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शरीर को कोरोना संक्रमण से बचाता है भांग और गांजा, नहीं घुसने देता है बॉडी के अंदर, बड़ी रिसर्च

कोरोना के वायरस को शरीर के अंदर जाने से भांग रोकता है। प्रयोगशाला में बड़ा खुलासा हुआ है।

वॉशिंगटन, जनवरी 14: क्या भांग खाने वालों को कोरोना वायरस संक्रमण का खतरा कम होगा और क्या भांग से कोरोना वायरस को हराया जा सकता है, प्रयोगशाला में भांग और कोरोना वायरस को लेकर बहुत बड़ा खुलासा हुआ है और वैज्ञानिकों के हाथ बड़ी उपलब्धि लगी है और कोरोना वायरस पर भांग से पड़ने वाले असर को लेकर जर्नल ऑफ नेचर प्रोडक्ट्स में रिपोर्ट प्रकाशित की गई है।

वायरस को रोकता है भांग

वायरस को रोकता है भांग

जर्नल ऑफ नेचर प्रोडक्ट्स में प्रकाशित एक रिसर्च रिपोर्ट में कहा गया है कि, भांग के अंदर जो यौगिक हैं, वो कोरोना वायरस को रोकने में काफी असरदार हैं और भांग के अंदर पाया जाने वाला यौगिक इंसानी शरीर में कोरोना वायरस को प्रवेश करने से रोकता है। ओरेगॉन स्टेट यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने कहा कि, आमतौर पर गांजे और भांग में पाए जाने वाले दो यौगिकों को, जिसे कैनाबिगेरोलिक एसिड, या सीबीजीए, और कैनाबीडियोलिक एसिड, या सीबीडीए कहा जाता है, ये कोरोना वायरस को शरीर में दाखिल होने से रोक देते हैं या फिर कोरोना वायरस को शरीर के अंदर ज्यादा खतरनाक नहीं होने देते हैं।

प्रयोगशाला में रिसर्च के दौरान खुलासा

प्रयोगशाला में रिसर्च के दौरान खुलासा

प्रयोगशाला में भांग और गांजे के अंदर पाए जाने वाले इन दोनों यौगिकों को लेकर रिसर्च किया गया है और कोरोना वायरस पर ये दोनों क्या असर डालते हैं, इन्हें जांचा गया है। एक रासायनिक जांच के दौरान भांग और गांजे से कोरोना वायरस पर पड़ने वाले असर को जांचा गया है, जिसमें पता चला है कि, भांग और गांजे में मौजूद ये दोनों यौगिक कोरोना वायरस में मौजूद स्पाइक प्रोटीन, जिसके सहारे वायरस इंसानी शरीर में दाखिल होता है, उसे काफी कमजोर कर देतै हैं, जिससे इंसानी शरीर में कोरोना वायरस दाखिल ही नहीं हो पाता है और अगर वायरस शरीर में दाखिल भी होता है, तो वो शरीर के लिए उतना खतरनाक नहीं रह जाता है।

हैरान करने वाला रिसर्च

हैरान करने वाला रिसर्च

वैज्ञानिकों का कहना है कि, सबसे दिलचस्प बात ये है, कि भांग और गांजे के अंदर पाए जाने वाले ये दोनों यौगिक, सीधे तौर पर कोरोना वायरस के स्पाइक प्रोटीन को ही खत्म कर देते हैं। आपको बता दें कि, स्पाइक प्रोटीन के सहारे ही वायरस शरीर के अंदर जाता है और फेफड़े में पहुंचने के बाद काफी तेजी के साथ अपनी कॉपी बनाता है और अगर स्पाइक प्रोटीन कमजोर हो चुका है, तो फिर वो फेफड़े में कॉपी नहीं बना पाएगा और वायरस बेअसर ही रहेगा।

डेल्टा वेरिएंट पर पड़े प्रभाव पर भी रिसर्च

डेल्टा वेरिएंट पर पड़े प्रभाव पर भी रिसर्च

शोधकर्ताओं ने प्रयोगशाला में कोरोना वायरस के अल्फा और बीटा वेरिएंट पर भांग और गांजे में पाए जाने वाले इन दोनों यौगिकों के प्रभाव का परीक्षण किया है। हालांकि, अभी तक इसको लेकर रिसर्च नहीं किया गया है, कि जो लोग भांग और गांजे का सेवन करते हैं, उनपर कोरोना वायरस क्या असर दिखाता है और जो लोग भांग और गांजे का सेवन नहीं करते हैं, उन दोनों मामलों में क्या तुलना है। आपको बता दें कि, गांजे में फाइबर होता है और पशुओं के चारे का मुख्य स्रोत होता है और इसमें मौजूद अर्क को आमतौर पर सौंदर्य प्रसाधन, बॉडी लोशन बनाने में इस्तेमाल किया जाता है। रिसर्च में पता चला कि, भांग और गांजे में पाये जाने वाले ये यौगिक अल्फा और डेल्टा वेरिएंट के खिलाफ भी उतना ही असरदार है।

