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चीन ने भूटान के राजा की पुश्तैनी जमीन पर किया कब्जा, दोस्ती से पहले ही ड्रैगन ने भारत के पड़ोसी देश को डंसा!

China Grabs Bhutan Land: भूटान पिछले दो सालों से चीन के साथ रिश्तों को सुधारना चाहता है, लेकिन इससे पहले की दोनों देशों के बीच रिश्ते सामान्य होने की तरफ बढ़ पाते, ड्रैगन ने भारत के इस छोटे से पड़ोसी देश को डंस लिया है।

एक महीने से भी कम पुरानी सैटेलाइट तस्वीरों से पता चला है, चीन ने गहरे सांस्कृतिक महत्व वाले क्षेत्र, बेयुल खेनपाजोंग में एक नदी घाटी के किनारे टाउनशिप का निर्माण करके पूर्वोत्तर भूटान में अवैध रूप से कब्जा कर लिया है।

China Grabs Bhutan Land

भूटान की जमीन हड़प रहा चीन

भूटान, एक ऐसा देश है, जिसकी जनसंख्या 8 लाख से भी कम है - जो कि भारत के राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र की केवल एक-चौथाई है, उस देश के खिलाफ चीन सलामी स्लाइसिंग का इस्तेमाल कर रहा है और उसकी जमीन पर अपने कब्जे का विस्तार कर रहा है।

सलामी स्लाइसिंग वो टेक्निक है, जिसके जरिए चीन दूसरे देशों की जमीन पर अवैध कब्जा करता है। इसके तहत चीन किसी देश के किसी क्षेत्र में पहले घुसपैठ करता है, फिर उस क्षेत्र को अपना कहकर उसे विवादित बनाता है और अगर वो देश मुकाबला करने मे कमजोर है, तो फिर उस क्षेत्र पर कब्जा कर लेता है। भूटान के साथ चीन यही कर रहा है।

सैटेलाइट तस्वीरों से पता चलता है, कि चीन ने भूटान की उत्तरी, पश्चिमी और दक्षिण-पश्चिमी परिधि में सलामी-स्लाइसिंग कर रहा है और भारत के इस पड़ोसी हिमालयन देश की जमीन पर कब्जे का विस्तार कर रहा है।

बेयुल खेनपाजोंग वो क्षेत्र है, जहां भूटान के शाही परिवार की पुश्तैनी जमीन है।

लंदन विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ ओरिएंटल एंड अफ्रीकन स्टडीज (एसओएएस) में तिब्बती इतिहास पर और भूटान पर नजर रखने वाले विशेषज्ञ प्रोफेसर रॉबर्ट बार्नेट कहते हैं, कि "यह मामला चीन द्वारा एक ऐसे क्षेत्र के बारे में हालिया, संदिग्ध दावे का प्रतिनिधित्व करता है, जो एक बहुत कम शक्तिशाली पड़ोसी के लिए बहुत सांस्कृतिक महत्व रखता है, यह जानते हुए कि पड़ोसी के पास प्रतिक्रिया के लिए बहुत कम विकल्प हैं।"

एक तरफ बात, दूसरी तरफ कब्जा

बीजिंग उस वक्त अवैध निर्माण कर रहा है, जब वो दूसरी तरफ भूटान के साथ सीमा विवाद पर बात भी कर रहा है। जाहिर है, चीन का मकसद भूटान पर प्रेशर बनाना है। चीन ने भूटान की जमीन जकारलुंग क्षेत्र में निर्माण की सीमा को काफी बढ़ा दिया है, और ताजा हालात ये हैं, कि बीजिंग इन क्षेत्रों से किसी भी क्षेत्र से वापसी पर विचार करने के लिए भी तैयार नहीं हो रहा है।

बेयुल खेनपाजोंग में चीन की निर्माण गतिविधि पर सवालों के जवाब में, भारत में भूटान के राजदूत मेजर जनरल वेत्सोप नामग्याल (सेवानिवृत्त) ने कहा, "हालांकि यह हमारी नीति है, कि हम चल रही सीमा वार्ता पर मीडिया को टिप्पणी न दें, मैं बताना चाहूंगा कि हम सीमा वार्ता के दौरान भूटान के क्षेत्रीय हितों को हमेशा बनाए रखा जाएगा और उनकी रक्षा की जाएगी।''

सैटेलाइट तस्वीरों का विश्लेषण करने वाले विशेषज्ञों के मुताबिक, निर्माण गतिविधि की तस्वीरों से पता चलता है, कि सैकड़ों लोगों के रहने के लिए गांव बसाया जा रहा है और बस्तियों का निर्माण किया जा रहा है। एनडीटीवी की एक रिपोर्ट में कहा गया है, कि कम से कम 200 से ज्यादा सिंगल और बहुमंजिला इमारतों का निर्माण किया गया है। हालांकि यह माना जा रहा है, कि अंतिम संख्या काफी बड़ी होगी, क्योंकि तस्वीरों में दिखाई देने वाले तीन एन्क्लेव का निर्माण अभी भी पूरा नहीं हुआ है।

