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Explained: चीन को अमेरिका ने विकासशील से हटाकर विकसित राज्य का दिया दर्जा.. अगला नंबर भारत का?

Chine Developed Nation: अमेरिका की संसद ने पूर्ण बहुमत के साथ उस कानून को मंजूरी दे दी है, जिसके तहत चीन से विकासशील देश का स्टेटस छीन लिया गया है और अब अमेरका ने चीन को विकसित राज्य होने का दर्जा दे दिया है। ऐसे में आप सोच रहे होंगे, कि विकसित देश का दर्जा मिलना, तो अच्छी बात है, गर्व की बात होनी चाहिए, फिर भी चीन क्यों खुश नहीं है?

सिर्फ चीन ही नहीं, चीन को विकसित देश का दर्जा अमेरिका ने क्या दिया, भारत के लिए भी चिंताएं बढ़ गई हैं और अब भारत को डर सता रहा है, कि अगला नंबर उसका हो सकता है। डोनाल्ड ट्रंप अपने शासनकाल में कई बार कह चुके हैं, कि चीन और भारत अब विकसित देश बन चुके हैं और उन्हें विकासशील देशों की लिस्ट से बाहर निकाल लेना चाहिए। ऐसे में आइये चीन के संदर्भ के जरिए समझने की कोशिश करते हैं, कि अगर भारत को भी विकसित राज्य में शामिल कर लिया जाता है, तो इसका कितना खतरनाक असर भारत पड़ पड़ेगा।

Chine Developed Nation

विकासशील देश का स्टेटस चीन से छिना

27 मार्च को एक फास्ट-ट्रैक प्रक्रिया के तहत जब अमेरिकी हाउस ऑफ रिप्रजेंटेटिव में 415-0 के पूर्ण बहुमत के साथ 'चीन विकासशील देश नहीं है' बिल को पास किया था, तभी तय हो गया था, कि अब चीन इस लिस्ट से बाहर आने वाला है और एक दिन पहले अमेरिका की सीनेट ने भी बिल को पास कर दिया।

अब इस बिल के कानून बनने में सिर्फ राष्ट्रपति जो बाइडेन के साइन का इंतजार है।

इस बिल में साफ शब्दों में कहा गया है, कि अब अमेरिका चीन को किसी भी हाल में विकासशील देश का दर्जा नहीं देगा। इस बिल को "द पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना इज नॉट ए डेवलपिंग कंट्री एक्ट" के नाम से पेश किया गया था और अब इसे राष्ट्रपति बाइडेन के पास भेजा जाएगा। जैसे ही इस बिल पर राष्ट्रपति बाइडेन दस्तखत करेंगे, फौरन ये बिल कानून बन जाएगा और अमेरिका, चीन को विश्व का नया विकसित देश घोषित कर देगा।

चीन पर कितना असर पड़ेगा... जान लीजिए

अमेरिका के इस कानून ने चीन कि सिट्टी-पिट्टी गुम कर दी है और चीनी टिप्पणीकारों ने चेतावनी दी है, कि यदि यह अधिनियम पारित किया जाता है, जैसा कि अब तय हो गया है, तो ये चीन की अर्थव्यवस्था के लिए ये एक भूकंप साबित होगा।

इस कानून के बनने के बाद चीन को व्यापार करने के लिए उतना ही टैरिफ भरना होगा, जितना टैरिफ विकसित देश भरता है, यानि अमेरिका चुकाता है, जिसका मतलब ये हुआ, कि चीन के सामान अब बाजार में महंगे हो जाएंगे।

कानून बनने के बाद चीन में जिन सामानों का निर्माण होता है, उन्हें बनाने की लागत बढ़ जाएगी, जिसका मतलब ये हुआ, कि बाजार में अभी तक चीन जिन सामानों को काफी कम कीमत पर बेचता था, वो ऐसा नहीं कर पाएगा। यानि, चीनी सामान अब सस्ता नहीं रहेगा। यदि भारत को भी विकसित देश कभी घोषित किया जाता है, तो भारत पर भी इसी तरह के असर होंगे, इसीलिए ना चीन और ना ही भारत चाहता है, कि उसे विकसित देश होने का दर्दा मिले।

इसके साथ ही चीन को ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कटौती के लिए पूरी तरह से जिम्मेदार बना दिया जाएगा, जिसकी वजह से चीन में भारी संख्या में लोगों की नौकरी जाने का रास्ता खुल जाएगा, जो कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चायना के ऊपर किसी बम के गिरने के बराबर होगा।

