इजराइल में फिर बनी बेंजामिन नेतन्याहू की सरकार, बहुमत के साथ की धमाकेदार वापसी

बेंजामिन नेतन्याहू एक बार फिर से पीएम पद की कुर्सी संभालने जा रहे हैं। देश में पूरा विपक्ष चाहकर भी बेंजामिन नेतन्याहू को सत्ता से अधिक समय तक दूर नहीं रखा पाया।

इजरायल के राजनीतिक इतिहास में सबसे मजबूत प्रधानमंत्री कहे जाने वाले बेंजामिन नेतन्याहू एक बार फिर से पीएम पद की कुर्सी संभालने जा रहे हैं। उनकी पार्टी ने सहयोगी दलों के साथ मिलकर जरूरी सीटें हासिल कर ली हैं। देश में पूरा विपक्ष चाहकर भी बेंजामिन नेतन्याहू को सत्ता से अधिक समय तक दूर नहीं रखा पाया। और अब बेंजामिन नेतन्याहू इजरायल में छठी बार सत्ता संभालने जा रहे है। नेतन्याहू के नाम पहले से ही इजरायली सत्ता पर सबसे लंबे समय तक काबिज रहने का रिकॉर्ड है।

शुरुआती वक्त अमेरिका में बीता

शुरुआती वक्त अमेरिका में बीता

बेंजामिन नेतन्याहू का जन्म तेल अवीव में 1949 में हुआ था। उनके पिता का नाम बेंजिऑन नेतन्याहू है। वह एक यहूदी एक्टिविस्ट और इतिहासकार थे। अमेरिका से एक एकैडमिक पोस्ट से जुड़ा प्रस्ताव आने के बाद बेंजिऑन परिवार सहित 1963 में अमेरिका चले गए। चार साल अमेरिका में रहने के बाद बेंजामिन नेतन्याहू इजरायल लौट आए। पांच साल तक बेंजामिन ने इजरायली सेना का हिस्सा रहे। इस दौरान उन्होंने एक अहम कमांडो यूनिट में कैप्टन का पद संभाला।

भाई की मौत ने बदली जिंदगी

भाई की मौत ने बदली जिंदगी

नेतन्याहू 1968 में बेरूत एयरपोर्ट पर हुए एक ऑपरेशन में भी शामिल थे। इसके साथ ही उन्होंने 1973 में मध्य-पूर्व का युद्ध भी लड़ा। सेना की ड्यूटी खत्म होने के बाद नेतन्याहू फिर से अमरीका चले गए। अमेरिका में रहकर उन्होंने एमआईटी से बैचलर और मास्टर्स की पढ़ाई की। इसी बीच बेंजामिन की जिंदगी में कुछ ऐसा हुआ कि उनकी पूरी जिंदगी ही बदल गई। दरअसल इजरायली सैनिकों ने साल 1976 में युगांडा में बंधक बने अपने नागरिकों को बचाने के लिए एक साहसिक ऑपरेशन को अंजाम दिया था। इस अभियान में बेंजामिन नेतन्याहू के भाई जोनाथन को अपनी जान गंवानी पड़ी थी।

अंग्रेजी ज्ञान की वजह से मिली खूब पहचान

अंग्रेजी ज्ञान की वजह से मिली खूब पहचान

अपने भाई की मौत का नेतन्याहू पर गहरा असर पड़ा। बेंजामिन ने अपने भाई की याद में एक आतंकवाद विरोधी इंस्टिट्यूट की स्थापना की। इस वजह से अमेरिका में इजरायल के राजदूत और भविष्य के विदेश मंत्री मोशे एरेन्स का ध्यान बेंजामिन की तरफ गया। 1982 में एरेन्स ने बेन्जामिन नेतन्याहू को वॉशिंगटन में अपना डिप्टी चीफ ऑफ मिशन नियुक्त किया। वही दिन जब बेंजामिन नेतन्याहू जीवन का एक मकसद मिला था। इस मौके को उन्होंने खूब भुनाया भी। बेहतरीन अंग्रेजी बोलने वाले बेंजामिन नेतन्याहू जल्द ही अमेरिकी टेलीविजन पर जाना-पहचाना चेहरा बन गए।

देश लौटने के बाद ज्वाइन की पार्टी

देश लौटने के बाद ज्वाइन की पार्टी

बेहतरीन वक्ता होने की वजह से बेंजामिन पश्चिमी मीडिया में अपने देश इजरायल का बड़ी ही मुखरता से पक्ष रखने लगे थे। नेतन्याहू की इस खूबियों को जानकर सरकार ने 1984 में न्यूयॉर्क में यूएन में इजरायल का स्थायी प्रतिनिधि बना दिया। लंबे वक्त तक अमेरिका में रहने के बाद 1993 में बेंजामिन इजरायल वापस लौटे और पॉलिटिक्स ज्वाइन कर लिया। बेंजामिन को लिकुड पार्टी का चेयरमैन नियुक्त किया गया। साल 1996 में प्रधानमंत्री यित्जाक रॉबिन की हत्या हो गई। इसके के बाद तत्कालीन राष्ट्रपति शिमोन पेरेज ने तुरंत जल्द चुनाव की घोषणा कर दी।

