दुर्लभ बीमारी से पीड़ित है दो साल का मासूम, पिता ने इंटरनेट पर रिसर्च कर खुद बना डाली दवा
कुनमिंग (चीन), 24 नवंबर: चीन में 30 साल का एक शख्स अपने मासूम बेटे की जान बचाने के लिए जो संघर्ष कर रहा है, उसका उदाहरण शायद दुनिया में कहीं नहीं मिलेगा। उसके बच्चे को ऐसी आनुवंशिक बीमारी है, जो लाइलाज है। हालांकि, इसकी दवा है जो रोगी को आराम दे सकता है, लेकिन वह भी चीन में नहीं बनती। बच्चे का पिता चाहता था कि वह उस मासूम को लेकर कहीं बाहर चला जाए, लेकिन कोविड-19 की पाबंदियों की वजह से चीन से बाहर नहीं जाया जा सकता था। इसलिए उसने तय किया कि वह खुद ही उस दवा के बारे में रिसर्च करके उसे घर पर ही तैयार करेगा। करीब डेढ़ महीने तक इस काम में खुद को झोंक देने के बाद उसे उम्मीद की किरण नजर आ रही है।

मेनकेस सिंड्रोम से पीड़ित है मासूम
डॉक्टर कहते हैं कि दो साल के शु हाओयांग के पास अब कुछ ही महीने बचे हैं। उसकी दुर्लभ बीमारी में एक दवा उसकी मदद कर सकती है, लेकिन वह चीन में उपलब्ध नहीं है। ना ही कोविड की पाबंदियों की वजह से उसके पिता शु वेई अपने मासूम बेटे का इलाज कराने के लिए उसे चीन से बाहर ही ले जा सकते हैं। वेई के पास कोई उपाय नहीं है इसलिए उन्होंने अपने घर में ही एक लैब बना ली। 30 साल के वेई कहते हैं, 'मेरे पास यह सोचने का वक्त नहीं था कि कहां जाना है और कहां नहीं जाना। इसे हर हाल में करना था।' हाओयांग को मेनकेस सिंड्रोम नाम की दुर्लभ बीमारी है, जो जेनेटिक डिजॉर्डर की वजह से होती है और इसकी वजह से शरीर में कॉपर बनने में दिक्कत आ जाती है, जो शरीर को संचालित करने के लिए ब्रेन और नर्वस सिस्टम के विकास के लिए आवश्यकता होता है।

पिता के जिम में ही लैब बना लिया
मेनकेस सिंड्रोम से पीड़ित शायद ही तीन साल से ज्यादा उम्र तक जी पाते हैं। लेकिन, सिर्फ हाई स्कूल तक पढ़े और बेटे की बीमारी से पहले छोटा-मोटा ऑनलाइन बिजनेस चलाने वाले शु वेई ने ठान लिया कि वह अपनी संतान को इस दुर्लभ बीमारी से लड़ने का मौका जरूर देंगे। जब उन्हें यह पता चला कि उनके बच्चे का रोग लाइलाज है और जो दवा इसके लक्षणों में राहत दे सकती है, वह चीन में उपलब्ध नहीं है तो उन्होंने खुद ही इसकी दवाई बनाने की विधि जानने के लिए रिसर्च करना शुरू कर दिया। वह बताते हैं, 'मेरे दोस्तों और परिवार वालों का कहना था कि यह असंभव है।' इंटरनेट पर ज्यादातर मैटेरियल अंग्रेजी में मिले तो वेई ने उसे समझने के लिए ट्रांसलेशन सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल किया। जब उन्हें यह जानकारी मिली की कॉपर हिस्टाडाइन से बच्चे को आराम मिल सकता है तो उन्होंने अपने पिता के जिम में ही लैब तैयार कर लिया।

दवा देने के बाद बच्चे की ब्लड रिपोर्ट में आया सुधार
6 हफ्ते तक दिन-रात दिमाग खपाने के बाद शु वेई ने कॉपर हिस्टाडाइन की पहले शीशी तैयार कर ली। पहले उन्होंने खरगोश पर इसका परीक्षण किया और फिर अपने शरीर में इसका इंजेक्शन लगाया। उनके मुताबिक, 'खरगोश ठीक थे, मैं भी ठीक था तो मैंने उसका प्रयोग अपने बेटे पर किया।' उनका दावा है कि इलाज शुरू करने के दो हफ्ते बाद उनके बेटे का कुछ ब्लड टेस्ट सामान्य हो गया। लेकिन, इस दवा से मेनकेस सिंड्रोम ठीक नहीं हो सकता। फ्रांस में दुर्लभ बीमारियों के स्पेशलिस्ट प्रोफेसर एन्निक टॉउटेन कहते हैं, इलाज से लक्षण दूर होंगे, 'बिना स्वस्थ हुए।'

वेई की दवा में बायोटेक लैब की बढ़ी दिलचस्पी
इस बीच चीन प्रशासन ने कहा है कि वह वेई के काम में तबतक दखल नहीं देगा, जबतक वह इससे सिर्फ घर पर ही इलाज कर रहे हैं। एएफपी की रिपोर्ट के मुताबिक मेनकेस सिंड्रोंम को लेकर वेई के काम ने ग्लोबल बायोटेक लैब वेक्टरबिल्डर की दिलचस्पी पैदा की है, जो जीन थेरेपी में रिसर्च लॉन्च कर रहा है। (तस्वीरें- रोया न्यूज इंग्लिश के वीडियो ग्रैब से)












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