन्हें सौंपी है।
रिपोर्ट के मुताबिक, इन तस्वीरों में देखा जा सकता है, कि चीन के मजदूर हिंद महासागर में कोको द्वीप पर एक सैन्य पोस्ट का निर्माण कर रहे हैं। हालांकि, अधिकारियों ने अपनी पहचान बताने से मना कर दिया, क्योंकि ये काफी संवेदनशील मामला है।
लेकिन, भारतीय अधिकारियों ने कहा, कि कोको द्वीप में चीन के मजदूरों को एक हवाई पट्टी का विस्तार करते हुए भी देखा गया है। आपको बता दें, कि कोको द्वीप म्यांमार के ठीक नीचे हिन्द महासागर में स्थिति है और यहां से सीधे तौर पर हिन्द महासागर में इंडियन नेवी की गतिविधियों पर नजर रखी जा सकती है।

म्यांमार ने भारतीय अधिकारियों से क्या कहा?
टीओआई की रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय अधिकारियों ने कहा, कि म्यांमार पर शासन करने वाली सेना के प्रतिनिधियों ने कोको द्वीप पर बनने वाली बेस में चीनी भागीदारी से इनकार कर दिया है।
रिपोर्ट में कहा गया है, म्यांमार के अधिकारियों ने भारत की चिंताओं को खारिज कर दिया है। फिर भी, भारत चिंतित है, कि इस द्वीप पर बुनियादी ढांचे के निर्माण के बाद चीन को कम्युनिकेशन और सर्विलांस में मदद मिलेगी, जिसके बाद चीन भारत के जहाजों और मिसाइलों के परीक्षण को ट्रैक कर सकता है।
चीन श्रीलका में भी ऐसा ही कर रहा है, जिससे भारत के कई सामरिक ठिकाने चीन की रडार की जद में होंगे।
म्यांमार की सत्तारूढ़ स्टेट एडमिनिस्ट्रेशन काउंसिल के प्रवक्ता मेजर जनरल ज़ॉ मिन तुन ने इस आरोप को "बेतुका" बताया, कि चीन कोको द्वीप समूह में एक जासूसी सुविधा का निर्माण कर रहा है।
उन्होंने इस बात से इनकार किया, कि यह विषय कभी चीनी या भारतीय अधिकारियों के सामने आया था, और कहा, कि म्यांमार कभी भी विदेशी सैनिकों की अपनी जमीन तक पहुंच की अनुमति नहीं देगा।
उन्होंने कहा, कि 'म्यांमार और भारत के बीच हमेशा कई स्तरों पर बातचीत होती है, लेकिन इस मुद्दे पर कोई विशेष चर्चा नहीं हुई।' उन्होंने कहा, कि "भारत सरकार पहले से ही अच्छी तरह से जानती है, कि केवल म्यांमार के सुरक्षा बल वहां स्थित हैं, और वे अपने देश के लिए रक्षा गतिविधियां कर रहे हैं।"

भारत सरकार की आधिकारिक प्रतिक्रिया क्या है?
सवालों के जवाब में, भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अरिंदम बागची ने कहा, कि भारत अपने हितों की रक्षा के लिए "आवश्यक उपाय" करेगा। उन्होंने कहा, कि "सरकार भारत की सुरक्षा को प्रभावित करने वाले सभी घटनाक्रमों पर लगातार नजर रखती है।"
वहीं, म्यांमार में तैनात चीनी राजदूत चेन, जिन्होंने इसी हफ्ते म्यांमार के उच्च-सैन्य अधकारियों से मुलाकात की थी, उन्होंने इस मामले पर टिप्पणी करने के अनुरोध का कोई जवाब नहीं दिया है। वहीं, चीन के विदेश मंत्रालय ने सवालों का तुरंत जवाब नहीं दिया है।
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म्यांमार को इस्तेमाल करता रहा है चीन
1990 के दशक से ही ऐसी रिपोर्टें आम हैं, कि म्यांमार ने कोको द्वीपसमूह पर एक चीनी सिग्नल खुफिया सुविधा की अनुमति दी है। लंदन स्थित नीति अनुसंधान समूह चैथम हाउस द्वारा एक रिपोर्ट जारी करने के बाद, पिछले हफ्ते यह मुद्दा फिर से ध्यान में आया, कि म्यांमार क्षेत्र में समुद्री निगरानी संचालन करने के इरादे से कोको द्वीपों का सैन्यीकरण कर रहा है।

