BRICS Summit: ब्रिक्स के विस्तार पर मुहर लगाएंगे मोदी, तगड़ी लॉबिंग और ग्लोबल साउथ, भारत क्या करेगा?
BRICS Summit: रूस के कजान शहर में 22 से 24 अक्टूबर के बीच राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की मेजबानी में होने वाले ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में भारत एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए पूरी तरह से तैयार है। एजेंडे में ब्रिक्स के विस्तार के लिए 10 से ज्यादा नए "भागीदार देशों" को शामिल करने पर चर्चा की जाएगी।
ब्रिक्स का विस्तार बदलते जियो-पॉलिटिक्स और ग्लोबल ऑर्डर के लिए काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है, लेकिन समूह का विस्तार हो पाएगा या नहीं, इसका फैसला भारत को करना है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अन्य ब्रिक्स नेताओं का लक्ष्य संगठन के विस्तार का इस्तेमाल मल्टीलेटरिज्म को बढ़ावा देने और दुनिया भर में ज्यादा न्यायसंगत ढेवलपमेंट का समर्थन करने के लिए करना है। यह कदम बदलती विश्व व्यवस्था को दर्शाता है, जिसमें विभिन्न संकट और विकसित होते शक्ति संतुलन शामिल हैं।
ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में इसबार क्या खास होने वाला है?
शिखर सम्मेलन में भारत का नजरिया आर्थिक आकांक्षाओं, वैश्विक शासन सुधार समर्थन और ब्रिक्स देशों के बीच गैर-शत्रुता को प्राथमिकता देता है और भारत की नजर भू-राजनीतिक तनाव और चीन और पाकिस्तान के बीच के मजबूत संबंध पर टिकी है, क्योंकि चीन की कोशिश पाकिस्तान को इस संगठन में शामिल करने की है, ताकि समूह में उसका प्रभुत्व और बढ़े, मगर भारत ऐसा हरगिज नहीं चाहेगा।
करीब 10 से 15 ऐसे देश हैं, जो ब्रिक्स की स्थाई सदस्यता चाहते हैं और रिपोर्ट्स के मुताबिक, इन देशों ने ब्रिक्स में शामिल होने के लिए आवेदन भी दिया है और ब्रिक्स के विस्तार का फैसला समूह के देशों को करना है, लेकिन चीन, रूस और भारत, तीनों की कोशिश अपने लिए रणनीतिक तौर पर महत्वपूर्ण देशों को इसका सदस्य बनाना है, ताकि ब्रिक्स के अंदर इनका प्रभाव बढ़े।
लिहाजा, ब्रिक्स के सबसे बड़े शिखर सम्मेलन के एजेंडे में "भागीदार देशों" के रूप में और ज्यादा देशों को शामिल करना सबसे ऊपर होगा, जिसकी मेजबानी रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन 22-24 अक्टूबर को तातारस्तान की राजधानी में करेंगे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नियमित और आउटरीच/ब्रिक्स प्लस सत्रों में भाग लेने के लिए लगभग 40 अन्य प्रमुख नेताओं के साथ शामिल होंगे।

16वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन ग्लोबल ऑर्डर में अभूतपूर्व उथल-पुथल के बीच हो रहा है। संकट और संघर्ष बढ़ रहे हैं, और भू-राजनीतिक तनाव गहरी होती जा रही हैं। सत्ता और वर्चस्व के लिए चल रहे जंग के बीच देशों का एक दूसरे के प्रति अविश्वास गहराता जा रहा है। पुरानी व्यवस्था ढह रही है, लेकिन उभरती हुई विश्व व्यवस्था की रूपरेखा सिर्फ धुंधली दिखाई दे रही है।
ब्रिक्स की रूसी अध्यक्षता का आदर्श वाक्य है "समान वैश्विक विकास और सुरक्षा के लिए बहुपक्षवाद को मजबूत करना।" यहां दो मुख्य अभिव्यक्तियां हैं "बहुपक्षवाद को मजबूत करना" और "समान विकास", जो ब्रिक्स के भविष्य की दिशा के साथ-साथ उभरती हुई विश्व व्यवस्था को भी दर्शाती हैं। समानता और समावेश की यही खोज थाईलैंड और वियतनाम से लेकर क्यूबा और सेनेगल तक बड़ी संख्या में देशों को ब्रिक्स में शामिल होने के लिए प्रेरित कर रही है।
ग्लोबल साउथ पर भारत का फोकस
कज़ान में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में भारत का व्यापक एजेंडा, समूह के विस्तार को ग्लोबल साउथ (दुनिया के गरीब देश) के हितों के मुताबिक तरीके से प्रबंधित करना और समूह पर चीनी वर्चस्व को रोकना होगा। चौंतीस देशों ने औपचारिक रूप से ब्रिक्स सदस्यता के लिए आवेदन किया है। कजान शिखर सम्मेलन में लगभग 10-15 देशों को भागीदार देशों के रूप में शामिल किए जाने की उम्मीद है, जो 2025 में अगले शिखर सम्मेलन में नए सदस्यों के रूप में उनके शामिल होने का मार्ग खोलेगा।
रूस ने जो रूपरेखा तैयार की है, उसके मुताबिक प्रत्येक ब्रिक्स सदस्य देश अपने पसंदीदा उम्मीदवारों की लिस्ट शेयर करेगा और इस आधार पर 10-15 देशों का चयन किया जाएगा।