इन इलाकों की नवंबर 2020 की पिछली तस्वीरों से पता चलता है, कि उस समय क्षेत्र में बड़े पैमाने पर निर्माण गतिविधि शुरू नहीं हुई थी। नवंबर 2020 से, बेयुल खेनपाजोंग को पूरी तरह से बदल दिया गया है, और परिक्षेत्रों को जोड़ने वाले एक महत्वपूर्ण सड़क नेटवर्क को समायोजित करने के लिए घाटियों और पहाड़ियों में निर्माण कार्य किये गये हैं।

चैथम हाउस द्वारा हाल ही में प्रकाशित एक लेख में, जॉन पोलक और एक प्रमुख भू-खुफिया शोधकर्ता डेमियन साइमन ने बेयुल, या छिपी हुई घाटी के महत्व को समझाया। उन्होंने कहा, कि "शाही परिवार अपनी पैतृक विरासत को पर्वतीय क्षेत्र से जोड़ता है, फिर भी सरकार वहां चीनी बस्ती को बनाने से रोकने में नाकाम रही है।"

भूटान के कुछ हिस्सों पर चीन के कब्जे का भारत के लिए भी गहरा सुरक्षा प्रभाव है। 2017 में सिक्किम से सटे ऊंचाई वाले डोकलाम पठार में भारतीय और चीनी सैनिकों का आमना-सामना हुआ था। भारतीय सैनिकों ने चीनी सैनिकों को उस क्षेत्र में बनाई गई सड़क का विस्तार करने से शारीरिक रूप से रोका था, जिसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भूटानी क्षेत्र के रूप में मान्यता प्राप्त है।

तब से, चीनी मजदूरों ने अमू चू नदी घाटी के किनारे तीन गांवों का निर्माण करने के लिए भूटानी क्षेत्र में घुसपैठ की है, जो पूर्व में स्थित है और सीधे डोकलाम से सटा हुआ है। वहीं, भारत का मानना है, चीन भूटान की जमीन को सिर्फ इसलिए हड़पने की कोशिश कर रहा है, ताकि भारत के पूर्वोत्तर हिस्से को जोड़ने वाले सिलीगुड़ी कॉरिडोर पर वो नजर रख सके, जिससे भारत की सुरक्षा कमजोर होती है और भारत के नेशनल सिक्योरिटी पर असर पड़ता है।

भारत के लिए सुरक्षा चिंताएं

आपको बता दें, कि सिलीगुड़ी कॉरिडोर जमीन का वो संकीर्ण पट्टी है, जो पूर्वोत्तर भारत को शेष भारत से जोड़ती है।

भारत के चीन-पर्यवेक्षक डॉ. ब्रह्मा चेलानी कहते हैं, "भूटानी क्षेत्रीय संप्रभुता का उल्लंघन करने वाली चीनी निर्माण गतिविधि का उद्देश्य, भूटान-भारत संबंधों को कमजोर करना और थिम्पू को चीनी मांगों को मानने के लिए मजबूर करना हो सकता है।"

भारत की सुरक्षा चिंताएं, वास्तव में थिम्पू के लिए एक अतिरिक्त समस्या हैं। राजनयिक संबंध और भारत के संबंध में भू-रणनीतिक प्राथमिकताओं पर नजर रखने वाले डॉ. बार्नेट कहते हैं, कि "चीन ने भूटान पर एक तथाकथित पैकेज डील थोप दी है - वह जकारलुंग और उसके दक्षिण और पश्चिम के क्षेत्रों को वापस करने से इंकार कर रहा है, जब तक कि भूटान पश्चिमी भूटान के क्षेत्रों, विशेष रूप से डोकलाम पठार, चीन को नहीं सौंप देता, जिसे भूटान अपने संधि दायित्वों के कारण नहीं छोड़ सकता है।

चीन के अत्यधिक दबाव के कारण, भूटान अपने क्षेत्र में घुसपैठ को हमेशा के लिए बंद करने का इच्छुक है। पिछले साल अक्टूबर में, भूटान के विदेश मंत्री टांडी दोरजी ने बीजिंग की यात्रा की, जो किसी भूटानी मंत्री की पहली चीन यात्रा थी। उसी महीने, प्रधान मंत्री लोटे शेरिंग ने कहा, कि उन्हें उम्मीद है कि चीन और भूटान के बीच एक उचित सीमा का सीमांकन किया जाएगा। थिम्पू ने वार्ता की प्रगति पर सार्वजनिक बयान नहीं दिया है, हालांकि यह माना जाता है, कि नई दिल्ली को नवीनतम घटनाक्रमों के बारे में सूचित किया गया है।

हालांकि, भारत की सबसे बड़ी चिंता, चीन के साथ भूटान के संबंधों का भविष्य हो सकता है।

एनडीटीवी की एक रिपोर्ट के मुताबिक, प्रमुख तिब्बतविज्ञानी क्लाउड अरपी ने पिछले महीने कहा था, "भूटान धीरे-धीरे चीन की रणनीतिक कक्षा में ट्रांसफर हो रहा है और भारत बहुत कुछ नहीं कर सकता है, सिवाय इसके, कि नई दिल्ली और थिम्पू के बीच एक नए सुरक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए जाएं।"

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