राजनाथ सिंह देंगे मोदी कैबिनेट से इस्तीफा? कांग्रेस की इस मांग के आगे चुप है BJP, सेना से जुड़ा है विवाद

Rajnath Singh Resignation: क्या रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह अपने पद से इस्तीफा देंगे? कांग्रेस ने मोदी सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए सीधे रक्षा मंत्री का इस्तीफा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से माफी की मांग आखिर क्यों की है। पूरा मामला पिछले साल हुए 'ऑपरेशन सिंदूर' और उसमें शहीद हुए देश के जवानों से जुड़ा है। विपक्ष का आरोप है कि सरकार ने देश के वीर सपूतों की शहादत को एक साल से ज्यादा समय तक छिपाकर रखा और संसद को गुमराह किया।

कांग्रेस का कहना है कि संसद में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान किसी भी सैनिक के शहीद न होने की बात कहकर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने गलत जानकारी दी। अब जब नेशनल वॉर मेमोरियल पर छह सैन्यकर्मियों के नाम दर्ज किए गए हैं। दूसरी तरफ बीजेपी इस तीखे हमले पर रणनीतिक चुप्पी साधे हुए है, जिससे यह विवाद और गहरा गया है। दूसरी तरफ सरकार का कहना है कि मंत्री के बयान को संदर्भ से हटाकर पेश किया गया और शहीदों को पूरा सम्मान पहले ही दिया जा चुका था।

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कांग्रेस का सीधा हमला: "शहीदों के अपमान पर चुप क्यों है सरकार?"

कांग्रेस के पूर्व सैनिक विभाग के प्रमुख कर्नल (रिटायर्ड) रोहित चौधरी और विंग कमांडर (रिटायर्ड) अनुमा आचार्य ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में सरकार को कटघरे में खड़ा किया। चौधरी ने आरोप लगाया कि जुलाई 2025 में संसद के भीतर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने यह कहकर देश को गुमराह किया कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान कोई भी भारतीय सैनिक शहीद नहीं हुआ था।

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कांग्रेस नेताओं का कहना है कि जब रक्षा मंत्री सदन में यह बात बोल रहे थे, तब बीजेपी सांसद मेजें थपथपा रहे थे। कर्नल रोहित चौधरी ने कहा,"राजनाथ सिंह ने संसद में झूठ बोला और देश की सेना व शहीदों का अपमान किया है। उन्हें अपने पद पर रहने का कोई हक नहीं है, हम उनके इस्तीफे की मांग करते हैं। हमारी पार्टी उनके खिलाफ विशेषाधिकार हनन का प्रस्ताव (Breach of Privilege Motion) भी लाएगी।"

कांग्रेस की 3 मांगे हैं?

  • रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह को इस्तीफा देना चाहिए।
  • रक्षा मंत्री के खिलाफ विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव लाया जाना चाहिए।
  • नरेंद्र मोदी और BJP नेताओं को शहीदों के परिवार, सेना व देश से माफी मांगनी चाहिए।

इसके साथ ही कांग्रेस ने विवादित अग्निवीर योजना को भी पूरी तरह खत्म करने की मांग दोहराई है। अनुमा आचार्य ने कहा कि पहले देश के लिए जान देने वाले हर सैनिक को तुरंत सार्वजनिक रूप से सम्मान देने की परंपरा थी, लेकिन मौजूदा सरकार सेना का राजनीतिकरण कर रही है।

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'ऑपरेशन सिंदूर' में 6 जवान शहीद, 13 महीने बाद खुला राज

यह पूरा विवाद तब भड़का जब हाल ही में दिल्ली के नेशनल वॉर मेमोरियल (राष्ट्रीय समर स्मारक) की दीवार पर 6 'ऑपरेशन सिंदूर'में शहीद जवानों के नाम लिखे गए। ये वो जांबाज थे जिन्होंने मई 2025 में 'ऑपरेशन सिंदूर' के दौरान अपनी जान गंवाई थी। इनमें पांच भारतीय सेना (Indian Army) से और एक भारतीय वायुसेना (IAF) से थे।

अप्रैल 2025 में जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में एक बड़ा आतंकी हमला हुआ था, जिसमें 26 बेकसूर लोगों की जान चली गई थी। इसके जवाब में भारतीय सशस्त्र बलों ने मई 2025 में पाकिस्तान सीमा के पार जाकर एक बड़ी सैन्य कार्रवाई की, जिसे 'ऑपरेशन सिंदूर' नाम दिया गया।

कार्रवाई के तुरंत बाद, 11 मई 2025 को तत्कालीन सैन्य संचालन महानिदेशक (DGMO) लेफ्टिनेंट जनरल राजीव घाई ने मीडिया को बताया था कि हमारे कुछ जवानों ने सर्वोच्च बलिदान दिया है, लेकिन सुरक्षा कारणों से तब उनके नाम उजागर नहीं किए गए थे।

