इजराइल-ईरान में शांति करवा रहा या आग में घी डाल रहा अमेरिका? मिडिल ईस्ट पर बाइडेन प्रशासन का 'डबल गेम'!
This article examines the Biden administration's involvement in the Middle East, highlighting its support for Israel amid ongoing conflicts with Iran. It poses critical questions about the administration's true intention
Israel-Iran conflict: आइसक्रीम का स्वाद लेते हुए अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन ने इस साल फरवरी में घोषणा की थी, कि गाजा में युद्ध खत्म होना इतना नजदीक पहुंच गया है, कि अब यह कुछ दिनों में ही 'साकार' हो सकता है।
लेकिन उनके बयान के सात महीने से ज्यादा समय बाद भी, न सिर्फ गाजा पट्टी में इजराइली बमबारी जारी है, बल्कि अब यह फैलकर लेबनान, सीरिया और यमन तक जा पहुंचा है और आशंका इस बात को लेकर है, कि कहीं ईरान और इजराइल के बीच पूर्ण युद्ध ना शुरू हो जाए, जिससे पूरा मिडिल ईस्ट खतरे में फंस सकता है और भीषण तबाही मच सकती है।

बाइडेन प्रशासन ने युद्ध को जारी रखने के लिए इजराइल को लगातार राजनीतिक समर्थन के साथ साथ बमों की सप्लाई की है, हालांकि मौखिक तौर पर राष्ट्रपति बाइडेन और उनके अधिकारियों ने बार बार तनाव को खत्म करने का आह्वान किया है, जिसका इजराइल पर कोई असर नहीं हुआ है।
वाशिंगटन ने इस साल इजराइल की तरफ से उठाए गए लगभग हर कदम का स्वागत किया है, जिनमें बेरूत और तेहरान में हमास नेताओं की हत्या, हिज्बुल्लाह प्रमुख हसन नसरल्लाह की हत्या और दक्षिण लेबनान पर आक्रमण शामिल हैं। गाजा में युद्ध शुरू होने के एक साल से ज्यादा समय बीतने के बाद अब फिलीस्तीनी क्षेत्र तबाह हो चुका है और 42 हजार से ज्यादा लोग मारे गये हैं, जबकि अब इजराइली बम लेबूनान की राजधानी बेरूत में बरस रहे हैं और प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने हिज्बुल्लाह के संपूर्ण विनाश का अल्टीमेटम दिया है।
लेकिन, एक चीज जो लगातार देखा गया है, कि जैसे जैसे मिडिल ईस्ट का संघर्ष बढ़ता जा रहा है, बाइडेन प्रशासन की कथनी और करनी के बीच का अंतर और बढ़ता जा रहा है।
लिहाजा ये सवाल उठाना सबसे ज्यादा जरूरी हो गया है, कि क्या बाइडेन प्रशासन, इजराइल को कंट्रोल करने में फेल हो गया है, क्या बाइडेन प्रशासन वाकई मिडिल ईस्ट युद्ध को बुझाने की कोशिश कर रहा है, या फिर वो अमेरिका ही है, जो लगातार इस युद्ध की आग में घी डाल रहा है?
कई एक्सपर्ट्स तो ये तक सवाल उठा रहे हैं, कि क्या अमेरिका, ईरान, हमास और हिज्बुल्लाह के खिलाफ एक आक्रामक एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए अराजकता का फायदा उठा रहा है?
विश्लेषकों का कहना है, कि इजराइल को अमेरिका लगातार हथियारों की सप्लाई करने के साथ साथ डिप्लोमेटिक समर्थन दे रहा है और बाइडेन प्रशासन की कमजोरी मिडिल ईस्ट की आग को लगातार भड़काए हुआ है। एक्सपर्ट्स का कहना है, कि बाइडेन प्रशासन के इरादों के बारे में अनुमान लगाना मुश्किल है, लेकिन ऐसे सबूतों की भरमार है, जो दिखाती है कि बाइडेन प्रशासन इजराइल के साथ कदम से कदम मिलाकर चल रहा है।

