चीन का काउंटर: भारत के दो पार्टनर्स ऑस्ट्रेलिया-जापान ने बेतहाशा बढ़ाया डिफेंस खर्च, क्वाड से कांपता ड्रैगन

इंडो-पैसिफिक में चीन को काउंटर करने के लिए क्वाड का गठन किया गया है, जिसमें ऑस्ट्रेलिया के अलावा चीन, जापान और भारत शामिल हैं।

Australia Unveils biggest Defense Spending

Australia Unveils biggest Defense Spending: क्वाड के चार पार्टनर्स, अमेरिका, भारत, ऑस्ट्रेलिया और जापान... स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (एसआईपीआरआई) की रिपोर्ट के मुताबिक, इन चारों देशों ने अपना डिफेंस खर्च रिकॉर्ड स्तर पर बढ़ा दिया है और इन चारों देशों का मकसद एक है, चीन को काउंटर करना, जो इंडो-पैसिफिक समेत, पूरी दुनिया के लिए सिरदर्द बन चुका है।

ऑस्ट्रेलिया ने अपनी नई रक्षा सामरिक समीक्षा नीति का अनावरण किया है, जिसमें कहा गया है, कि ऑस्ट्रेलिया की सेना का अब मकसद बदल गया है और अब सेना का मकसद, सिर्फ ऑस्ट्रेलिया की रक्षा करना ही नहीं रहा है, बल्कि अब ऑस्ट्रेलियन सेना का मकसद, नियम आधारित वैश्विक व्यवस्था कायम करने में सहयोगी देशों के साथ मिलकर काम भी करना है।

ऑस्ट्रेलिया ने दशकों बाद बढ़ाया डिफेंस खर्च

ऑस्ट्रेलिया ने द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से पहली बार, अपना डिफेंस स्पेंडिंग को रिकॉर्ड स्तर तक बढ़ा दिया है। अब तक ऑस्ट्रेलिया ने अपना सैन्य खर्च काफी कम कर रखा था, लेकिन ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, ऑस्ट्रेलिया ने लंबी दूरी तक मार करने वाली मिसाइलों, गोला-बारूद और पनडुब्बियों के निर्माण के लिए अपना खजाना खोल दिया है।

राजधानी कैनबरा में रक्षा सामरिक समीक्षा का शुभारंभ करते हुए, प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीस ने कहा, कि उनकी सरकार की रणनीति ऑस्ट्रेलिया को ज्यादा आत्मनिर्भर, ज्यादा तैयार और ज्यादा सुरक्षित बनाने के लिए डिज़ाइन की गई है। जाहिर है, ऑस्ट्रेलियन प्रधानमंत्री चीन से अपने देश की सुरक्षा का जिक्र कर रहे थे, जो बार बार ऑस्ट्रेलिया को बर्बाद करने की धमकी देता रहता है।

ऑस्ट्रेलियन प्रधानमंत्री ने साफ शब्दों में कहा, कि "हम पुरानी धारणाओं के आधार पर पीछे नहीं हट सकते। हमें भविष्य को आकार देने के लिए इंतजार करने के बजाय भविष्य को आकार देने की कोशिश करके अपनी सुरक्षा का निर्माण और मजबूती से करनी चाहिए। सीएनएन की रिपोर्ट के मुताबिक, ऑस्ट्रेलिया की डिफेंस समीक्षा मुख्य तौर पर ताकतवर चीन के खिलाफ अपनी सुरक्षा के लिए डिजाइन की गई है, जिसके लिए ऑस्ट्रेलिया ने अरबों डॉलर खर्च करने का फैसला किया है।

हालांकि, ऑस्ट्रेलियन सरकार ने अपनी समीक्षा रिपोर्ट में सीधे तौर पर चीन का नाम नहीं लिया है, लेकिन ये भी सच है, कि पिछले कुछ सालों में चीन के खिलाफ सबसे ज्यादा आक्रामक बयानबाजी ऑस्ट्रेलिया और जापान ने ही की है।

ऑस्ट्रेलिया के रक्षा मंत्री रिचर्ड मार्लेस ने कहा, ऑस्ट्रेलिया ने अभी तक रक्षा मुद्रा को अपना रखा था, जिसने दशकों तक ऑस्ट्रेलिया की अच्छी सेवा की है, लेकिन अब ये ऑस्ट्रेलिया के उद्येश्यों की पूर्ती के लिए उपयुक्त नहीं है, लिहाडा ऑस्ट्रेलिया डिफेंस फोर्स को फिर से परिभाषित करती होगी। इशारा साफ है, कि ऑस्ट्रेलिया अब अपनी सेना का नये सिरे से निर्माण करेगा, जैसा जापान कर रहा है।