लेकिन, चीन को विकसित देश की श्रेणी में डालने का फैसला, सिर्फ चीन के लिए ही नहीं, बल्कि भारत के लिए भी चिंता की बात है और इसका सिरा फरवरी 2020 में पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के उस बयान से जुड़ता है, जिसमें उन्होंने चीन, भारत और दक्षिण अफ्रीका सहित 25 देशों को विकसित देशों के रूप में मान्यता देने की बात कही थी, ताकि इन देशों को जो व्यापारिक लाभ मिलता है, उसे हटाया जा सके।

America Vs China

चीन की लंका लगने वाली है

अमेरिकी सीनेट में जिस बिल को पास किया गया है, उसमें कहा गया है कि चीन, जिसने 2010 में दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में जापान को पीछे छोड़ दिया था, वो अब वैश्विक अर्थव्यवस्था का 18.7% हिस्सा है। चीन अब दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है।

अमेरिका के सांसद यंग किम ने मार्च में कहा था, कि "चीन अंतरराष्ट्रीय संगठनों से कम ब्याज पर कर्ज ले रहा है और साथ ही अपने बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के हिस्से के रूप में अन्य देशों में बुनियादी ढांचा परियोजनाओं पर खरबों खर्च कर रहा है। उन्होंने बीआरआई को "ऋण-जाल कूटनीति घोटाला" भी बताया था। यानि, सांसद ने ये कहा, कि चीन वैश्विक संस्थाओं से कम ब्याज दर पर ऋण लेता है और उस पैसे को दूसरे देशों को ज्यादा ब्याज दरों पर कर्ज देता है, जो अब नहीं चलेगा।

वर्तमान में, चीन को संयुक्त राष्ट्र सहित अन्य अंतर्राष्ट्रीय संगठन और अमेरिका "विकासशील देशों" की श्रेणी में रखता है, हालांकि "विकासशील" और "विकसित" शब्दों की कोई स्पष्ट परिभाषा नहीं है। लेकिन, चीन के विश्लेषक विकासशील स्टेटस को चीन के लिए बहुत बड़ा नुकसान मानते हैं।

हाल ही में चीनी सोशल मीडिया वीबो पर एक विश्लेशक ने लिखा था, कि "चीन एक विकासशील देश नहीं है और अगर ये अधिनियम पारित होता है, तो चीन को गंभीर झटका लगेगा।"

विकासशील देश होने के नाते चीन को विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) से व्यापारिक छूट और एंटी-डंपिंग छूट मिलती है। इसके अलावा चीन को विश्व बैंक से कम ब्याज दर पर वित्तीय सहायता, अंतरराष्ट्रीय संगठनों से तकनीकी और वित्तीय सहायता, चीनी सामानों की विदेशी में बिक्री पर कम टैक्स लगता है।

चीन को इससे जबरदस्त फायदा पहुंचता है। इसके अलाव चीन को संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि समर्थन से भी लाभ मिलता है। माना जा रहा है, कि चीन अब वैज्ञानिक सुविधाओं, बौद्धिक संपदा के क्षेत्र में बहुत बड़ा फायदा उठाने की कोशिश में है, जिसके लिए चीन अतिरिक्त समय की मांग करता आया है। लेकिन, अब अमेरिका चीन को उस फायदे तक पहुंचने से रोकना चाहता है।

चीन, जो फिलहाल आर्थिक संकट की तरफ बढ़ता जा रहा है और जहां बेरोजगारी दर बढ़कर 21 प्रतिशत के करीब पहुंच गई है, वहां अमेरिकी कानून के बाद तहलका मचना तय माना जा रहा है। हालांकि, अमेरिका के कानून बनाने का मतलब ये नहीं है, कि चीन यूएन के विकासशील लिस्ट से बाहर आ जाएगा, लेकिन इतना तनाव होने के बाद भी चीन, अमेरिका से टेक्नोलॉजी के साथ साथ कई तरह के व्यापारिक लाभ हासिल करता है, जो बंद हो जाएगी। इसके साथ ही, अमेरिका के बाद यूरोपीय यूनियन भी चीन को विकसित देश घोषित कर देगा।

यानि, अमेरिका अब चीन के खिलाफ आर-पार की लड़ाई के मूड में आ चुका है और अमेरिका ने साबित कर दिया है, कि असली सुपरपावर वही है और जानकारों का कहना है, कि इस कानून से चीन की जीडीपी का विकास दर और नीचे चला जाएगा।

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