अमेरिका की कथनी-करनी में फर्क कैसे है?
गाजा में युद्ध विराम के लिए महीनों तक चले सार्वजनिक कोशिशों के बाद, अमेरिका ने अपना ध्यान लेबनान में इजराइली आक्रमण का समर्थन करने पर केंद्रित कर लिया है। अमेरिकी रक्षा सचिव लॉयड ऑस्टिन ने पिछले सप्ताह दक्षिणी लेबनान में इजराइली जमीनी अभियान का समर्थन किया था, जिसके बाद आशंका है, कि इजराइल, पूरे लेबनान में अब जमीनी सैन्य अभियान चला सकता है।
ऑस्टिन ने 30 सितंबर को अपने इजराइली समकक्ष योआव गैलेंट के साथ बातचीत के बाद एक बयान में कहा, "मैंने यह स्पष्ट कर दिया है, कि संयुक्त राज्य अमेरिका इजराइल के आत्मरक्षा के अधिकार का समर्थन करता है।"
ऑस्टिन ने कहा, "हम सीमा पर हमले के बुनियादी ढांचे को नष्ट करने की आवश्यकता पर सहमत हुए हैं, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि लेबनानी हिज्बुल्लाह, इजराइल के उत्तरी समुदायों पर 7 अक्टूबर की शैली के हमले न कर सके।"
उन्होंने दक्षिणी इजराइल पर फिलिस्तीनी आतंकवादी संगठन हमास के हमले का जिक्र किया, जिसमें 1200 लोगों की बेरहमी से हत्या कर दी गई थी। और इसके बाद इजराइल ने गाजा में ऑपरेशन शुरू किया और उसी दिन से हिज्बुल्लाह ने भी इजराइल पर हमले शुरू कर दिए थे। इस संघर्ष ने लेबनान और इजराइल, दोनों तरफ के सीमावर्ती इलाकों में हजारों लोगों को अपने घरों से भागने के लिए मजबूर कर दिया है और लाख से ज्यादा इजराइली और लेबनानी नागरिक विस्थापित हुए हैं।

हिज्बुल्लान ने बार बार धमकी दी है, कि जब तक गाजा में इजराइली हमले बंद नहीं होते हैं, वो इजराइल पर हमले करना जारी रखेगा, जबकि इजराइली सरकार पर दबाव इस बात को लेकर है, कि वो विस्थापित इजराइली नागरिकों को जल्द से जल्द घरों तक लौटने का माहौल तैयार करें। लेकिन, ऐसा हो नहीं पाया है।
वहीं, इजराइल ने अब तेजी से हिज्बुल्लाह की टॉप लीडरशिप को खत्म करना शुरू कर दिया है और 23 सितंबर की देर रात लेबनान में भारी बमबारी शुरू होने के बाद से कई प्रमुख नेता मारे गये हैं और हजारों लोग पलायन को मजबूर हुए हैं।
लेबनान में इजराइली हमले शुरू होने से पहले, व्हाइट हाउस महीनों से कह रहा था कि वह लेबनान-इजराइल सीमा पर संकट के कूटनीतिक समाधान तलाशने की दिशा में काम कर रहा है। अमेरिकी दूत अमोस होचस्टीन ने इस क्षेत्र का बार-बार दौरा किया और तनाव बढ़ने के खिलाफ चेतावनी दिए, लेकिन कोई असर नहीं हुआ।
लेबनान और इजराइल में बिगड़ती स्थिति के बीच बाइडेन प्रशासन ने अरब और यूरोपीय देशों को एकजुट किया और लड़ाई को रोकने के लिए 25 सितंबर को "तत्काल" 21-दिवसीय युद्धविराम का प्रस्ताव रखा।
फिर भी, दो दिन बाद, जब इजराइल ने बेरूत में कई आवासीय इमारतों पर एक बड़े बम हमले में नसरल्लाह की हत्या कर दी और युद्धविराम की किसी भी संभावना को प्रभावी ढंग से खत्म कर दिया, जिसके बाद व्हाइट हाउस की तरफ से जारी बयान में इस हमले की सराहना "न्याय के उपाय" के रूप में की गई। नसरल्लाह की हत्या का आदेश इजराइली प्रधान मंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने अमेरिकी धरती से दिया था, जब वो न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा में भाग ले रहे थे।
एक्सपर्ट्स का कहना है, कि अमेरिका, गाजा और बाकी क्षेत्र में इजराइल की कार्रवाइयों का प्रत्यक्ष भागीदार और समर्थक रहा है, लेकिन बाइडेन प्रशासन ने युद्धविराम वार्ता का इस्तेमाल खुद को घरेलू आलोचना से बचाने के लिए "घरेलू राजनीति" की चाल के रूप में किया। खलील ने पिछले महीने अल कहा था, कि "यह सब बातचीत के लिए बातचीत थी, खासकर जब युद्ध तेजी से फैल गया है।"

