क्या भारत में भी खाद की कीमतों में लगेगी आग, यूरिया-डीएपी के कैसे आसमान छू रहे हैं दाम ? जानिए
नई दिल्ली, 5 अप्रैल: पेट्रोल-डीजल की कीमतों में आए दिन इजाफा हो रहा है। इसकी वजह यूक्रेन और रूस के बीच चल रही जंग है, जिसके चलते कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतें बढ़ गई हैं। लेकिन, इसके चलते खाद की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में भी कई गुना इजाफा हो गया है। भारत में अभी जिस रेट पर किसानों को यूरिया और डीएपी जैसे उर्वरक मिल रहे हैं, उसके दाम दूसरे मुल्कों में कई गुना ज्यादा हो चुके हैं। नतीजा सरकारी खजाने पर खाद सब्सिडी का बोझ बढ़ता जा रहा है। भारत में किसानों को जितने दाम पर खाद मिल रही है, उसकी तुलना अगर दुनिया के बाकी देशों से करेंगे तो आपके पैर के नीचे से जमीन खिसक जाएगी। ऐसे में देखने वाली बात है कि केंद्र सरकार खाद सब्सिडी का बढ़ता बोझ कबतक अपने कंधों पर ढो पाती है।

खाद सब्सिडी का बोझ हो सकता है 2 लाख करोड़ रुपये के पार
रूस-यूक्रेन युद्ध के चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में उर्वरकों की कीमतें आसमान छू रही हैं। भारत भी इस संकट की चपेट में आ चुका है। टाइम्स ऑफ इंडिया में छपी एक खबर के मुताबिक सोमवार को एक सरकारी अधिकारी ने बताया है कि खाद की कीमतों में आग लगने की वजह से चालू वित्त वर्ष में अकेले उर्वरक सब्सिडी का बिल 2 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा हो जाएगा। यह आंकड़ा चालू वित्त वर्ष (2022-23) में इसके लिए रखे गए अनुमानों से 1 लाख करोड़ रुपये से भी ज्यादा है। यानी अंतरराष्ट्रीय बाजार में दाम बढ़ने के चलते सरकार के खजाने पर दबाव बढ़ चुका है। वैसे भी संशोधित अनुमानों के मुताबिक 31 मार्च को खत्म हुए वित्त वर्ष में इस मद में 1.4 लाख करोड़ का खर्च आया था।

गैस की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में 40% तक उछाल
यूक्रेन युद्ध के चलते अंतराष्ट्रीय गैस की कीमतों में 40% तक बढ़ोतरी हुई है। यूरिया के निर्माण में जितनी लागत आती है, उसका 70% अकेले गैस पर ही खर्च होता है। दरअसल, रूस-यूक्रेन युद्ध की वजह से बीते वित्त वर्ष के मुकाबले मौजूदा वित्त वर्ष में सिर्फ सप्लाई चेन में आई बाधा के चलते ही इसकी लागत पर करीब 60,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त खर्चा बढ़ने की संभावना है। यानी इसकी वजह से सब्सिडी का संकट और बढ़ेगा। एक अधिकारी के मुताबिक, 'उर्वरक के निर्माण के लिए एक प्रमुख सामग्री गैस होती है। ईरान पर पाबंदियों की वजह से हमारा सप्लाई चेन पहले से ही बाधित था और ऊपर से रूस-यूक्रेन युद्ध ने हालात को और भी बिगाड़ दिया है।' दरअसल, सप्लाई चेन की दिक्कत की वजह से डीएपी और यूरिया तैयार करने के लिए जो सामग्री चाहिए, उसमें दिक्कत हो रही है और इसी के चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में इन पदार्थों के भाव कई गुना चढ़ गए है।

भारत और बाकी देशों में यूरिया का भाव
भारत के लिए मुश्किल ये है कि खेती के लिए भी भी बड़ी मात्रा में इन उर्वरकों का आयात किया जाता है। देश में इस समय किसानों को यूरिया प्रति 50 किलो 266.7 रुपये में मिल रहा है। लेकिन, दुनिया के बाकी देशों में चाहे यूरिया हो या डीएपी या फिर पोटाश का म्यूरेट, वह कहीं ऊंची कीमतों पर बिक रही हैं। मसलन, पाकिस्तान में किसानों को उतनी ही मात्रा में यूरिया 791 रुपये की मिल रही है। जबकि, इंडोनेशिया में 593 रुपये और बांग्लादेश में 719 रुपये की। चीन में तो यूरिया का दाम भारत से करीब 8 गुना ज्यादा है; और ब्राजील में यह 13.5 गुना अधिक है। मतलब, उसी 50 किलो यूरिया की बोरी के लिए ब्राजील में 3,600 रुपये देने पड़ रहे हैं और अमेरिका में 3,060 रुपये। चीन में किसानों की वही यूरिया की बोरी 2,100 रुपये की मिल रही है।

भारत से दूसरे देशों में डीएपी की कीमत की तुलना
डीएपी और एमओपी की कीमतों में भी भारत की तुलना में इन देशों में ऐसा ही अंतर है। जैसे अपने देश में किसानों को डीएपी की 50 किलो की बोरी 1,200 रुपये से 1,350 रुपये के बीच मिी रही है। इंडोनेशिया में वही बोरी 9,700 रुपये की है। पाकिस्तान और ब्राजील में भी तीन गुना से ज्यादा है। चीन में भी भारत की तुलना में डीएपी दोगुनी कीमत पर बेची जा रही है। दरअसल, डीएपी और एपीके उर्वरकों के उत्पादन में रॉक फॉस्फेट प्रमुख कच्चा माल है और भारत को यह 90% विदेशों से मंगवाना पड़ता है। जाहिर है कि जब दुनिया में इनके दाम में बेतहाशा इजाफा हुआ है तो घरेलू खाद की कीमतें प्रभावित होना भी स्वाभाविक है।

फिलहाल सरकार उठा रही है ऊंची कीमतों का भार
वैसे रसायन और उर्वरक मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा है कि सरकार ने 30 लाख टन डीएपी और 70 लाख टन यूरिया का स्टॉक पहले से ही खरीद कर रख लिया है। मतलब, पूरे साल की जरूरतों के लिए खरीफ और रबी मौसम से पहले भरपूर स्टॉक उपलब्ध है। बड़े अधिकारियों ने विपक्षी दलों की चिंताओं को यह कहकर भी कम करने की कोशिश की है कि भारत ने उर्वरकों के उत्पादन के लिए देश में कई यूनिट लगाए हैं और कुछ वर्षों में भारत खाद की घरेलू आवश्यकताओं की पूर्ति करने में सक्षम हो जाएगा। उस अधिकारी के मुताबिक, 'सीजन की शुरुआत में खाद की दुकानों में लाइन दिखनी स्वाभाविक है, क्योंकि उस वक्त एक ही समय में सभी लोग पहुंचते है। लेकिन, इसको लेकर चिंता करने की जरूरत नहीं है।' उन्होंने भरोसा दिया कि 'देश में पर्याप्त स्टॉक और सप्लाई उपलब्ध है।' एएनआई ने इसकी जानकारी रखने वाले सूत्र के हवाले से कहा है कि 'केंद्र सरकार अतिरिक्त कीमतों का भार उठा रही है और इसे किसानों पर नहीं थोपा जा रहा है और किसानों को सब्सिडी दिया जाना जारी है।' लेकिन, 'इसे आसमान छूती कीमतों पर खरीद जारी रहने पर इस वित्त वर्ष में इसपर 2 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का खर्च आ सकता है।'
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