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दिल्ली में बदलते रहे हैं सड़कों के नाम, क्या इस बार अकबर रोड का नाम भी बदलेगा?

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राजधानी के दिल लुटियंस दिल्ली के अति विशिष्ट अकबर रोड पर रोज़ की तरह ट्रैफ़िक चल रहा है. इधर सड़क के दोनों तरफ़ बने बंगलों में रहने वालों और आने जाने वालों के गवाह हैं यहाँ पर लगे नीम, इमली और पीपल के बुज़ुर्ग पेड़.

इन्होंने अकबर रोड को तब से देखा है, जब 1931 में नई दिल्ली के उद्घाटन के साथ यह आबाद हो गया था. अब उसी अकबर रोड का नाम बदलने की मांग हो रही है.

मांग करने वाले कह रहे हैं कि अकबर रोड का नाम हाल ही में हेलिकॉप्टर हादसे का शिकार हुए भारत के चीफ़ ऑफ़ डिफ़ेंस स्टाफ़ (सीडीएस) जनरल बिपिन रावत के नाम पर रख दिया जाए.

मुग़ल सम्राट अकबर के नाम पर रखे अकबर रोड के नाम को बदलने की मांग लगातार होती रही है. इस सड़क का नाम बदलने की चाहत रखने वाले यहाँ पर लगे साइन बोर्ड पर काला रंग भी पोत चुके हैं.

क्या इस बार अकबर रोड का नाम बदला जाएगा? ये तो देखने वाली बात है. लेकिन इतना तय है कि इस बार माहौल इसके पक्ष में है क्योंकि जनरल रावत की अकाल मृत्यु के कारण अगर नाम अकबर रोड से जनरल रावत रोड हुआ, तो कोई बहुत विरोध के स्वर शायद सामने नहीं आएंगे.

अकबर रोड को राजधानी का पावर रोड भी कहते हैं. यहाँ देश की कई जानी-मानी शख़्सियतें रहती रही हैं. इसी अकबर रोड का 24 नंबर का बंगला 1977 से कांग्रेस का मुख्यालय है.

इसी अकबर रोड के 20 नंबर के भव्य डबल स्टोरी बंगले में 1952 से लोकसभा के स्पीकर रहते हैं. एक तरह से यह लोकसभा स्पीकर के लिए आरक्षित है. लोकसभा के पहले स्पीकर गणेश वासुदेव मावलंकर से लेकर मौजूदा स्पीकर ओम बिरला का यह सरकारी आवास रहा है.

सबसे पहले किस रोड का नाम बदला?

अगर अकबर रोड से बाहर निकल कर राजधानी की ख़ास सड़कों के नामों के बदलने के सिलसिले पर ग़ौर करें, तो मालूम चलेगा कि यहाँ देश की आज़ादी के बाद सबसे पहले अलबुकर्क रोड का नाम बदला गया था.

चूँकि महात्मा गांधी ने अपने जीवन के अंतिम 144 दिन अलबुकर्क रोड के बिड़ला हाउस में बिताए थे. उनकी हत्या के तुरंत बाद इस सड़क का नाम 30 जनवरी मार्ग कर दिया गया.

बताते चलें कि अल्फ़ांसो अलबुकर्क ( 1453-1515) गोवा के गवर्नर थे. उन्हीं के नाम पर थी यह सड़क. उनका जन्म पुर्तगाल में हुआ था और निधन गोवा में. मतलब ब्रिटिश सरकार ने नई दिल्ली की कुछ सड़कों के नाम कुछ ग़ैर ब्रिटिश और ग़ैर-भारतीय हस्तियों के नामों पर भी रखे थे.

अलबुकर्क रोड का नाम बदलने के साथ क्वींसवे हो गया जनपथ और किंग्सवे का नाम हो गया राजपथ. फिर तो सड़कों के नामों को बदलने का जो सिलसिला शुरू हुआ, वह चलता ही रहा.

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पंडित जवाहरलाल नेहरू को 2 सितंबर, 1946 में देश में अंतरिम सरकार के गठन के समय 17 यार्क रोड का बंगला आबंटित हुआ. हालांकि पंडित जवाहरलाल नेहरू और तीन मूर्ति भवन को जोड़कर देखा जाता है. यह सही है. लेकिन वे दिल्ली में तीन मूर्ति में भवन में ही रहे. यह बात सही नहीं है.

नेहरू जी का दिल्ली में पहला घर यार्क रोड पर ही था. आज़ादी के आंदोलन के दौरान नेहरू जी का जब भी दिल्ली में आना-जाना होता, तो वे यहाँ पर अपने मित्रों के घर में ही ठहरते. यार्क रोड आगे चलकर हो गया मोतीलाल नेहरू मार्ग.

