ऑस्ट्रेलियाई शोधकर्ताओं ने पार्किंसंस से निपटने के लिए हाइड्रोजेल विकसित किया
कैनबरा, 12 अगस्त। ऑस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने फ्लोरी इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूरोसाइंस एंड मेंटल हेल्थ के सहयोग से अमीनो एसिड से बना एक जेल विकसित किया है, जिसे मस्तिष्क में इंजेक्ट किया जा सकता है ताकि क्षति की मरम्मत में मदद मिल सके.

हाइड्रोजेल अमीनो एसिड से बनाया जाता है और इसे शरीर में इंजेक्ट किया जा सकता है. यह जेल मस्तिष्क के उन हिस्सों का इलाज कर सकता है जिनमें सक्रिय तत्व नहीं होते हैं.
हाइड्रोजेल कैसे करता है काम
शोधकर्ताओं ने इस हाइड्रोजेल की खूबियों के बारे में बताते हुए कहा कि इसे हिलाकर तरल में बदल दिया जाता है जिससे मस्तिष्क में रक्त वाहिकाओं में प्रवेश करना आसान हो जाता है. नसों में प्रवेश करने के बाद यह अपने मूल रूप में थक्का बनना शुरू कर देता है. इस तरह से यह मस्तिष्क के क्षतिग्रस्त हिस्सों तक पहुंचने वाली स्टेम कोशिकाओं को आसानी से बदल देता है.
ऑस्ट्रेलिया के नेशनल यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर डेविड निस्बेट कहते हैं, "इस इलाज को गेम चेंजर कहा जा रहा है क्योंकि यह एक बार में इस्तेमाल किया जा सकता है." प्रोफेसर डेविड कहते हैं, "पार्किंसंस के मरीजों के अस्पताल आने पर इस तरह के इंजेक्शन से उन्हें आने वाले कई सालों तक कई और लक्षणों से बचाया जा सकता है."
संभव होगा इलाज
ऑस्ट्रेलियाई शोधकर्ताओं द्वारा आविष्कार किया गया हाइड्रोजेल का अभी तक केवल जानवरों पर परीक्षण किया गया है. चूहों पर इन प्रयोगों के नतीजों से पता चला कि इन चूहों में पार्किंसंस रोग पर इसका स्पष्ट प्रभाव पड़ा. प्रोफेसर डेविड को उम्मीद है कि एक बार जब यह निश्चित हो जाएगा कि इंसानों के लिए इसका इस्तेमाल सभी प्रकार के खतरों और जटिलताओं से सुरक्षित है, तो अगले 5 सालों में इसका क्लीनिकल ट्रायल शुरू हो जाएगा.
प्रोफेसर डेविड ने यह भी कहा कि इस नए हाइड्रोजेल का उत्पादन अपेक्षाकृत सस्ता है और इसे आसानी से बड़े पैमाने पर उत्पादित किया जा सकता है. उनके मुताबिक यह करना और भी आसान हो जाएगा जब इसे नियामकों द्वारा मंजूरी मिल जाएगी.
पार्किंसंस आमतौर पर 50 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों को प्रभावित करता है. शुरुआत में शरीर कांपने लगता है. बाद में संतुलन कायम करने में समस्या, चलने में परेशानी समेत और भी लक्षण दिखने लगते हैं.
ऑस्ट्रेलिया में लगभग एक लाख लोगों को पार्किंसंस है, जबकि दुनिया भर में करोड़ों लोग इस बीमारी से ग्रसित हैं. लेकिन इस बीमारी का अब तक पूर्ण इलाज नहीं मिल पाया है.
एए/वीके (रॉयटर्स)
Source: DW












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