पांच लाख पेड़ों वाले 'महान' जंगल में है अब सिर्फ 'प्रदूषण और जहरीली गैस'
नई दिल्ली। देश और दुनिया में 5 मई को बड़ी ही धूम-धाम के साथ विश्व पर्यावरण दिवस मनाने की औपचारिकता चल रही होती है लेकिन हकीकत ये है कि ठीक उसी समय जब दिवस मनाया जा रहा होता है तो जंगल के 'जानवर और पक्षी' अपने मरने की दुहाई मांग रहे होते हैं। जंगल संरक्षित किए जाने से ज्यादा बड़ी रकम तो दिवस को धूम-धाम से मनाने में खर्च कर दिए जाते हैं, यही भारत है और यही विश्व पर्यावरण दिवस की हकीकत भी।
आज पर्यावरण दिवस है। सरकारी और गैर सरकारी संस्थाओं की तरफ से कई आयोजन किये जा रहे हैं लेकिन ये आयोजन सिर्फ औपचारिकता भर बनकर रह गये हैं। सिंगरौली और विंध्य क्षेत्र जो एक समय में घने जंगलों और जानवरों के लिए प्रसिद्ध था, आज ज्यादातर कोयला खदानों, पर्यावरण प्रदूषण के लिए देश भर में जाना जाता है। हर बार नये-नये पावर प्रोजेक्ट इस इलाके में आते गए और यहां के जंगल और जमीन खत्म होते गए। परिणाम हुआ कि इलाके के स्थानीय लोग प्रदूषण से पैदा होने वाली कई तरह की रहस्यमयी बीमारियों की चपेट में हैं।
महान के जंगलों को एशिया के सबसे बड़े तथा पुराने साल वनों में शुमार किया जाता है। इनका अनुमानित आच्छादान करीब 70 प्रतिशत है। महान वन क्षेत्र में आदिवासियों की संख्या ज्यादा है। रिपोर्टों के अनुसार बाघ तथा एशियाई हाथी भी कभी-कभी इन जंगलों से गुजरते हैं। इसके अलावा तेंदूआ, भालू, लकड़बग्घा, जंगली कुत्ता, चिंकारा, चौसिंघा, नीलगाय तथा सांबर जैसे लुप्तप्राय जीव भी इन वनों में निवास करते हैं। गिद्धों के अलावा जंगल में साल, साजा, महुआ, तेंदू सहित 164 पादप प्रजातियां मौजूद हैं। इस जंगल में करीब पांच लाख पेड़ मौजूद हैं।
केन्द्रीय मंत्री और पर्यावरण से जुड़े लोग भी महान जंगल को पर्यावरण के लिए जरूरी और काफी महत्वपूर्ण बता चुके हैं। पूर्व केन्द्रीय पर्यावरण व वन मंत्री जयराम रमेश ने महान के बारे में आठ जुलाई 2011 को लिखे अपने अधिकारिक नोट में कहा था, इस कोयला ब्लॉक में खनन की अनुमति दिये जाने से अन्य खंडों में भी खनन की इजाजत दिये जाने के रास्ते खुल जायेंगे। खास तौर पर उन ब्लॉकों में जिन्हें साल 2006 या 2007 में आवंटित किया जा चुका है। यह मात्रा और गुणवत्ता के लिहाज से बेहद समृद्ध वनाच्छादित क्षेत्र को तहस-नहस कर डालेगा।
पर्यावरण व वन मंत्रालय की सलाहकार समिति ने वन भूमि को वन (संरक्षण) अधिनियम 1980 के तहत गैर वन प्रयोग के लिये देने के वास्ते वर्ष 2008-09 के दौरान चार बार समीक्षा की थी और वर्ष 2011 में मध्य में क्षेत्र का दौरा करने के बाद परियोजना को मंजूरी देने के खिलाफ मत दिया था।
पर्यावरण और वन मंत्रालय तथा कोयला मंत्रालय की संस्था केन्द्रीय खदान आयोजना एवं विकास संस्थान लिमिटेड ने जनवरी-फरवरी 2010 में संयुक्त रूप से एक एक कवायद की थी जिसमें महान कोयला ब्लॉक को प्रवेश निषिद्ध नो-गो जोन के रूप में चिन्हित किया गया था। हालांकि बाद में मंत्रालय ने जुलाई 2011 में मंत्री समूह से इस प्रकरण पर निर्णय लेने को कहा था। मंत्री समूह ने मई 2012 में इस परियोजना पर विचार करने की सिफारिश की थी।

दुनिया के पुराने जंगलों में से एक 'महान' जंगल
महान के जंगलों को एशिया के सबसे बड़े तथा पुराने साल वनों में शुमार किया जाता है।

जारी है ग्रामीणों का संघर्ष
महान जंगल को बचाने के लिए महान जंगल क्षेत्र के ग्रामीणों ने महान संघर्ष समिति का गठन किया है। यह संगठन सालों से महान जंगल पर वनाधिकार पाने के लिए संघर्ष कर रहा है।

हिंडाल्को और एस्सार को 'महान' पर कब्जा
दुनिया के सबसे पुराने जंगलों में से एक 'महान' जंगल को बर्बाद करने के लिए हिंडाल्को और एस्सार अपने प्लांट यहां लगाने लगे हैं।

'महान' की खूूबसूरती
पर्यावरण व वन मंत्रालय की सलाहकार समिति ने वन भूमि को वन (संरक्षण) अधिनियम 1980 के तहत गैर वन प्रयोग के लिये देने के वास्ते वर्ष 2008-09 के दौरान चार बार समीक्षा की थी और वर्ष 2011 में मध्य में क्षेत्र का दौरा करने के बाद परियोजना को मंजूरी देने के खिलाफ मत दिया था।

'महान' जंगल में लगा हुआ पावर प्लांट
पर्यावरण और वन मंत्रालय तथा कोयला मंत्रालय की संस्था केन्द्रीय खदान आयोजना एवं विकास संस्थान लिमिटेड ने जनवरी-फरवरी 2010 में संयुक्त रूप से एक एक कवायद की थी जिसमें महान कोयला ब्लॉक को प्रवेश निषिद्ध नो-गो जोन के रूप में चिन्हित किया गया था।












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