क्या मिडिल ईस्ट में नया गेम खेल रहा अमेरिका?
पोलिटिको ने 30 सितंबर को अज्ञात स्रोतों का हवाला देते हुए बताया है, कि वरिष्ठ अमेरिकी अधिकारियों- जिनमें होचस्टीन और मध्य पूर्व के लिए सिक्योरिटी काउंसिल कॉर्डिनेटर ब्रेट मैकगर्क शामिल हैं- उन्होंने निजी तौर पर हिज्बुल्लाह के खिलाफ इजराइली सैन्य अभियान का समर्थन किया है।
अमेरिकी अखबार ने बताया है, कि "पर्दे के पीछे, होचस्टीन, मैकगर्क और अन्य शीर्ष अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा अधिकारी इजराइल के लेबनान अभियान को इतिहास को परिभाषित करने वाला क्षण बता रहे हैं - जो आने वाले वर्षों में मध्य पूर्व को बेहतर रूप से नया स्वरूप देगा।"
इसके अलावा, एक्सियोस ने पिछले हफ्ते रिपोर्ट की थी, कि बाइडेन प्रशासन, लेबनान में अमेरिका समर्थक राष्ट्रपति को इंस्टॉल करना चाहता है और इसके लिए वो इजराइल से हिज्बुल्लाह पर हमले करवा रहा है और इस युद्ध का फायदा उठाने की केोशिश कर रहा है।
आपको बता दें, कि लेबनान में पिछले दो सालों से राष्ट्रपति पद खाली है और संसद में कौन राष्ट्रपति बनेगा, उसपर सहमति नहीं बन पा रही है, क्योंकि देश की संसद में हिज्बुल्लाह के भी कई सांसद हैं।
मंगलवार को, अमेरिकी विदेश विभाग के प्रवक्ता मैथ्यू मिलर ने लेबनान में युद्ध को देश को राजनीतिक रूप से बदलने का एक "अवसर" बताया। उन्होंने कहा, कि वाशिंगटन चाहता है कि लेबनानी लोगों के पास "एक नया राष्ट्रपति चुनने की क्षमता हो [और] देश पर हिज्बुल्लाह द्वारा बनाए गए गतिरोध को तोड़ने की क्षमता हो"।
वहीं, किसी क्षेत्र को नया स्वरूप देना हमेशा से ही अमेरिकी नव-रूढ़िवादी आंदोलन का लक्ष्य रहा है, जो इजराइल के लिए समर्थन को बढ़ावा देता है और आक्रामक विदेश नीति और सैन्य हस्तक्षेप के माध्यम से अमेरिका के अनुकूल सरकारों को इंस्टॉल करता है। यह दृष्टिकोण पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश के कार्यकाल में सबसे स्पष्ट रूप से दिखाई दिया था।
दरअसल, 18 साल पहले राष्ट्रपति बुश के कार्यकाल के दौरान, जब इजराइल ने हिज्बुल्लाह के साथ अपना आखिरी बड़ा युद्ध लड़ा था, तब तत्कालीन विदेश मंत्री कोंडोलीज़ा राइस ने "एक नए मध्य पूर्व के जन्म की पीड़ा" की बात की थी। और बुश युग के कई नव-रूढ़िवादी अब डेमोक्रेटिक पार्टी से जुड़े हुए हैं और नवंबर के चुनाव में राष्ट्रपति पद के लिए उपराष्ट्रपति कमला हैरिस का समर्थन कर रहे हैं।

पूरी तरह से बर्बाद हो चुका है गाजा
इजराइल ने गाजा को तहस-नहस कर दिया है और 23 लाख लोग अब विस्थापित होकर अकाल के कगार पर पहुंच गये हैं, जिसने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर संकट को जन्म दिया है, जिसे देखते हुए बाइडेन ने अपना स्वर नरम करना शुरू कर दिया है। हाल के महीनों में, अमेरिका ने "युद्धविराम" शब्द को एक समझौते के लिए अपनाया, जिससे गाजा में लड़ाई समाप्त हो जाएगी और घेरे हुए एन्क्लेव में फिलिस्तीनी समूहों की कैद से इजराइली बंदियों को रिहा किया जा सकेगा।
लेकिन इसने नेतन्याहू पर समझौते को स्वीकार करने के लिए दबाव बनाने में बहुत कम मदद की है।
चाहे बाइडेन और उनके सहयोगी वास्तव में युद्धविराम चाहते हैं या फिर वो इजराइल पर प्रेशर बनाने में नाकाम रहे हैं, लेकिन हकीकत यही है, कि गाजा में हजारों आम लोग मारे गये हैं, जिसकी जवाबदेही लेने वाला कोई नहीं है।












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