महज 15 दिनों के भीतर इन तीन बड़े फैसलों ने 3 राज्यों में बदल दिए BJP के चुनावी समीकरण

पंजाब, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में भाजपा ने चुनाव से पहले ही तीन ऐसे मास्टर स्ट्रोक चल दिए हैं, जिसके बाद बाकी दल चुनावी मैनेजमेंट में काफी पीछे नजर आ रहे हैं।

नई दिल्ली, 1 दिसंबर: देश के पांच राज्यों- यूपी, पंजाब, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर में होने वाले विधानसभा चुनावों में अब महज कुछ ही महीनों का वक्त बचा है और माना जा रहा है कि अगले साल की शुरुआत में चुनाव आयोग तारीखों का ऐलान कर देगा। इन पांच राज्यों में से केवल पंजाब को छोड़कर बाकी चारों राज्यों में भारतीय जनता पार्टी की सरकार है और भगवा खेमा अपनी सत्ता कायम रखने के लिए पूरे दमखम से जुटा हुआ है। इस बीच पंजाब, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में भाजपा ने चुनाव से पहले ही तीन ऐसे मास्टर स्ट्रोक चल दिए हैं, जिसके बाद बाकी दल चुनावी मैनेजमेंट में काफी पीछे नजर आ रहे हैं।

पंजाब: करतारपुर के बहाने नाराजगी कम करने की कोशिश

पंजाब: करतारपुर के बहाने नाराजगी कम करने की कोशिश

साल 2020 के आखिर में जब पंजाब से बड़ी संख्या में किसान, खेती कानूनों के विरोध में दिल्ली की सीमाओं पर बैठे, तो भाजपा के लिए पंजाब की राह काफी मुश्किल हो गई। किसान आंदोलन जैसे-जैसे आगे बढ़ता गया, मीडिया में भाजपा के प्रति सिखों की नाराजगी की खबरें आने लगीं। हालांकि बीते दिनों पंजाब कांग्रेस में मचे घमासान के बीच जब पूर्व सीएम अमरिंदर सिंह ने अलग होकर अपनी नई पार्टी बनाने का ऐलान किया, तो भाजपा ने भी माहौल भांपते हुए करतारपुर कॉरिडोर को खोलने का ऐलान कर दिया। इस एक फैसले से जहां भाजपा के प्रति सिखों की नाराजगी में कमी आई, वहीं पार्टी यह संदेश देने में भी कामयाब रही कि राजनीतिक मुद्दों से अलग उसे सिखों की धार्मिक भावनाओं की भी कद्र है। इसे भाजपा का सफल मैनेजमेंट ही कहा जाएगा है कि करतारपुर कॉरिडोर खोलने के फैसले के साथ ही पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह के साथ गठबंधन को लेकर भी पार्टी ने कदम बढ़ाने शुरू कर दिए हैं।

यूपी: कृषि कानूनों की वापसी, क्यों है बड़ा दांव

यूपी: कृषि कानूनों की वापसी, क्यों है बड़ा दांव

केंद्र सरकार के तीन कृषि कानूनों के खिलाफ दिल्ली की सीमाओं पर पिछले एक साल से भी ज्यादा समय से चल रहे किसान आंदोलन को यूपी चुनाव में एक बड़े फैक्टर के तौर पर देखा जा रहा था। हाल ही में जब किसान संगठनों ने वेस्ट यूपी के मुजफ्फरनगर में एक विशाल रैली की, तो इस बात की सुगबुगाहट तेज हो गई कि वेस्ट यूपी में इस बार भाजपा की राह बहुत मुश्किल होगी। लेकिन, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कृषि कानूनों की वापसी का ऐलान किया, तो सियासी गुणा-भाग एक बार फिर से बदल गए। राजनीतिक जानकारों की मानें तो भले ही कृषि कानूनों की वापसी से किसानों की नाराजगी कम ना हो, लेकिन भाजपा को अब वेस्ट यूपी में पहले जैसे विरोध का सामना नहीं करना पड़ेगा। इसके साथ ही भाजपा चुनाव में इस बात को भी पुरजोर तरीके से उठाएगी कि कृषि कानूनों की वापसी के बाद भी अगर किसान आंदोलन जारी है, तो इसके पीछे विपक्ष की राजनीति है। ऐसे में कृषि कानूनों की वापसी को भाजपा के एक बड़े दांव के तौर पर देखा जा रहा है।

उत्तराखंड: देवस्थानम बोर्ड पर यूटर्न- विपक्ष के हाथ से छीना मुद्दा

उत्तराखंड: देवस्थानम बोर्ड पर यूटर्न- विपक्ष के हाथ से छीना मुद्दा

उत्तराखंड की त्रिवेंद्र सिंह रावत की सरकार में पेश किए गए देवस्थानम बोर्ड गठन के विधेयक को लेकर भाजपा शुरुआत से ही विरोध झेल रही थी। इस मामले पर जहां चारों धाम के पुरोहित संगठन खुलकर भाजपा और राज्य सरकार के विरोध में उतर आए थे, वहीं कांग्रेस और आम आदमी पार्टी ने भी इसे सियासी मुद्दा बनाने में देर नहीं की। इसकी पहली झलक उस वक्त मिली, जब पीएम मोदी के केदारनाथ दौरे से पहले ही भाजपा के दो दिग्गज नेताओं को केदारनाथ धाम में पुरोहितों का भारी विरोध झेलना पड़ा। ऐसे हालात में उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने विधानसभा चुनाव से पहले ही सियासी माहौल को भांपा और देवस्थानम बोर्ड बनाने के विधेयक को वापस लेने का ऐलान कर दिया। उत्तराखंड में राजनीतिक के जानकार भी इस बात को मान रहे हैं कि सीएम धामी ने विपक्ष के हाथ से एक बड़ा मुद्दा छीन लिया है। क्योंकि, चुनाव के दौरान देवस्थानम बोर्ड का मुद्दा उठता तो निश्चिंत तौर पर इससे भाजपा को काफी नुकसान हो सकता था।

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