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Vedanta Group: भारत के सेमीकंडक्टर सपने को झटका, Vedanta ग्रुप को ना मिल रहा टेक्नोलॉजी पार्टनर, ना सरकारी मदद

भारत सरकार का मानना है, कि भारत सेमीकंडक्टर का बड़ा बाजार बन सकता है और 2026 तक भारत का चिप मार्केट 63 अरब डॉलर का हो जाएगा, जो फिलहाल करीब 5 अरब डॉलर का है। लेकिन, सवाल ये है, कि आखिर कैसे?

Vedanta Group

India's Chip Dream at Risk: भारत के सेमीकंडक्टर बनाने के सपने को बड़ा झटका लगा है और 7 महीने के बाद भी अभी तक एक भी टेक्नोलॉजी पार्टनर नहीं मिला है।

ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट में दावा किया गया है, कि अरबपति कारोबारी अनिल अग्रवाल की भारत में 19 अरब डॉलर का चिपमेकिंग प्लांट बनाने की योजना लड़खड़ा रही है, क्योंकि उनका उद्यम एक टेक्नोलॉजी पार्टनर खोजने के लिए संघर्ष कर रहा है। वहीं, सरकार से वित्तीय प्रोत्साहन प्राप्त करने में भी वेदांता ग्रुप को चुनौतियों का सामना कर रहा है।

vedenta Chip Dream at Risk

7 महीने पहले की थी घोषणा

आपको बता दें, कि 7 महीने पहले अनिल अग्रवाल ने अपने वेदांता रिसोर्सेज लिमिटेड और ताइवान के होन हाई प्रिसिजन इंडस्ट्री कंपनी के बीच एक चिप उत्पादन को लेकर एक साझेदारी की घोषणा की थी। लेकिन, सात महीने के बाद भी कंपनी अभी तक निर्माण इकाई संचालक, लाइसेंस निर्माण-ग्रेड टेक्नोलॉजी के साथ टाई-अप नहीं कर पाई है। ब्लूमबर्ग ने इस मामले से परिचित लोगों के हवाले से ये खबर दी है।

वेंदाता ग्रुप के लिए दूसरी दिक्कत ये है, कि इस परियोजना के लिए सरकार से वित्तीय मदद हासिल करने के लिए ताइवान की कंपनी के साथ लाइसेंस या टेक्नोलॉजी में, किसी भी एक को लेकर टाई-अप करना जरूरी है। यानि, मोटामोटी शब्दों में समझें, तो टेक्नोलॉजी के स्तर पर कंपनी पिछड़ रही है।

वेंदाता के इस वेंचर की कठिनाइयां, इस बात पर प्रकाश डालती हैं, कि नए सेमीकंडक्टर संयंत्रों को स्थापित करना कितना ज्यादा मुश्किल है। सेमीकंडक्टर फैक्ट्री बनाने में ही अरबों रुपये खर्च हो जाते हैं और फिर संयंत्र को चलाने के लिए हमेशा विशेष विशेषज्ञता की आवश्यकता होती है।

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वेदांता के सामने दिक्कत क्या है?

वेदांता ग्रुप धातु और खनन का काम करने वाली कंपनी है, जबकि ताइवान की होन हाई कंपनी, आईफोन के असेंबल का काम करती है, और इन दोनों में से किसी के भी पास चिप बनाने का ना तो अनुभव है और ना ही टेक्नोलॉजी।

हालांकि, फिर भी वेदांता ग्रुप ने सेमीकंडक्टर उद्योग की स्थापना के लिए और भारत के सपने को पूरा करने के लिए अपना कदम बढ़ाया है, लेकिन ये रास्ता आसान नहीं है। भारत में सिर्फ वेदांता ने ही सेमीकंडक्टर के निर्माण में कदम रखा है और अभी तक दूसरी किसी कंपनी ने कोशिश नहीं की है, क्योंकि चिप बनाने की फैक्ट्री बनाने के लिए ही अरबों रुपये खर्च हो जाते हैं।

अनिल अग्रवाल के लिए भारत में चिप निर्माण के अपने सपने को पूरा करने के लिए सरकार से वित्तीय सहायता हासिल करना अत्यंत जरूरी है, क्योंकि ब्लूमबर्ग ने अपनी रिपोर्ट में कहा है, कि उनका वित्तीय साम्राज्य तीव्र वित्तीय तनाव का सामना कर रहा है।