चीन को ऑस्ट्रेलिया की डायरेक्ट चुनौती

ऑस्ट्रेलिया के रक्षा मंत्री ने कहा, कि ऑस्ट्रेलियन फोर्स का उद्येश्य अभी तक सिर्फ ऑस्ट्रेलिया की रक्षा करना रहा है, लेकिन अब ये मकसद बदल चुके हैं। अब नया मकसद देश की रक्षा करने के साथ साथ देश के उदेश्यों की पूर्ती करना, ऑस्ट्रेलिया के दृष्टिकोण को आगे बढ़ाना और सहयोगियों का साथ मिलकर वैश्विक नियम आधारित व्यवस्था बनाए रखना है।

ऑस्ट्रेलिया ने अपनी सैन्य समीक्षा रिपोर्ट में कहा है, देश की सरकार ने परमाणु ऊर्जा से संचालित होने वाली 6 पनडुब्बियों के निर्माण के लिए अमेरिका और यूनाइटेड किंगडम के साथ मिलकर ऑकस समझौता किया है।

इसके साथ ही, सैन्य समीक्षा रिपोर्ट में ऑस्ट्रेलिया के भीतर लंबी दूरी तक मार करने वाली मिसाइलों के निर्माण पर जोर दिया गया है। इसमें कहा गया है, कि ऑस्ट्रेलिया, विशेष रूप से प्रशांत क्षेत्र में क्षेत्रीय पड़ोसियों के साथ अपने रक्षा सहयोग में सुधार करना चाहता है।

आपको बता दें, कि ऑस्ट्रेलिया और चीन के बीच की दुश्मनी काफी हद तक बढ़ चुकी है और 2021 में ग्लोबल टाइम्स ने एक बैलिस्टिक मिसाइल मारकर ऑस्ट्रेलिया को बर्बाद तक करने की धमकी दी थी। वहीं, ऑस्ट्रेलिया और चीन, जो एक वक्त बहुत बड़े व्यापारिक भागीदार बन चुके थे, वो अब दुश्मन बन चुके हैं, लिहाजा ऑस्ट्रेलिया ने अब भारत के साथ बड़े स्तर पर रक्षा, सामरिक और व्यापारिक समझौता कर रहा है। भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच फ्री ट्रेड एग्रीमेंट भी हो चुका है।

जापान भी कस चुका है कमर

इस बीच, जापान ने 2022 में सेना पर 46 अरब डॉलर खर्च किया है, जो 2021 की तुलना में 5.9 प्रतिशत ज्यादा है। SIPRI ने कहा, कि यह 1960 के बाद से जापानी सैन्य खर्च में आया उच्चतम स्तर है। वहीं, जापान ने पिछले साल अपनी नई सैन्य नीति की घोषणा की है, जिसमें कहा गया है, कि जापान अब अपनी खुद की सेना बनाएगा, जिसके लिए जापान ने अगले पांच सालों में करीब 400 अरब डॉलर खर्च करने की योजना बनाई है।

ताइवान के स्वशासित द्वीप को लेकर पूर्वी एशिया में तनाव बढ़ गया है, जिसे बीजिंग अपने क्षेत्र का हिस्सा मानता है। चीन लगभग पूरे दक्षिण चीन सागर पर भी दावा करता है, जो एक प्रमुख समुद्री व्यापारिक मार्ग है, जिसके कुछ हिस्सों पर फिलीपींस, वियतनाम और मलेशिया सहित देशों का भी हिस्सा है। इसके अलावा, जापान और चीन सेनकाकू और दियाओयू द्वीप समूह के विवाद में भी उलझे हुए हैं, जो ताइवान के उत्तर-पूर्व में स्थित है।

वहीं, उत्तरी क्षेत्रों को लेकर टोक्यो का मॉस्को के साथ भी लंबे समय से विवाद चल रहा है, जो होक्काइडो के उत्तर-पूर्व में स्थित है और द्वितीय विश्व युद्ध के अंत में सोवियत संघ द्वारा जब्त कर लिया गया था। रूस उन्हें कुरील द्वीप कहता है। लिहाजा, इन क्षेत्रों में भी सैन्य तनाव बढ़ा है, लिहाजा सैन्य खर्च और बढ़ गया है।

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