Explainer: यूरोप में करोड़ों लोग मरे थे, US में लौटी ये जानलेवा बीमारी.. बीबोनिक प्लेग क्या अभी भी है जानलेवा?
What is Bubonic plague: साल 1346, जब दुनिया में एंटी-बायोटिक का आविष्कार नहीं हुआ था, उस वक्त पहली बार बीबोनिक प्लेग का संक्रमण यूरोपीय देशों में फैला था और 7 सालों के अंदर इस खतरनाक बीमारी ने करीब 5 करोड़ से ज्यादा इंसानों के जान ले लिए।
7 सालों में 5 करोड़ लोगों की मौत.. कोरोना वायरस से जूझने के बाद अंदाजा लगाया जा सकता है, कि यूरोपीय देशों ने उन सात सालों में किस खौफनाक माहौल का अनुभव किया है। कहा जाता है, कि शायद की कोई परिवार था, जिसमें किसी की मौत ना हुई हो।

बीबोनिक प्लेग के बारे में कहा जाता है, कि यूरोपीय देशों के हजारों गांवों का नामोनिशान मिट गया था।
लेकिन अब, बीबोनिक प्लेग वापस आ गया है। इस हफ्ते की शुरुआत में, अमेरिका के ओरेगन में स्वास्थ्य अधिकारियों ने बीबोनिक प्लेग के पहले मामले की पुष्टि कर दी है। अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, ऐसी आशंका है, कि बिल्ली की वजह से वो इंसान इस खतरनाक संक्रमण का शिकार हुआ है।
हालांकि, इस बीमारी का फौरन पता चल गया और उस बीमार को तत्काल एंटीबायोटिक्स दी गईं। इसके बाद उस बीमार व्यक्ति के संपर्क में आए हुए तमाम लोगों से संपर्क किया गया, उस बिल्ली के संपर्क में आने वाले तमाम लोगों को आइसोलेट किया गया और उनका भी इलाज किया गया है। हालांकि, इलाज तो बिल्ली का भी किया गया, लेकिन वह बच नहीं पाई।
बीबोनिक प्लेग को कहा जाता है ब्लैक डेथ
बीबोनिक प्लेग को ब्लैक डेथ भी कहा जाता है और इसके होने की वजह यर्सिनिया पेस्टिस नाम का एक जूनोटिक बैक्टीरिया होता है, जो जानवरों और लोगों के बीच फैल सकता है। वाई पेस्टिस आमतौर पर छोटे जानवरों और उनके पिस्सू में पाया जाता है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की रिपोर्ट के मुताबिक, इंसान इस प्लेग से तीन तरीकों से संक्रमित हो सकते हैं।
1- संक्रमित वेक्टर पिस्सू के काटने से
2- संक्रामक शारीरिक तरल पदार्थ या दूषित सामग्री के साथ असुरक्षित संपर्क
3- न्यूमोनिक प्लेग से पीड़ित रोगी की सांस की बूंदों/छोटे कणों के संपर्क में आने से
बीबोनिक प्लेग के क्या हैं लक्षण?
बीबोनिक प्लेग के लक्षण कई तरह से सामने आ सकते हैं। बीबोनिक प्लेग खास तौर पर उन मामलों को संदर्भित करता है जहां बैक्टीरिया लिम्फ नोड्स में प्रवेश कर जाते हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका के रोग नियंत्रण और रोकथाम केंद्र (सीडीसी) के अनुसार, इसकी वजह से तेज बुखार, सिरदर्द, भारी कमजोरी, दर्दनाक सूजन होने के साथ साथ मरीजों को काफी ठंढ लगती है।
वहीं, अगर बैक्टीरिया खून में मिल जाता है, तो फिर ये सेप्टिसेमिक प्लेग बन जाता है। ऐसा तब होता है, अगर बीबोनिक प्लेग होने के बाद मरीज का इलाज नहीं किया जाए और ऐसी स्थिति में मरीज की स्थिति गंभीर हो जाती है। ऐसी स्थिति में मरीजों के पेट में तेज दर्द होने के साथ साथ उसे चक्कर आने लगते हैं, त्वचा से खून निकलने लगता है, शरीर में काली गांठें बनने लगती हैं, हाथ-पैर की उंगलियां काली हो जाती हैं।
सीडीसी के मुताबिक, ऐसा या तो पिस्सू के काटने से होता है, या किसी संक्रमित जानवर को छूने से होता है।
न्यूमोनिक प्लेग सबसे खतरनाक होता है, और डब्ल्यूएचओ के अनुसार, अगर इलाज न किया जाए तो यह हर स्थिति में जानलेवा होता है। जैसा कि नाम से पता चलता है, यह तब होता है जब बैक्टीरिया फेफड़ों में प्रवेश कर जाता है, और मरीजों को निमोनिया हो जाता है। सीडीसी के अनुसार, यह प्लेग का एकमात्र रूप है, जो संक्रामक बूंदों द्वारा एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में फैल सकता है, जो इसे सबसे ज्यादा संक्रामक बनाता है।
ब्लैक डेथ का क्या हुआ असर?