48 की उम्र में पीएम बने बेंजामिन नेतन्याहू

48 की उम्र में पीएम बने बेंजामिन नेतन्याहू

1996 में हुए आम चुनाव में उन्हें लोगों का जबरदस्त समर्थन मिला। अपने पहले ही चुनाव में बेंजामिन नेतन्याहू ने इजरायल के शिमोन पेरेज को बुरी तरह हरा कर संसदीय चुनाव जीत लिया। बेंजामिन नेतन्याहू इजरायल के प्रधामंत्री बनाए गए। मात्र 48 साल की उम्र में सबसे कम उम्र के पीएम बनकर नेतन्याहू ने इतिहास बना डाला। 1999 में नेतन्याहू ने 17 महीने पहले चुनाव की घोषणा कर दी और इसमें उन्हें हार का सामना करना पड़ा। चुनाव हारने के बाद नेतन्याहू ने संसदीय सदस्य और लिकुड पार्टी के चेयरमैन से इस्तीफा दे दिया।

हार के बाद बेंजामिन नेतन्याहू ने राजनीति छोड़ी

हार के बाद बेंजामिन नेतन्याहू ने राजनीति छोड़ी

चुनाव हारने के बाद बेंजामिन नेतन्याहू ने राजनीति छोड़ दी और व्यापार के क्षेत्र में काम करने का मन बना लिया। लेकिन 2001 में जब एरियल शरोन प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने फिर से नेतन्याहू की सरकार में वापसी कराई। इस सरकार में वह पहले विदेश मंत्री बने और फिर बाद में वित्त मंत्री बने। वित्त मंत्री के रूप में, नेतन्याहू ने इजरायल की अर्थव्यवस्था के प्रमुख सुधारों की शुरुआत की। लेकिन दुबारा से राजनीति में लाने वाले अपने प्रधानमंत्री से ही बेंजामिन नेतन्याहू का विवाद हो गया। नेतन्याहू ने 2005 में उन्होंने गाजा पट्टी से सैनिकों की वापसी के फैसले पर विरोध के कारण इस्तीफा दे दिया।

एरियल शरोन के बाद पार्टी पर किया कब्जा

एरियल शरोन के बाद पार्टी पर किया कब्जा

2005 में एरियल शरोन की तबीयत बुरी तरह खराब हो गई और उन्हें कोमा में भर्ती करना पड़ा था। लिकुड पार्टी में मतभेद उभरा और वह दो फाड़ हो गई। एक पार्टी कदीमा बनी और दूसरी पार्टी लिकुड थी। नेतन्याहू ने लिकुड पार्टी का नेतृत्व जीता और वह शरोन के उत्तराधिकारी और कदीमा पार्टी के नेता एहुद ओलमर्ट के कड़े आलोचक के रूप में सामने आए। मार्च 2009 में नेतन्याहू ने दूसरी बार चुनाव जीता। नेतन्याहू ने दक्षिणपंथ, राष्ट्रवादी और धार्मिक पार्टियों को मिलाकर एक गठजोड़ तैयार किया। नेतन्याहू सरकार की अंतरराष्ट्रीय समुदाय में आलोचना हुई। यह आलोचना फ़लस्तीनियों के साथ शांतिवार्त नहीं बहाल करने की वजह से हुई।

लग चुके हैं भ्रष्टाचार के आरोप

लग चुके हैं भ्रष्टाचार के आरोप

नेतन्याहू पर भ्रष्टाचार के अलग-अलग आरोप लगते रहे हैं। उनपर आरोप लग चुका है कि उन्होंने एक फ्रांसीसी दलाल से 2009 के चुनावी कैंपेन में लाखों यूरो कि मदद ली थी ताकि वो चुनाव जीत सकें। इसके बदले नेतन्याहू और उनकी पत्नी सारा पर एक सरकारी कॉन्ट्रैक्टर से निजी काम कराने का आरोप भी लगा था। इसके अलावा नेतन्याहू पर जर्मनी से खरीदे गए युद्धपोतों में गड़बड़ी को लेकर जांच शुरू हुई थी। फिलहाल इन तमाम विवादों से इतर बेंजामिन नेतन्याहू इजरायल के इतिहास के सबसे चर्चित पीएम रहे हैं और इस बार की जीत इस दावे पर मुहर भी लगा चुकी है।

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