अधिकारियों ने कहा, कि भारत ने आकलन किया है कि चीन के पास विशिष्ट द्वीप - ग्रेट कोको द्वीप - पर कोई आक्रामक सैन्य क्षमता नहीं है और हिंद महासागर में स्नूपिंग के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले चीनी सर्विलांस जहाजों ने संदेह से बचने के लिए वहां डॉक नहीं किया है।
उन्होंने कहा, कि कोई भी चीनी कर्मचारी स्थायी रूप से द्वीपों पर तैनात नहीं है, भले ही चीनी कर्मचारी उपकरण स्थापित करने में मदद करने के लिए अक्सर दिखाई देते रहते हैं।
अधिकारियों ने कहा, कि चीन को जासूसी चौकी संचालित करने से रोकने के लिए म्यांमार के जुंटा पर दबाव जारी रखने की भारत की योजना है। लेकिन भारतीय अधिकारियों का आकलन है, म्यांमार के जनरल आर्थिक तौर पर पूरी तरह से चीन पर निर्भर हो चुके हैं और देश चलाने के लिए वो लगातार चीन से आर्थिक मदद ले रहे हैं।
आपको बता दें, कि म्यांमार में 1 फरवरी 2021 को सरकार का तख्तापलट किया था और उसके बाद से चीन लगातार म्यांमार की मदद कर रहा है।
चीन और म्यांमार में कैसे हैं संबंध?
चीन, म्यांमार का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है, और चीन ने मलक्का जलडमरूमध्य को बायपास करने के तरीके के रूप में दक्षिण पूर्व एशियाई राष्ट्र में बंदरगाहों और ऊर्जा पाइपलाइनों में भारी निवेश किया है, जो किसी भी व्यापक एशियाई संघर्ष में एक चोक प्वाइंट होगा।
चीन को डर है, कि युद्ध की स्थिति में भारत मलक्का प्वाइंट को ब्लॉक कर देगा और हिन्द महासागर में चीन की ताकत कमजोर पड़ जाएगी, इसीलिए वो बाइपास रास्तों का निर्माण कर रहा है।
कोको द्वीप का रणनीतिक महत्व जानिए
कोको द्वीप समूह भारत के अंडमान निकोबार द्वीप समूह के बेहद नजदीक है। इनके बीच की दूरी 60 किलोमीटर से भी कम है, जहां इंडियन नेवी का मिलिट्री बेस है। यानि, अगर कोको द्वीप में चीन पहुंचता है, तो फिर वो इंडियन नेवी की गतिविधियों पर नजर रखने में सक्षम होगा।
भारतीय अधिकारियों ने ज्यादा जानकारी दिए बिना बताया, कि चीन उस द्वीप श्रृंखला में अपनी क्षमता बढ़ा रहा है।
चीन की निगरानी गतिविधियां इस साल की शुरुआत में तब सुर्खियों में आईं, जब अमेरिका ने अपने क्षेत्र में उड़ रहे एक कथित जासूसी गुब्बारे को मार गिराया था। पेंटागन ने कहा कि पिछले हफ्ते कहा, कि चीनी जासूसी बैलून के जरिए चीन खुफिया जानकारियां जुटाने में कामयाब रहा है।
लिहाजा, कोको द्वीप समूह को लेकर भारत को जल्द रणनीति बनानी होगी और चीनी खतरे को खत्म करना होगा।












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