कसाई जो कभी बेचता था मांस, अब बनाता है गाय की पेंटिंग
कोजो मार्फो कसाई का काम छोड़कर कलाकार बन गए हैं जो अपनी पेंटिंग के ज़रिए दुनिया को गायों का महत्व बताना चाहते हैं.
कोजो मार्फो कहते हैं, ''गाय से सभ्यताएं बनती हैं. घाना में हम उनसे खेत में हल चलाते हैं और यदि आपके पास दो-तीन मवेशी हों तो विवाह करने के लिए आपको एक सुंदर महिला भी मिल सकती है. भारत के कई हिस्सों में भी गाय को भगवान की तरह माना जाता है.''
घाना के ग्रामीण परिवेश में जन्में कोजो की परवरिश उनकी मां और दादी ने की. काम के सिलसिले में न्यूयॉर्क पहुंचे कोजो कसाई बन गए.
41 वर्षीय कोजो कहते हैं, मैं निराश था, मांस के बारे में मेरी जानकारी बहुत कम थी. दीवार पर ड्रॉइंग बनी हुईं थीं जिनमें बताया गया था कि मांस को किस तरह काटना है. इसके बावजूद मेरा बॉस मुझे पकड़ लेता था.''
कोजो ने भले ही गाय का मांस बेचा हो, लेकिन उनकी प्रेरणा उन्हें कैनवास तक ले आई. अब उनके काम को सराहा जा रहा है.
गाय के अलावा कोजो के दिल के नज़दीक जो विषय हैं, उनमें औरत की ताक़त भी शामिल है. किसी बच्चे को पालने में मां की भूमिका से कोजो भलीभांति परिचित हैं जो उनकी पेंटिंग में भी झलकता है.
कोजो का जन्म भले ही घाना में हुआ, लेकिन उनकी पेंटिंग में बाकी महाद्वीपों की भी झलक नज़र आती है.
कोजो दार्शनिक अंदाज़ में कहते हैं, ''हम एक ऐसे बर्तन में रह रहे हैं जो पिघल रहा है जिसमें कई दरारें हैं. लेकिन मैं लोगों को जोड़ना चाहता हूं और सबकी संस्कृति को प्रदर्शित करना चाहता हूं.''
कोजो बताते हैं कि किस तरह उनके शुरुआती दिन एक लोकल लाइब्रेरी में पिकासो की पिक्चर देखते हुए बीते. वो कहते हैं, ''मुझे लगता था कि डॉक्टर बनना चाहिए या एकाउंटेंट बनना चाहिए. लेकिन मैं नदी के किनारे पर जाता और वहां की मिट्टी से रंग बनाता.''
कोजो के तौर-तरीके भी निराले हैं. वो बताते हैं, ''मैं पेपर पर वैसलीन लगाता ताकि उसे ट्रेसिंग पेपर की तरह बनाया जा सके. लेकिन मैं जब तक घाना में रहा, मेरे काम को गंभीरता से नहीं लिया गया.''
कोजो को न्यूयॉर्क से लंदन जाने का मौका मिला जहां उन्होंने अपनी ऑन्टी की ग्रोसरी शॉप पर काम किया.
साल 2000 के दौरान एक वक्त ऐसा भी आया जब कोजो का मन पेंटिंग से उचटा, लेकिन जल्द ही उन्हें अपनी प्रेरणा दोबारा मिल गई.
वो कहते हैं, ''मैं दिखाना चाहता था कि सिंगल-पेरेंट की जीवन-शैली कितनी सकारात्मक हो सकती है.''
कोजो कहते हैं, ''पहाड़ों पर महिलाएं सबसे मेहनती होती हैं. उन्होंने ही मुझे पाला. एक महिलावादी ने मुझसे कहा था कि जहां आदमी कमान संभालता है, औरतों को पीड़ित होना पड़ता है. लेकिन जहां से मैं आता हूं, वहां कमान हमेशा औरतों के हाथ में होती है.''
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