एलियंस धूमकेतु 'Oumuamua' पर वैज्ञानिकों की बड़ी खोज, इसकी विचित्र फुर्ती का रहस्य खुला
एलियंस धूमकेतु 'ओमूआमूअआ' की विचित्र हरकतों से वैज्ञानिकों ने पर्दा उठा दिया है। यह सौर मंडल से बाहरी वस्तु जरूर है और बाकी धूमकेतुओं के ही लगभग समान है। यह अब सौर मंडल से बाहर जा रहा है।

एलियंस धूमकेतु या एलियंस एयरक्राफ्ट 'ओमूआमूअआ' को लेकर पिछले 6 वर्षों से खगोलविद असमंजस में पड़े हुए थे। लेकिन, अब जाकर एलियंस वाले इस धूमकेतु के रहस्य से पर्दा उठ गया है। दरअसल, 'ओमूआमूअआ' इस वजह से खगोलविदों को चौंका रहा था कि पता नहीं सूर्य के पास आते ही इसको क्या हुआ था। इसने अचानक अपनी स्पीड बढ़ाई और दिशा बदलता हुआ आगे निकल गया। क्योंकि, हमारे सौर मंडल के धूमकेतु में ऐसे लक्षण नहीं होते। इसलिए इसे हमारे सौर मंडल में दूसरी दुनिया से आया एलियंस का धूमकेतु भी कहा जा रहा था। जब शोध हुआ तो पता चला है कि इसकी विचित्र फुर्ती के पीछे वैज्ञानिक कारण था।

एलियंस धूमकेतु का रहस्य सुलझा
2017 में जबसे हमारे सौर मंडल में अंतरतारकीय वस्तु के रूप में एक विचित्र धूमकेतु ओमूआमूअआ पाया गया है, खगोल वैज्ञानिकों के बीच में बहस का विषय बना रहा है। खासकर सूर्य के पास से यह जिस विचित्र तरीके से त्वरित होकर दूर गया, वह तरह-तरह की अटकलों को जन्म दे रहा था। इसके अटपटे व्यवहार की वजह से तरह-तरह की कहानियां सामने आने लगी थीं। कल्पना तो यहां तक शुरू हो गया कि यह एलियंस का स्पेसक्राफ्ट हो सकता है। लेकिन, रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक वैज्ञानिको ने नई रिसर्च के आधार पर इसके तमाम रहस्यों से पर्दा उठा दिया है।

इसकी विचित्र फुर्ती का राज खुला
एक शोध से एलियंस धूमकेतु की अजीब हरकतों के बारे में ज्यादा विस्तार से बात सामने आई है। यह जानकारी ये है कि जब यह रहस्यमयी धूमकेतु ओमूआमूअआ सूर्य के नजदीक पहुंचा तो उसकी गर्मी से इसका हाइड्रोजन निकल गया और इस वजह से यह बहुत ही फुर्ती के साथ ऊपर निकल गया। ओमूआमूअआ में गैस और धूल की वह पूंछ नहीं दिखती है, जो विभिन्न पुच्छल ताराओं की विशेषता मानी जाती है। ओमूआमूअआ के बारे में एक और नई जानकारी सामने आई है। पहले इसे सिगार के आकार का बताया गया था, लेकिन अब इसके बारे में पता चला है कि यह एक चट्टानी पैनकेक की तरह का है।

ओमूआमूअआ की केमिस्ट्री बदल गई थी
इसके आकार के बारे में पहले जो अनुमान था, अब उससे ये छोटा पाया गया है। यह करीब 115 मीटरx111 मीटर का है और इसकी मोटाई 19 मीटर की है। शोधकर्ताओं को लगता है कि ओमूआमूअआ का जन्म भी उसी तरह से हुआ था, जैसा कि बहुत सारे धूमकेतुओं का हुआ है। ग्रहों के निर्माण के समय अंतरिक्ष में ऐसी चीजें बनी थी, जो विशाल और अंतरिक्ष की बर्फीली चट्टानों वाली थी। वैज्ञानिकों का मानना है कि जब यह किसी तरह से अपने मूल सौर मंडल से बाहर हो गया, और अंतरतारकीय अंतरिक्ष में घुसने के दौरान बहुत ही उच्च ऊर्जा वाले विकिरणों के प्रभाव के चलते इसकी केमिस्ट्री बदल गई। इससे धूमकेतु के बर्फ का जमा हुआ पानी हाइड्रोजन गैस में बदल गया, जो इसके बाकी बर्फ के अंदर फंसा हुआ था।
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सूर्य की गर्मी के चलते इसका हाइड्रोजन निकल गया
जब ओमूआमूअआ हमारे आंतरिक सौर मंडल से गुजर रहा था तो इसकी गर्मी बढ़ने लगी, जिससे इसमें जमा बर्फ के ढांचे में बदलाव हुआ और उसमें फंसा हाइड्रोजन निकलने लगा। इसकी वजह से ही यह सूर्य की गर्मी के प्रभाव से फुटबॉल किक की तरह छिटक कर अप्रत्याशित तेजी और विचित्र तरीके से त्वरित होकर दूर चला गया। हाइड्रोजन निकलने की इस प्रक्रिया को आउटगैसिंग कहते हैं, जिसकी वजह से इसकी पूंछ भी नजर नहीं आती, जो कि पुच्छल तारे की एक विशेषता होती है।

मोटे तौर पर सौरमंडल वाले धूमकेतु के समान- शोधकर्ता
जर्नल नेचर में इस हफ्ते प्रकाशित इस रिसर्च की लीड ऑथर और कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी में एस्ट्रोकेमिस्ट जेनी बर्गनर ने कहा, 'प्रमुख खोज ये है कि 'ओमूआमूअआ की शुरुआत पानी से भरपूर बर्फीले ग्रहाणु के रूप में हुई होगी, जो मोटे तौर पर सौर मंडल के धूमकेतुओं के समान है। यह मॉडल किसी असाधारण भौतिकी या रसायन विज्ञान का इस्तेमाल किए बिना 'ओमूआमूअआ' के अजीब बर्ताव की व्याख्या कर सकता है।'

ओमूआमूअआ मतलब- दूर से आने वाला संदेशवाहक
ओमूआमूअआ का नाम मूल हवाई भाषा से लिया गया है, जिसका शाब्दिक अर्थ उस संदेशवाहक के लिए है, जो बहुत ही दूर से आ रहा है। क्योंकि, इसका पता सबसे पहले हवाई यूनिवर्सिटी के Pan-STARRS1 टेलीस्कोप ने ही लगाया था। बर्गनर कहती हैं कि 'हम इसकी उत्पत्ति के स्थान को नहीं जाते हैं, लेकिन संभवत: यह अंतरतारकीय अंतरिक्ष में 10 करोड़ वर्ष से कम समय से घूम रहा है। इसका लाल रंग सौर मंडल के कई छोटे पिंडों के रंगों के अनुकूल था। यह इस समय सौर मंडल से बाहर होने के रास्ते में नेप्च्यून से गुजरा है।' (पहली तस्वीर को छोड़कर बाकी सांकेतिक)












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