ब्रिक्स में शामिल होने की रेस
कजान में होने वाले ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में ब्रिक्स के सदस्य बनने के इच्छुक देशों और उनके समर्थकों की तरफ से काफी तेज लॉबिंग की जा रही है। भारत, चीन और रूस सहित ब्रिक्स के संस्थापक सदस्य यह सुनिश्चित करने के लिए गहन वार्ता में शामिल होंगे, कि उनके मित्रवत देश समूह में शामिल हो सकें।
रूसी प्रेसीडेंसी ने नए भागीदार देशों और सदस्यों को शामिल करने के लिए अपने मानदंड निर्धारित किए हैं। इन मानदंडों में शामिल हैं
I) इच्छुक देश के अन्य ब्रिक्स सदस्यों के साथ अच्छे संबंध होने चाहिए
II) इच्छुक देश को किसी अन्य ब्रिक्स देश के खिलाफ प्रतिबंधों का समर्थन नहीं करना चाहिए
III) इच्छुक देश को आर्थिक रूप से महत्वाकांक्षी होना चाहिए
IV) इच्छुक देश को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के सुधार और विस्तार सहित वैश्विक शासन सुधारों का समर्थन करना चाहिए
भारत इन मानदंडों का समर्थन करता है, लेकिन जो देश शामिल होना चाहते हैं, उनके साथ संबंध कैसे हैं, भारत के लिए सबसे खास बात यही है।
नई दिल्ली के विचार में, किसी भी संभावित देश के भारत के साथ शत्रुतापूर्ण संबंध नहीं होने चाहिए। इस पैमाने पर देखा जाए, तो भारत पाकिस्तान की उम्मीदवारी का विरोध कर रहा है, जिसका समर्थन चीन कर रहा है।
शीर्ष सूत्रों ने खुलासा किया है, कि खराब संबंधों के अलावा, भारत को लगता है कि पाकिस्तान के शामिल होने से ब्रिक्स में कोई मूल्य नहीं जुड़ेगा। सूत्रों ने कहा, कि भारत यह सुनिश्चित करेगा कि ब्रिक्स का चरित्र उभरती बाजार अर्थव्यवस्थाओं के समूह के रूप में बना रहे, न कि पड़ोसियों के बीच भू-राजनीतिक संघर्षों को दर्शाने वाला मंच बन जाए।

ब्रिक्स के लिए आगे का रास्ता क्या होगा?
भारत यह भी सुनिश्चित करेगा, कि ब्रिक्स पश्चिम विरोधी मंच न बन जाए। शिखर सम्मेलन में अपने भाषण में, प्रधानमंत्री मोदी से अपेक्षा की जाती है, कि वे ब्रिक्स को वैश्विक सार्वजनिक भलाई और दुनिया में शांति और सद्भाव के लिए एक ताकत के रूप में पेश करेंगे।
भारत ब्रिक्स+ समूह में गुटनिरपेक्ष देशों के साथ मिलकर काम करेगा, खासकर उन देशों के साथ, जिनके पश्चिम के साथ अच्छे संबंध हैं, ताकि कुछ देशों द्वारा (खासकर चीन और रूस) ब्रिक्स+ को पश्चिम विरोधी गठबंधन में बदलने के एजेंडे का मुकाबला किया जा सके।
शिखर सम्मेलन से पहले, पुतिन ने प्रधानमंत्री मोदी के हवाले से तर्क दिया है, कि ब्रिक्स समूह पश्चिम विरोधी नहीं है, लेकिन यह आने वाले वर्षों में वैश्विक आर्थिक विकास को गति देगा। ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से पहले पुतिन ने कहा, "ब्रिक्स का कभी किसी के खिलाफ होना मतलब नहीं था। भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी कहा है, कि ब्रिक्स पश्चिम विरोधी समूह नहीं बल्कि गैर-पश्चिमी समूह है।"
ब्रिक्स में भारत का प्राथमिक ध्यान इस समूह का उपयोग संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) और अन्य प्रमुख वैश्विक शासन संस्थाओं के सुधार और विस्तार को गति देने के लिए करना होगा। प्रधानमंत्री मोदी से वैश्विक शासन सुधारों के लिए अपनी आवाज उठाने की उम्मीद है, क्योंकि नये सदस्य देशों के जुड़ने से ब्रिक्स की सामूहिक सौदेबाजी की ताकत भी बढ़ेगी।
ब्रिक्स समूह में सबसे बड़ा लोकतंत्र भारत है और ग्लोबल साउथ के प्रमुख मंच के रूप में ब्रिक्स के भविष्य के विकास को आकार देने में मुख्य भूमिका निभाएगा, ब्रिक्स के विस्तार होने के बाद भी इसके अधिकांश देश विकासशील देश होंगे। विस्तारित ब्रिक्स+, ग्लोबल साउथ के हितों और प्राथमिकताओं को अंतर्राष्ट्रीय एजेंडे पर रखने के लिए जी20 जैसे अन्य बहुपक्षीय समूहों में भारत की कोशिशों की दिशा में एक कदम होगा।












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