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Diplomacy: जस्टिन ट्रूडो के इस्तीफे से दिल्ली खुश, क्या नई सरकार में भारत-कनाडा संबंध पटरी पर लौट पाएंगे?

Diplomacy: पिछले महीने 16 दिसंबर को जब कनाडा की उप-प्रधानमंत्री के साथ साथ वित्त मंत्रालय भी संभालने वाले क्रिस्टिया फ्रीलैंड ने जब इस्तीफा दिया था, उसके बाद ही साफ हो गया था, कि प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो के दिन अब लद गए हैं और बहुत जल्द वो भी इस्तीफे की घोषणा कर सकते हैं।

खराब अर्थव्यवस्था और जीवन लागत में आए भारी उछाल ने पहले ही जस्टिन ट्रूडो को परेशान कर रखा था, लेकिन पार्टी के अंदर उठे विरोध के स्वर ने उनपर भारी दबाव बना दिया था। पार्टी के ज्यादातर सांसदों का मानना था, कि जस्टिन ट्रूडो को प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दे देना चाहिए। इसके अलावा, देश की संसद में विपक्ष से साथ गतिरोध काफी तेज हो गया था और कमजोर होती अर्थव्यवस्था और उदार आव्रजन नीति को लेकर लोगों में भारी गुस्सा देखा जा रहा था।

canada-India Relations

कई ओपिनियन पोल्स में पता चला, कि जस्टिन ट्रूडो की लोकप्रियता काफी ज्यादा लुढ़क चुकी है और उनकी लिबरल पार्टी के पास सिर्फ 20 प्रतिशत से कुछ ज्यादा लोगों का समर्थन बचा था, जबकि विपक्षी कंजर्वेटिव पार्टी को 40 प्रतिशत से ज्यादा वोट मिलने की भविष्यवाणी की गई है। जाहिर तौर पर ओपिनियन पोल ने ट्रूडो के सामने सवाल खड़ा कर दिया था, कि क्या वो अपनी जिद से पार्टी का भविष्य भी खराब कर देंगे?

कनाडा में तय समय के मुताबिक, अक्टूबर में चुनाव होने हैं। लेकिन, जस्टिन ट्रूडो के इस्तीफे के बाद अब समय से पहले चुनाव की संभावना काफी ज्यादा बन गई है।

अमेरिकी चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप की जीत और उसके बाद कनाडा के खिलाफ भारी भरकम टैरिफ लगाने की धमकी ने जस्टिन ट्रूडो के लिए सरकार में बने रहना मुश्किल कर दिया था। फ्लोरिडा में मुलाकात के दौरान ट्रंप ने ट्रूडो को "कनाडा के महान राज्य का गवर्नर" कहा, जो उनके लिए एक अपमान था। ट्रंप आपसी मुलाकात तक ही नहीं रूके, उन्होंने सार्वजनिक तौर पर सोशल मीडिया पर लिखा, कि अगर ट्रूडो टैरिफ में रियायत चाहते हैं, तो कनाडा को अमेरिका का 51वां राज्य बनना होगा और ट्रूडो उसके गवर्नर बन जाएं।

डोनाल्ड ट्रंप के पहले कार्यकाल के खत्म होने के बाद जस्टिन ट्रूडो ने सार्वजनिक तौर पर उनका मजाक उड़ाया था और ये ट्रंप का बदला हो सकता है!

और इन सब वजहों से आखिरकार 6 जनवरी को जस्टिन ट्रूडो ने घुटने टेक दिए। उन्होंने अपने इस्तीफे की घोषणा की लेकिन कहा, कि जब तक उनकी पार्टी नये नेता का चुनाव नहीं कर लेती है, वो तब तक पद पर बने रहेंगे।

क्रीस्टिया फ्रीलैंड, विदेश मंत्री मेलानी जोली, परिवहन मंत्री अनीता आनंद, वित्त मंत्री डोमिनिक लेब्लांक और पूर्व सेंट्रल बैंकर मार्क कार्नी जैसे कई नाम हैं, जो अगले प्रधानमंत्री बनने के दावेदार हैं, लेकिन कोई भी नाम अभी फाइनल नहीं है।