शहीदों का अंतिम संस्कार पूरे सैन्य सम्मान के साथ हुआ था और अगस्त 2025 में तत्कालीन वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल ए.पी. सिंह ने शहीद सार्जेंट सुरेंद्र कुमार के परिवार से मुलाकात भी की थी। सेना ने सोशल मीडिया पर भी इन्हें श्रद्धांजलि दी थी, लेकिन सरकार ने आधिकारिक तौर पर संसद में इनके नाम करीब 13 महीने बाद अब जाकर सार्वजनिक किए हैं।

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सरकार की सफाई: 'झूठ' नहीं, बल्कि बात को गलत तरीके से पेश किया गया

जब इस मामले ने तूल पकड़ा, तो रक्षा मंत्रालय ने अपनी स्थिति साफ करने की कोशिश की। सरकार का कहना है कि रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के जुलाई 2025 वाले बयान के एक हिस्से को सोशल मीडिया पर तोड़-मरोड़कर पेश किया जा रहा है।

मंत्रालय के मुताबिक, रक्षा मंत्री उस समय उन खबरों का जवाब दे रहे थे जिनमें दावा किया जा रहा था कि भारत के लड़ाकू विमानों को मार गिराया गया है। राजनाथ सिंह का मतलब यह था कि मिशन के दौरान किसी भी पायलट की जान नहीं गई और कोई विमान दुश्मन के हाथ नहीं लगा।

सरकार ने साफ किया कि विमानों के नुकसान और ऑपरेशन से जुड़ी बारीक जानकारियां बेहद संवेदनशील होती हैं, जिन्हें तुरंत सार्वजनिक नहीं किया जा सकता। रक्षा मंत्रालय ने कहा कि सरकार ने देश के नायकों को सबसे पहले और उचित अवसर पर पूरा सम्मान दिया है और उनकी शहादत का हमेशा आदर किया जाएगा।

सेना की गोपनीयता बनाम जनता के प्रति जवाबदेही पर क्या घिर सकते हैं राजनाथ सिंह?

असल में यह मामला देश की सुरक्षा रणनीति और लोकतांत्रिक जवाबदेही के बीच के टकराव को दिखाता है। युद्ध या सैन्य ऑपरेशन में सीक्रेसी (गोपनीयता) बहुत जरूरी होती है और दुश्मन को गफलत में रखने के लिए रणनीतिक चालें चली जाती हैं। लेकिन जब बात देश के लिए जान देने वाले सैनिकों की हो, तो सरकार को राजनीति से ऊपर उठकर पारदर्शिता दिखानी चाहिए।

कांग्रेस का कहना है कि अगर शहीदों का अंतिम संस्कार पूरे सैन्य सम्मान के साथ हुआ, वायुसेना प्रमुख ने उनके परिवारों से मुलाकात की और बहादुरी पुरस्कारों की घोषणा भी हुई, तो फिर सरकार ने उनके नाम सार्वजनिक करने में इतना समय क्यों लगाया।

सरकार की दलील है कि सैन्य अभियानों से जुड़ी कई जानकारियां सुरक्षा कारणों से तुरंत सार्वजनिक नहीं की जातीं। वहीं विपक्ष का तर्क है कि ऑपरेशन से जुड़ी रणनीतिक जानकारी अलग हो सकती है, लेकिन शहीदों के सम्मान और पारदर्शिता पर सवाल नहीं उठने चाहिए।

पूरे विवाद का केंद्र संसद में दिया गया राजनाथ सिंह का बयान है। विपक्ष इसे तथ्य छिपाने का मामला बता रहा है, जबकि सरकार कह रही है कि बयान का मतलब गलत तरीके से पेश किया गया। इसी वजह से राजनीतिक बहस अब इस सवाल पर आ गई है कि क्या राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर हर जानकारी रोकी जा सकती है या फिर जनता और संसद के प्रति जवाबदेही भी उतनी ही जरूरी है।

फिलहाल भाजपा ने कांग्रेस की इस्तीफे वाली मांग पर औपचारिक राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं दी है। लेकिन विपक्ष इस मुद्दे को संसद से लेकर सार्वजनिक मंचों तक उठाने की तैयारी में है। आने वाले दिनों में यह विवाद सिर्फ रक्षा मंत्री के बयान तक सीमित नहीं रह सकता, बल्कि सरकार की पारदर्शिता, राष्ट्रीय सुरक्षा और सैन्य अभियानों की जानकारी साझा करने की नीति पर भी बहस तेज हो सकती है।

संसद में यह कहना कि "कोई नुकसान नहीं हुआ" और फिर एक साल बाद वॉर मेमोरियल पर चुपके से नाम दर्ज करना, सरकार की साख पर सवाल उठा सकता है। किसी भी सैन्य कार्रवाई में जीत के साथ-साथ नुकसान का सही आकलन देश के सामने आना चाहिए, क्योंकि आखिर में इस हर कार्रवाई की कीमत देश की जनता और हमारे सैनिक ही चुकाते हैं। विपक्ष के तीखे सवालों के बीच अब देखना यह है कि क्या रक्षा मंत्री संसद के अगले सत्र में इस पर कोई नया बयान देते हैं या बीजेपी अपनी चुप्पी तोड़कर फ्रंट फुट पर आकर इसका जवाब देती है।

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