1918-20 की जानलेवा इन्फ्लुएंजा महामारी के फैलने तक, ब्लैक डेथ को इतिहास में फैलने वाली सबसे घातक बीमारी कहा जाता था। 14वीं शताब्दी के काफी कम जनसंख्या स्तर को ध्यान में रखते हुए, कुछ अनुमानों के अनुसार, ब्लैक डेथ अभी भी अब तक का सबसे घातक महामारी है, जिसने यूरोप की आधी आबादी को खत्म कर दिया था।
बीबोनिक प्लेग ने यूरोप के बचे हुए लोगों पर गंभीर प्रभाव छोड़ा। 2022 में नेचर जर्नल में प्रकाशित एक अध्ययन में पाया गया, कि कुछ यूरोप के लोगों में इस प्लेग के खिलाफ एंटीटोड का जन्म हुआ और अभी के हिसाब से इस बीमारी के खिलाफ 40 प्रतिशत लोगों के ज्यादा जिंदा रहने की संभावना हो गई है।
यानि, ये प्लेग अभी भी सीधे तौर पर कुछ ऑटोइम्यून बीमारियों की घटनाओं से जुड़ा हुआ है, जिसका मतलब ये हुआ, कि 700 साल पहले जो हुआ था, वह आज लोगों के स्वास्थ्य पर प्रभाव डाल रहा है।
क्या अब ब्लैक डेथ से डरने की जरूरत है?
नहीं, अब बिल्कुल नहीं। डॉक्टरों को यह उम्मीद नहीं है कि यह बीमारी ओरेगॉन से फैलेगी या इंसानों में किसी मौत का अब कारण बन पाएगी।
1930 के दशक तक बीबोनिक प्लेग महामारी अतीत की बात बन गई। आज, सीडीसी के अनुसार, हर साल दुनिया भर में प्लेग के कुछ हजार मामले ही सामने आते हैं, जिनमें से ज्यादातर मेडागास्कर, डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो और पेरू में होते हैं और ऐसे मामलों में मृत्यु दर लगभग 11 प्रतिशत है, जो काफी ज्यादा है। लेकिन, इन देशों में स्वास्थ्य सुविधाएं काफी ज्यादा खराब हैं।
अब इस प्लेग से डरने की जरूरत इसलिए भी नहीं है, क्योंकि अब इंसानों के पास आधुनिक एंटीबायोटिक्स हैं, जो वाई पेस्टिस द्वारा उत्पन्न खतरे से निपटने में काफी सक्षम हैं। इसके अलावा अब लोगों में जागरूकता भी आई है, जो हम कोरोना संकट के समय देख चुके हैं।
सीडीसी के अनुसार, प्लेग के सभी रूपों का इलाज सामान्य एंटीबायोटिक दवाओं से किया जा सकता है, शुरुआती उपचार से इंसानी जान के बचने की संभावना काफी ज्यादा होती है।
हालांकि वाई पेस्टिस अभी भी लगभग कहीं भी पनप और फैल सकता है, और व्यक्तियों के लिए घातक हो सकता है, लेकिन ब्लैक डेथ की तरह अब ये इतने बड़े स्तर की महामारी बनेगी, ऐसा होना असंभव है।












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