भारत के पूर्व डिप्लोमेट विवेक काटजू ने इंडियन एक्सप्रेस में लिखे एक लेख में कहा है, कि "ट्रूडो के बाद जो भी आएगा, उसे पियरे पोलीवर के नेतृत्व वाली कंजर्वेटिव पार्टी से मुकाबला करना लगभग असंभव काम होगा। कंजर्वेटिव और अन्य दल समय से पहले चुनाव चाहते हैं और लिबरल के लिए उनके दबाव का विरोध करना आसान नहीं होगा।"

उन्होंने लिखा है, कि " ट्रूडो के जाने से दिल्ली खुश होगा, क्योंकि हरदीप सिंह निज्जर की हत्या की वजह द्विपक्षीय संबंधों में समस्याओं से निपटने का ट्रूडो का तरीका कूटनीतिक और राजनीतिक रूप से अपरिपक्व था। यह 18 सितंबर 2023 को कनाडाई संसद में उनके बयान से साफ होता है, कि उनके देश की सुरक्षा एजेंसियां ​​निज्जर की हत्या के पीछे "भारत सरकार के एजेंटों के विश्वसनीय आरोपों की सक्रिय रूप से जांच कर रही थीं"। जबकि उन्होंने एक साल बाद कहा, उनके आरोप "खुफिया जानकारी" पर आधारित था न कि "ठोस साक्ष्य" पर, जाहिर है, उन्होंने दोनों देशों के संबंध को धकेल दिया।"

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क्या ट्रूडो के जाने से सुधर पाएंगे कनाडा-भारत के संबंध? (India-Canada Relation)

ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के अध्ययन और विदेश नीति विभाग के उपाध्यक्ष प्रोफेसर हर्ष वी. पंत ने बीबीसी की एक रिपोर्ट में कहा है, कि "यह बिल्कुल साफ था, कि जब तक जस्टिन ट्रूडो कनाडा के प्रधानमंत्री रहेंगे, तब तक भारत और कनाडा के संबंधों में नया मोड़ नहीं आ पाएगा।"

उन्होंने कहा, कि "ट्रूडो ने निज्जर हत्याकांड को निजी तौर पर लिया और जिस गंभीरता से उन्हें इस मुद्दे को उठाना चाहिए थे, उसे वो नहीं उठा पा रहे थे, जिसने दोनों देशों के संबंध को काफी नुकसान पहुंचाया।"

जस्टिन ट्रूडो ने भारत के खिलाफ काफी बयानबाजी की, जिसका नतीजा ये निकला, कि दोनों देशों ने एक दूसरे के डिप्लोमेट्स को देश से बाहर निकाले, वीजा को लेकर कई तरह के फैसले लिए, जिससे भारतीय छात्रों को काफी परेशानी होनी शुरू हो गई।

विल्सन सेंटर थिंक टैंक में साउथ एशिया इंस्टीट्यूट के डायरेक्टर माइकल कुगेलमैन ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट में लिखा, कि "जस्टिन ट्रूडो का इस्तीफा, भारत और कनाडा के खराब होते संबंध को सुधारने का एक मौका दे सकता है।" उन्होंने लिखा, कि "भारत ने तनावपूर्ण संबंध के लिए सीधे तौर पर जस्टिन ट्रूडो को जिम्मेदार ठहराया और पिछले कुछ सालों में सिर्फ कनाडा ही एकमात्र पश्चिमी देश है, जिससे भारत के संबंध बिगड़े हैं।"

वहीं, विवेक काटजू लिखते हैं, कि "यहां तक ​​कि अगर कनाडाई खुफिया एजेंसी को निज्जर मामले में अपने फाइव-आईज सहयोगियों से जानकारी दी गई होती, तो भी ट्रूडो को पता होता, कि कोई भी देश कभी भी ऐसे आरोपों को स्वीकार नहीं करेगा, जो कानून की अदालत में विश्वसनीय रूप से स्थापित नहीं हो सकते। यहीं पर पन्नून मामले और निज्जर मामले में अमेरिका के कदम और ट्रूडो के कदम को लेकर अलग-अलग भारतीय प्रतिक्रियाओं में बड़ा अंतर है।"