पंडित जवाहरलाल नेहरू की सरपरस्ती में बनी अंतरिम सरकार में डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद भी थे. वे तब क्वींस विक्टोरिया रोड के बंगले में रहते थे. इसलिए उस सड़क का नाम राजेंद्र प्रसाद रोड कर दिया गया. वहाँ पर 1960 के दशक में शास्त्री भवन बना.

सेंट्रल विस्टा को नया स्वरूप देने के क्रम में अब उस पर भी हथौड़ा चलने की आशंका है. भारत के पहले उप प्रधानामंत्री सरदार पटेल राजधानी में 18 औरंगज़ेब रोड के एक निजी बंगले में रहे. लेकिन इस सड़क का नाम उनके नाम पर नहीं रखा गया.

लुटियन, जिन्होंने राजधानी को डिज़ाइन किया

हालाँकि अलग-अलग स्तरों पर मांग होती रही कि इस सड़क का नाम सरदार पटेल पर कर दिया जाए, लेकिन यह नहीं हुआ. इसका नया नाम हुआ एपीजे अब्दुल कलाम रोड 2015 में. बहरहाल, किचनर रोड हुआ सरदार पटेल मार्ग.

जनरल रावत भारत की सेना के प्रमुख की हैसियत से 4 राजाजी मार्ग (पहले किंग जॉर्ज एवेन्यू) के आर्मी हाउस में रहे. इसी में भारत के सेनाध्यक्ष रहते हैं और जनरल सैम मानेकशॉ, जनरल करिय्पा, जनरल के सुंदरजी जैसे आर्मी चीफ़ भी रहे हैं.

देश की आज़ादी के बाद से ही आर्मी चीफ़ इधर रहते रहे हैं. नई दिल्ली में एक से बढ़कर एक ख़ूबसूरत इमारतों के डिज़ाइन बनाने वाले एडविन लुटियन के नाम पर यहाँ कोई सड़क नहीं है. वे 10 राजाजी मार्ग के बंगले में रहते थे.

राष्ट्रपति भवन, दिल्ली जिमखाना क्लब, गोल डाकखाना वगैरह का डिज़ाइन तैयार करने वाले नई दिल्ली के चीफ़ आर्किटेक्ट लुटियन राजाजी मार्ग में रहते हुए नई दिल्ली की तमाम इमारतों के निर्माण का काम देख रहे थे.

देश के पहले शिक्षा मंत्री मौलाना आज़ाद का आशियाना था 4 किंग एडवर्ड रोड का बंगला. वे इसी में 1947 से लेकर 22 फ़रवरी 1958 को अपनी मृत्यु तक रहे. इसी बंगले से उनकी शव यात्रा भी निकली थी.

उनकी मृत्यु के बाद किंग एडवर्ड रोड का नाम बदलकर कर दिया गया था मौलाना आज़ाद रोड. यहाँ पर आगे चलकर 1956 में विज्ञान भवन का निर्माण हुआ. इसका भी तोड़ा जाना तय माना जा रहा है.

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सड़कों के नाम और उनके पीछे की कहानी

जिस दिल्ली में मुग़ल बादशाहों और गोरों के नामों पर रखी गई सड़कों के नाम बदले गए या उसकी मांग होती रही, उसी दिल्ली में जलियांवाला कांड के खलनायक का नाम ज़िंदा है. उस कत्लेआम के दो खलनायक थे. पहला, जनरल डायर. जनरल डायर ने ही निहत्थे लोगों पर गोलियाँ चलाने का आदेश दिया था.

दूसरा, तब ब्रिटेन के भारत में वायसराय रहे लॉर्ड चेम्सफ़ोर्ड. उन्होंने उस क़त्लेआम पर कभी कोई शोक व्यक्त नहीं किया. लेकिन उस शख़्स के नाम पर दिल्ली में चेम्सफ़ोर्ड रोड है. ये नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से कनॉट प्लेस में मिलती है. चेम्सफ़ोर्ड 1916 से लेकर 1921 तक भारत के वायसराय रहे.

ओबेरॉय इंटरकांटिनेंटल होटल के ठीक आगे की सड़क का नाम यूँ ही ज़ाकिर हुसैन रोड नहीं है. इसके पीछे एक कहानी है. दरअसल भारत के तीसरे राष्ट्रपति डॉक्टर ज़ाकिर हुसैन की 3 मई, 1969 को मृत्यु के बाद निकली शवयात्रा राष्ट्रपति भवन से जामिया मिल्लिया इस्लामिया की तरफ़ गई थी.

शव यात्रा रास्ते में पुराने वेस्ली रोड से गुज़री थी, इसलिए उस सड़क का नाम 1970 में डॉ. ज़ाकिर हुसैन रोड कर दिया गया था. इस बीच, इंडिया गेट को कनॉट प्लेस से मिलाने वाला कस्तूरबा गांधी मार्ग 1960 के दशक के अंत तक लॉर्ड कर्जन के नाम पर कर्जन रोड था. इससे सटा है टॉलस्टॉय मार्ग.

