World Population Day: भारत के विकास का नया इंजन बन सकती है देश की आबादी, हर वर्ग की भागीदारी से बनेगी बात
World Population Day: पिछले कुछ वर्षों में भारत की आबादी में जबरदस्त इजाफा हुआ है और 1.44 बिलियन की आबादी के साथ भारत दुनिया में सबसे अधिक आबादी वाला देश बन गया है। इससे पहले चीन दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश था।
भारत और चीन की आबादी दुनिया की कुल आबादी का एक तिहाई हिस्सा है। बढ़ती हुई आबादी से ना सिर्फ प्राकृतिक संसाधनों पर बोझ बढ़ता है बल्कि लोगों की जीवनशैली पर भी काफी विपरीत प्रभाव पड़ता है।

भारत के लिए चुनौती
भारत ने 2070 तक शुद्ध शून्य उत्सर्जन प्राप्त करने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया है, जबकि यूरोपीय संघ ने 2050 तक लक्ष्य निर्धारित किया है। हालांकि भारत का तात्कालिक लक्ष्य अगले दशक में गरीबी को मिटाने के साथ आर्थिक विकास को बनाए रखना है।
भारत के लिए वृहद स्तर पर जनसंख्या की संख्या से कहीं ज़्यादा आम नागरिकों का कल्याण अहम है। यही वजह है कि भारत की रणनीति में गरीबी से निपटना के साथ जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने के उपायों के साथ आर्थिक विकास को बढ़ावा देना शामिल है।
भारत में प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद में गत वर्षों में सुधार हुआ है और जनसंख्या वृद्धि दर में गिरावट आई है। लेकिन अभी भी गरीबी एक गंभीर मुद्दा बनी हुई है जिस सरकार को ध्यान देने की जरूरत है।
जनसंख्या का अर्थव्यवस्था पर प्रभाव
अधिक जनसंख्या पर्यावरण और अर्थव्यवस्था दोनों पर गंभीर प्रभाव डालती है। जितने अधिक लोग होंगे, संसाधनों की मांग उतनी ही अधिक होगी। जिससे प्राकृतिक स्रोतों का दोहन होता है।
अधिक जनसंख्या के कारण प्राकृतिक संसाधनों पर बहुत अधिक दबाव पड़ रहा है। इन संसाधनों के बढ़ते उपयोग से ये संसाधन तेजी से खत्म हो रहे हैं। बढ़ती आबादी की मांग को पूरा करने के लिए कृषि को संघर्ष करना पड़ रहा है। खेत, पौधे, पेड़ और ऊर्जा स्रोत सभी दबाव में हैं, जिससे पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।
प्रति व्यक्ति आय
अधिक जनसंख्या भारत की प्रति व्यक्ति आय को भी काफी हद तक प्रभावित करती है। इसके चलते आय दर में गिरावट आती है। अधिक जनसंख्या के कारण बेरोजगारी की समस्या तेजी से बढ़ती है। यही वजह है कि भारत में यह ज्वलंत मुद्दा है।
बढ़ती जनसंख्या के साथ रोजगार सृजन नहीं हो पा रहा है, जिसके परिणामस्वरूप आय, लाभ, उत्पादन और संसाधनों में कमी आ रही है। बहुत से लोग गरीबी रेखा से नीचे रहते हैं क्योंकि सरकार सभी को बेहतर संसाधन मुहैया करने में विफल रहती है।
भारत का आर्थिक स्थिति की बात करें तो 2014 में भारत का सकल घरेलू उत्पाद $1.85 ट्रिलियन था। लेकिन आज, यह $3.5 ट्रिलियन के करीब है, इसके साथ ही भारत दुनिया की पांचवी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। सरकार का लक्ष्य है कि भारत 2024 तक 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बन जाए। इसके लिए सालाना 12% की निरंतर जीडीपी वृद्धि की आवश्यकता है।
हर वर्ग की साझेदारी जरूरी
शौमित्रो चटर्जी और अरविंद सुब्रमण्यन ने हाल ही में हाल ही में प्रकाशित एक पेपर में कहा था कि भारत एक बड़ा देश है जिसका बाजार बड़ा है। लेकिन इस बाजार को सही मायने में हर वर्ग तक पहुंचाना होगा।
चटर्जी और सुू्ब्रमण्यम का तर्क है कि व्यापक गरीबी के कारण व्यापार योग्य वस्तुओं और सेवाओं के लिए भारत के वास्तविक बाजार का आकार सकल घरेलू उत्पाद के केवल 15 से 45 प्रतिशत के बीच है। ऐसे में भारत को रोजगार सृजन आधारित आर्थिक विकास की जरूरत है, जिसमे समाज के निचले तबके की भागीदारी को सुनिश्चित किया जा सके।
वर्ष 2022 में वैश्विक वस्तु निर्यात में भारत की हिस्सेदारी सिर्फ 2.2 फीसदी रही है, जबकि चीन की हिस्सेदारी 17.6 फीसदी है। यहां तक कि कॉमर्शियल सेवाओं के निर्यात के मामले में भी भारत की हिस्सेदारी 4.4 फीसदी रही है, जबकि अमेरिका इस मामले में 12.8 फीसदी तो चीन 6 फीसदी है। ऐसे में दोनों ही क्षेत्रों में भारत के अपार संभावनाएं हैं।
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