उन्होंने लिखा है, कि ट्रूडो के कार्यकाल के दौरान खालिस्तानियों ने लगातार उपद्रव मचाए, भारत विरोधी गतिविधियों को अंजाम दिया, इंदिरा गांधी की हत्या का महिमामंडन किया गया और जस्टिन ट्रूडो ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बताकर इन हरकतों का बचाव किया, जबकि भारत लगातार खलिस्तानी अलगाववादियों को लेकर उनसे शिकायत करता रहा।

लेकिन, विवेक काटजू को लगता है, कि इस बात की काफी कम उम्मीद है, कि ट्रूडो के जो भी उत्तराधिकारी होंगे, वो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ में ऐसी हरकतों को रोकने के लिए किसी तरह का कानून बनाने के लिए तैयार होंगे।

हालांकि, प्रोफेसर पंत का मानना है, कि जब भी ऐसे बदलाव होते हैं, तो संबंधों में भी बदलाव की एक उम्मीद जगती है।

उन्होंने बीबीसी से कहा, कि "नया प्रशासन एक नई शुरूआत करेगा। और नई सरकार और नये प्रधानमंत्री से उम्मीदें रहती ही हैं, लेकिन लिबरल पार्टी के सामने अपनी चुनौतियां भी हैं।" उन्होंने कहा, कि "लिबरल पार्टी के ऐसे कई नेता हैं, जो सिख समुदाय के हैं, जिन्हें खालिस्तान समर्थकों का समर्थन हासिल है, तो क्या नया नेता खुलकर खालिस्तान का विरोध करेगा? और जो ऐसी विचारधारा का समर्थन करता हो, उनसे किसी सुधार की उम्मीद करना अस्वभाविक है।"

वहीं, भारत के पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखते हैं, कि "जस्टिन ट्रूडो का इस्तीफे का ऐलान करना अच्छी बात है।" उन्होंने लिखा है, कि "उनकी गैर-जिम्मेदाराना बयानबाजी और नीतियों ने भारत-कनाडा संबंधों को काफी नुकसान पहुंचाया, लेकिन इसका मतलब ये नहीं है, कि कनाडा में उग्रवाद की समस्या खत्म हो जाएगी, क्योंकि उग्रवाद ने कनाडा की राजनीति में काफी गहरी पैठ बना ली है।"

विवेक काटजू लिखते हैं, कि "कनाडाई विदेश मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने द वाशिंगटन पोस्ट से कहा, कि कनाडा में खालिस्तानियों के खिलाफ हिंसक अभियान के पीछे गृह मंत्री अमित शाह का हाथ था। इस बेतुकी टिप्पणी से, जिसने स्वाभाविक रूप से भारत को नाराज किया, द्विपक्षीय संबंध अपने निम्नतम स्तर पर पहुंच गए। कनाडा ने 2024 के मध्य में चार भारतीयों को निज्जर मामले में शामिल होने का आरोप लगाते हुए गिरफ्तार किया। फिर भी, अब तक, उन पर मुकदमा नहीं चलाया गया है।"

उन्होंने लिखा है, कि "कनाडा में बड़ी संख्या में भारतीय प्रवासियों की मौजूदगी के बावजूद, द्विपक्षीय संबंध भारत के लिए प्राथमिकता नहीं रहे हैं। कनिष्क बम विस्फोट से निपटने के कनाडा के तरीके ने भारत को नाराज कर दिया। खालिस्तानियों के प्रति उसकी उदारता ने उसे नाराज कर दिया। वीजा पर कनाडा की दखलंदाजी ने भारत को लगातार परेशान किया है। दिल्ली अब ट्रूडो के उत्तराधिकारियों से उनके द्वारा किए गए नुकसान की भरपाई करने की उम्मीद करेगी। लेकिन समस्या यह है, कि भारत प्राथमिकता नहीं होगा, क्योंकि वे अपने घरेलू मुद्दों को सुलझाएंगे और ट्रंप से निपटेंगे। इसलिए, निज्जर मामले में कनाडा का "कानून अपना काम कर सकता है" और संबंधों पर छाया डालना जारी रख सकता है।"

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