अंटार्कटिका की पिघलती बर्फ खतरे की घंटी, नहीं संभले तो खत्म हो जाएगा इंसानों का वजूद!
जलवायु परिवर्तन के कारण दुनिया के एसी (Air Condition) कहे जाने वाले अंटार्किटका में बर्फ की मोटी चादर तेजी से पिघलती जा रही है। इससे दुनिया में मानवीय संकट उत्पन्न हो जाएगा।
न्यूयॉर्क, 11 अगस्त : ग्लोबल वार्मिंग यानी की जलवायु परिवर्तन दुनिया के लिए चुनौती का विषय बन चुका है। इसी बीच बुधवार को एक उपग्रह के विश्लेषण से पता चला है कि, अंटार्कटिका के तटीय हिमनद हिमखंडों को बड़ी तेजी से बहा रहे हैं। पिछले 25 सालों में अंटार्कटिका में दुनिया की सबसे बड़ी बर्फ की चादर के पिघलने से होने वाले नुकसान के पिछले अनुमानों को दोगुना कर दिया है।

ध्रुवीय बर्फ धरती के तापमान हमें रखता है संतुलित
बता दें कि, ध्रुवीय बर्फ धरती के तापमान, जलवायु और पर्यावरण को संतुलित रखने के सबसे बड़े तंत्र हैं। हालांकि, दुख की बात है कि, धरती के तापमान में वृद्धि ने उनके पिघलने की गति तेज कर दी है। इसकी सबसे बड़ी वजह इंसान का लालच है। वह अपनी महत्वकांक्षा की पूर्ति करने के लिए प्रकृति के संसाधनों का दोहन कर रहा है। इस संकट का नतीजा हमारी सभ्यता के विनाश के रूप में सामने आ सकता है।

क्या कहता है रिपोर्ट
लॉस एंजिल्स में नासा की जेट प्रोपल्शन लेबोरेटरी (JPL) के शोधकर्ताओं के नेतृत्व में और नेचर जर्नल में प्रकाशित अपनी तरह का पहला अध्ययन, इस बारे में नई चिंताओं को उत्पन्न कर दिया है। वह यह कि जलवायु परिवर्तन के कारण दुनिया के एसी (Air Condition) कहे जाने वाले अंटार्किटका में बर्फ की मोटी चादर तेजी से पिघलती जा रही है। इससे दुनिया में मानवीय संकट उत्पन्न हो जाएगा। गर्मी की वजह से समुद्र का जलस्तर में एकाएक वृद्धि होने से सुनामी और तूफान का खतरा मंडराने लगेगा और फिर धरती पर रहने वाले जीव-जंतुओं का वजूद खतरे में पड़ जाएगा।

अंटार्किटका को सबसे ज्यादा नुकसान
ग्लोबल वार्मिंग के कारण अंटार्किटका को सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है। एक विश्लेषण साल 1997 के बाद से अंटार्कटिका की बर्फ की मोटी सतह (बर्फ की अलमारियों) के द्रव्यमान में 12 ट्रिलियन टन की कमी आई है, जो पिछले अनुमान से दोगुना है। अंटार्कटिका में पानी के भीतर की बर्फ पिघलने की दर प्रत्येक 20 वर्षों में दोगुनी हो रही है, और समुद्र तल के बढ़ने का जल्द ही यह सबसे बड़ा स्रोत बन सकता है। दुनिया के सबसे विशाल ग्लेशियर के भीतर तक हासिल किये गये पहले पूर्ण मानचित्र से अनेक नये तथ्य सामने आये हैं। अगर साफ पानी के प्रमुख स्रोत दुनिया के अन्य ग्लेशियरों के पिघलने को भी जोड़ लें, तो स्थिति की भयावहता बहुत बढ़ चुकी है. एक तरफ समुद्री जल-स्तर का बढ़ना और दूसरी तरफ साफ पानी की कमी मनुष्य के भविष्य के लिए गंभीर प्रश्नचिह्न हैं।

तो ऐसे सिकुड़ रही है बर्फ की मोटी चादर
अध्ययन के प्रमुख लेखक जेपीएल वैज्ञानिक चाड ग्रीन के अनुसार, पिछले क्वार्टर सेंचूरी में अंटार्किटका महाद्वीप की बर्फ की चादर 37,00 वर्ग किमी ((14,300 वर्ग मील) सिकुड़ गया है। बता दें कि, इस महाद्वीप में बर्फ के चादरों के सिकुड़ने का आकार स्विट्जरलैंड के पूरे क्षेत्र के बराबर है।

हम खतरें में हैं...
हाल के दशकों में, हालांकि, गर्म हो रहे महासागरों ने नीचे से बर्फ की अलमारियों को कमजोर कर दिया है। नासा ने बताया, उपग्रह Altimeters से बर्फ की चादरों की बदलती तस्वीरों के मुताबिक, 2002 से 2020 तक प्रति वर्ष औसतन 149 मिलियन टन के बर्फ की मोटी परतों के नुकसान को दर्शाती है। इन रिपोर्ट्स को देखेने से पता चलता है कि, आने वाला समय प्रकृति के विनाश की एक नई इबारत लिखने की तैयारियां चल रही हैं। अगर समय रहते हम नहीं सुधरे तो प्रकृति हमें सुधरने का मौका ही नहीं देगा और फिर धरती से मानव सभ्यता का नाश हो जाएगा।
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