ब्लूमबर्ग न्यूज ने पिछले महीने भी बताया था, कि अरबपति कारोबारी, अपने कमोडिटी कारोबार में भारी कर्ज के ढेर के वजन को कम करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं और मुंबई में लिस्टेट वेदांता लिमिटेड 5% की हिस्सेदारी का विनिवेश करने पर विचार कर रहा है।

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डील को लेकर ज्यादा जानकारी नहीं

ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक, मामले से परिचित लोगों का कहना है कि, ग्लोबल फाउंड्रीज़ इंक और एसटीएमइक्रोइलेक्ट्रॉनिक एनवी के साथ चिप फैब्रिकेशन टेक्नोलॉजी को लाइसेंस देने के लिए उद्यम की चर्चाओं के परिणामस्वरूप समझौते नहीं हुए हैं। लोगों ने अपने नाम का जिक्र नहीं करने की शर्त पर कहा, कि ये चर्चा काफी ज्यादा निजी स्तर पर है और यह स्पष्ट नहीं है, कि वार्ता अभी भी जीवित है या नहीं।

वहीं, ब्लूमबर्ग के सवालों के ईमेल के जवाब में वेदांता ने कहा, कि वह संयंत्र के लिए प्रतिबद्ध है और उसने "इस परियोजना को एक बड़ी सफलता बनाने के लिए एक मजबूत प्रौद्योगिकी भागीदार की पहचान की है।" हालांकि, वेदांता ने भागीदार का नाम नहीं लिया और ना ही यह बताया, कि अभी तक कोई समझौता हुआ है या नहीं।

वहीं, ताइवान की कंपनी होन हाई, जिसे फॉक्सकॉन के नाम से भी जाना जाता है, उसने टिप्पणी के अनुरोधों का जवाब नहीं दिया। ग्लोबल फाउंड्रीज और भारत के प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने भी प्रश्नों का तुरंत जवाब नहीं दिया है।, जबकि, STMicro ने टिप्पणी करने से इनकार कर दिया।

भारत सरकार से अब तक फंडिंग नहीं

मामले से परिचित लोगों ने कहा, कि कंपनी जब भागीदार सुनिश्चित करने के लिए काम कर रही थी, तो उसने भाकत सरकार के सामने 10 अरब डॉलर का कैपिटल एक्सपेंडिचर प्रस्तुत किया था। उन्होंने कहा, कि सरकार मानती है, कि यह आंकड़ा बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया है और सरकार का अनुमान है, कि ये लागत 5 अरब डॉलर के वास्तविक लागत के करीब है।

यदि प्रोत्साहन के लिए सभी आवश्यकताओं को पूरा किया जाता है, तो सरकार परियोजना की लागत का आधा भुगतान कर सकती है। हालांकि, वेदांता ने कहा, कि उसका खर्च अनुमान अन्य समान परियोजनाओं के बराबर है। यानि, एक तरह से सरकार को वेदांता के बजट पर ही भरोसा नहीं है।

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अमेरिका और चीन से मुकाबले का सपना

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    प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के प्रशासन ने ताइवान और चीन पर महंगे आयात और निर्भरता को कम करने के लिए चिप उत्पादन को बढ़ावा देने की कोशिश की है और अमेरिका और चीन की चिप उत्पादन लीग में शामिल होने के लिए 10 अरब डॉलर का एक महत्वाकांक्षी अभियान शुरू किया है। लेकिन, भारत की योजना अभी तक किसी भी प्रमुख वैश्विक चिप प्लेयर को लाने में नाकाम साबित हुई है, जिसमें बड़े पैमाने पर चुनौती आपूर्ति श्रृंखला में बदलाव शामिल है।

    आपको बता दें, कि सेमीकंडक्टर निर्माण के लिए फैक्ट्री की स्थापना काफी मुश्किल काम है और चीन भी इसमें अभी तक पूरी तरह से कामयाब नहीं हो पाया है। बाइडेन प्रशासन ने चिप इंडस्ट्री में दबदबा कायम करने के लिए 100 अरब डॉलर के निवेश की बात कही है, जबकि चीन की चिप इंडस्ट्री, भारी भ्रष्टाचार की भेंज चढ़ चुकी है और पिछले साल कई अधिकारियों के जेल भेजा गया था।

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