यूक्रेन में जंग खत्म नहीं हुआ तो गहरा जाएगा वैश्विक खाद्य संकट !
यूनाइटेड स्टेट्स डिपार्टमेंट ऑफ एग्रीकल्चर के अनुमान के मुताबिक, इस साल गेहूं का उत्पादन 0.51 फीसदी या 40 लाख टन घटने का अनुमान है। इसी तरह, मक्का उत्पादन में मामूली गिरावट की उम्मीद जताई जा रही है।
मास्को,01 जून : रूस-यूक्रेन युद्ध का असर अनाजों पर भी दिखाई देने लगा है। सवाल है कि क्या हमें युद्ध से उत्पन्न होने वाले खाद्य संकट के लिए तैयार रहना होगा। बता दें कि, गेहूं, मक्का और चावल तीन अहम खाद्य पदार्थ हैं। जानकारी के मुताबिक साल 2022 में इन तीन खाद्य पदार्थों की कमी से संकट के बादल मंडरा सकते हैं।

गेहूं उत्पादन में कमी के आसार
यूनाइटेड स्टेट्स डिपार्टमेंट ऑफ एग्रीकल्चर के अनुमान के मुताबिक, इस साल गेहूं का उत्पादन 0.51 फीसदी या 40 लाख टन घटने का अनुमान है। इसी तरह, मक्का उत्पादन में मामूली गिरावट की उम्मीद जताई जा रही है। हालांकि, चावल का उत्पादन 515 मिलियन टन के रिकॉर्ड उच्च स्तर को छूने की उम्मीद है। हालांकि, इन खाद्य पदार्थों के उत्पादन में मामूली गिरावट की उम्मीद जताई जा रही है। विश्व में सबसे अधिक लोग चावल, गेंहू, मक्का का सेवन करते हैं, ऐसे में दुनिया की बड़ी आबादी वर्तमान में खाद्य असुरक्षा को लेकर काफी चिंतित नजर आ रही है।
संकट के बादल कहां मंडरा सकते हैं
उदाहरण के लिए, विश्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार, जनवरी 2021 से वैश्विक स्तर पर गेहूं की कीमत में 91 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। इसी अवधि में मक्का 55 फीसदी महंगा हो गया। जानकारी के मुताबिक रूस और यूक्रेन के बीच जारी जंग के बीच खाद्य असुरक्षा के जोखिम में एक बड़ी आबादी ऐसी है जो आवश्यक वस्तुओं को खरीदने पर अपना पैसा खर्च करती है। बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप के एक पेपर में कहा गया है कि 45 ऐसे देश जो कि ज्यादातर अफ्रीका, दक्षिण एशिया और लैटिन अमेरिका में स्थित हैं, वे संकट के सबसे बुरे दौर से गुजर रहे हैं।
खाद्य आपूर्ति के लिए दूसरे देशों पर निर्भरता
वहीं, लेबनान, हैती, नाइजीरिया, श्रीलंका, इथियोपिया और सूडान कुछ ऐसे देश हैं जो खाद्य आपूर्ति के लिए दूसरे देशों पर निर्भर रहते हैं। इससे यहां भी संकट के बादल मंडराते नजर आ रहे हैं।
यूक्रेन में जंग से मुसीबत बढ़ सकती है
जानकारी के मुताबिक, यूरोप की रोटी की टोकरी कहे जाने वाले यूक्रेन पर रूस के हमले से खाद्यान्न आपूर्ति को लेकर हालात गंभीर होते जा रहे हैं। इस संकट को देखते हुए संयुक्त राष्ट्र ने चेतावनी दी थी कि दुनिया के पास मात्र 70 दिन का गेहूं शेष बचा है। गेहूं का संकट 2008 के बाद सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया है। दुनिया में खाद्यान्न का ऐसा संकट एक पीढ़ी में एक ही बार होता है। यूक्रेन संकट और भारत के गेहूं के निर्यात पर प्रतिबंध के बाद यूरोप के देशों में गेहूं की कमी होती जा रही है। हालात ऐसे ही रहे तो यूरोपीय देश खाने के लिए तरस सकते हैं।












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