काफी कमजोर है ओमिक्रॉन

काफी कमजोर है ओमिक्रॉन

वहीं, ओमिक्रॉन वेरिएंट को लेकर वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि, ओमिक्रॉन किसी साधारण फ्लू से भी कम घातक हो सकता है और कई वैज्ञानिकों का मानना है कि, कोरोना वायरस का बुरा दौर अब खत्म हो चुका है, वहीं कई वैज्ञानिकों ने इस बात को सुनिश्चित करते हुए कहा है कि कोरोना वायरस का बुरा दौर ही अब खत्म हो चुका है और धीरे धीरे कोरोना वायरस प्राकृतिक सर्दी जैसे वायरस में बदल जाएगा। वैज्ञानिकों ने कहा है कि, कोरोना वायरस के खिलाफ शरीर में एंटीबॉडी का विकास हो रहा था, चाहे वो एंटीबॉडी वैक्सीन से आ रही थी या फिर प्राकृतिक तरीके से, लेकिन ओमिक्रॉन वेरिएंट की इतनी तेज रफ्तार है, कि इसने ज्यादा से ज्यादा लोगों को संक्रमित करना और उनके शरीर में एंटीबॉडी बनाना शुरू कर दिया है।

मृत्युदर में काफी ज्यादा गिरावट

मृत्युदर में काफी ज्यादा गिरावट

ब्रिटिश अखबर मेल ऑनलाइन की रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले साल जनवरी महीने में जब डेल्टा वेरिएंट फैला हुआ था, उस वक्त हर 33 कोविड पॉजिटिव मरीजों में से एक मरीज की मौत हो जा रही थी, लेकिन अब 670 कोविड पॉजिटिव मरीजों में से एक की मौत हो रही है और विशेषज्ञों का मानना है कि, ये आंकड़ा और भी ज्यादा कम होगा और कोविड से मृत्यु दर, मौसमी इन्फ्लूएंजा के समान हो जाएगी और इससे मृत्युदर का अनुपात 0.1 है, यानि एक हजार मरीजों में से एक की मौत। लिहाजा, वैज्ञानिकों का कहना है कि, अब कोविड से डरने की जरूरत नहीं, सिर्फ सावधान रहने की जरूरत है।

महामारी के बुरे दिन हुए खत्म?

महामारी के बुरे दिन हुए खत्म?

ऑस्ट्रेलिया में वोलोंगोंग विश्वविद्यालय के एक महामारी वैज्ञानिक गिदोन मेयरोवित्ज़-काट्ज़ ने मेल ऑनलाइन को बताया कि, उनका 'सबसे अच्छा अनुमान' यह था कि ट्रिपल डोज वैक्सीन लेने वाले लोगों को ओमिक्रोन से उतना ही जोखिम है जितना कि फ्लू से रहता हैं।' 'लेकिन वैज्ञानिकों ने अनुमानों के आधार पर बड़ी संभावना जताते हुए कहा कि, महामारी के सबसे बुरे दिन खत्म हो गए हैं और ब्रिटेन को अब देश में सामान्य स्थितियों को लागू कर देना चाहिए। प्रोफेसर रॉबर्ट डिंगवाल, जेसीवीआई के एक पूर्व सदस्य और नॉटिंघम ट्रेंट यूनिवर्सिटी में समाजशास्त्र के विशेषज्ञ, ने मेलऑनलाइन को बताया कि, निश्चित तौर पर ओमिक्रॉन को लेकर मृत्युदर का आखिरी आंकड़े आने में कुछ दिन और लगेंगे, लेकिन निष्कर्ष यही है, कि ये काफी कम घातक है और 'हम पूछ रहे हैं कि क्या हम कोई भी उपाय करने में उचित कदम उठा सकते हैं, जो हम खराब फ्लू के मौसम के लिए नहीं लाएंगे '।

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