ये एक किलोमीटर से भी कुछ छोटी सड़क है. टॉलस्टॉय रोड का पहले नाम होता था सर हेग किलिंग रोड. किलिंग चीफ़ इंजीनियर थे जब नई दिल्ली का निर्माण हो रहा था. वे एडविन लुटियन के साथी थे. ख़ैर,1968 के आसपास इस सड़क का नाम हो गया 'वॉर एंड पीस' जैसे कालजयी उपन्यास के लेखक के नाम पर.

दरअसल राजधानी में 1970 के दशक के मध्य और 1980 के दशकों में अनेक सड़कों के नाम बदलते रहे. राजधानी के पुराने लोगों को याद होगा कि एक सड़क का नाम था कॉर्नवालिस रोड. ये नई दिल्ली की महत्वपूर्ण सड़क थी और अब भी है.

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इसका नाम बदलकर कर दिया गया था तमिल के संत कवि और स्वाधीनता सेनानी सुब्रमण्यम भारती के नाम पर. ये पंडारा पार्क के पास है.

यूँ तो सारी लुटियन दिल्ली बेजोड़ है, लेकिन अमृता शेरगिल मार्ग लाजवाब है. जामुन और अमलतास के पेड़ों से लबरेज़ अमृता शेरगिल मार्ग को साउथ एशिया का सबसे बेहतरीन आवासीय एरिया माना जाता है.

इधर से गुज़रते हुए आपको परिंदों की आवाज़ें सुनाई देती हैं ना कि ट्रैफ़िक का कोलाहल. चित्रकार अमृता शेर गिल कभी यहाँ नहीं रहीं, पर रेटनडन रोड हो गया अमृता शेर गिल मार्ग.

मंडी हाउस के क़रीब लेटन रोड हो गया कॉपरनिकस मार्ग. इसके क़रीब होता था पटौदी हाउस. इसके क़रीब कैनिंग रोड 2001 में माधव राव सिंधिया की विमान हादसे में मौत के बाद कर दिया गया श्रीमंत माधवराव मार्ग.

राष्ट्रपति भवन से कुछ दूरी पर मौजूद डलहौज़ी रोड 2017 में हो गया दारा शिकोह रोड. 21 सितंबर, 2016 को रेसकोर्स रोड का नाम बदलकर लोक कल्याण मार्ग किया गया था. इस रोड की पहचान यह है कि यहाँ देश के प्रधानमंत्री का आवास है.

भारत में 16 दिसंबर को पाकिस्तान पर 1971 की जंग में विजय के 50 साल का जश्न मनाया गया. उस जंग में जीत के बाद भारत-बांग्लादेश संबंध मज़बूत होते रहे. इसी का परिणाम था कि भारत ने बांग्लादेश के बंग बंधु शेख़ मुजीबुर्रहमा के नाम पर राजधानी में पार्क स्ट्रीट का नाम कर दिया शेख़ मुजीबुर्रहमान रोड. वे बांग्लादेश की प्रधानमंत्री के शेख़ हसीना के पिता थे.

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कैसे और कौन बदलता है नाम

अगर बात नई दिल्ली या लुटियन दिल्ली की करें, तो यहां की किसी सड़क या स्थान का नया नाम रखने के संबंध में प्रस्ताव विदेश मंत्रालय, एनजीओ, स्थानीय लोगों वगैरह की तरफ़ से नई दिल्ली नगर परिषद (एनडीएमसी) को भेजना होता है.

एक बार प्रस्ताव मिलने के बाद उसे एनडीएमसी के जनरल विभाग के पास विचारार्थ भेज दिया जाता है. उसके बाद, एनडीएससी की एक 13 सदस्यीय नाम बदलने संबंधी कमेटी उस पर विचार करती है.

एनडीएमसी के पूर्व सूचना निदेशक मदन थपलियाल ने बताया कि अगर किसी प्रस्ताव को मान लिया जाता है तो उस संबंध में जानकारी दिल्ली के पोस्ट मास्टर जनरल को दे दी जाती है.

किसी सड़क या स्थान का नाम बदलने के संबंध में गृह मंत्रालय के साफ़ दिशा निर्देश हैं. उनका पालन करना होता है. उदाहरण के लिए किसी सड़क या जगह का नया रखते समय स्थानीय लोगों की भावनाओं का ख़्याल रखना आवश्यक है. एक बात यह भी कि नया नाम रखने के कारण किसी तरह के भ्रम की स्थिति पैदा ना हो, इसका भी ध्यान रखा जाता है.

(नोट: ये लेखक के निजी विचार हैं)

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