क्या जीएसटी से पेट्रोल-डीज़ल महंगा हो जाएगा?
पेट्रोल, डीज़ल को जीएसटी के दायरे से बाहर रखा गया है लेकिन इसकी प्रोसेसिंग से जुड़े अन्य सामानों पर जीएसटी लागू होने से कंपनियों की कुल लागत बढ़ेगी.
एक समान वस्तु एवं सेवा कर यानी जीएसटी को एक जुलाई से लागू किया जा रहा है, लेकिन जानकारों का कहना है कि इससे डीज़ल और पेट्रोल के दामों में वृद्धि होगी.
हालांकि पेट्रोल, डीज़ल को जीएसटी के दायरे से बाहर रखा गया है लेकिन इसकी प्रोसेसिंग से जुड़े अन्य सामानों पर जीएसटी लागू होने से कंपनियों की कुल लागत बढ़ेगी.
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ओएनजीसी के पूर्व प्रमुख आरएस बटोला के अनुसार, पेट्रोलियम कंपनियों पर 15 हज़ार से 25 हज़ार करोड़ का अतिरिक्त भार पड़ेगा जिसे वो ग्राहकों से वसूलना चाहेंगी.
उनका ये भी कहना है कि देश की अर्थव्यवस्था पर व्यापक असर पड़ेगा. बीबीसी संवाददाता संदीप राय ने आरएस बुटोला से ये जानने की कोशिश की कि जीएसटी का पेट्रोल और डीज़ल की क़ीमतों पर क्या असर पड़ेगा.
पेट्रोलियम पदार्थों को जीएसटी से बाहर क्यों रखा गया है?
मौजूदा समय में पेट्रोल-डीज़ल की क़ीमतें दो तरह के टैक्स से तय होती हैं. एक केंद्र सरकार की एक्साइज़ ड्यूटी और दूसरे राज्य सरकार की ओर से लगाया जाने वाला सेल्स टैक्स या वैट. इनसे आने वाला राजस्व सरकारी खजाने के सबसे बड़े स्रोतों में से एक है.
पेट्रोलियम क़ीमतों में 45 से लेकर 48 प्रतिशत तक टैक्स का हिस्सा होता है. कहीं-कहीं तो राज्य सरकारों ने 28 से 30 प्रतिशत तक वैट वसूलती हैं.
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जीएसटी में आने से राज्य सरकारों का ये हिस्सा चला जाएगा, इसीलिए उनके विरोध के चलते इसे जीएसटी के दायरे से बाहर रखा गया है.
जीएसटी पर बहस के दौरान भी इसे एल्कोहल की तरह संविधान संशोधन विधेयक से बाहर रखने की मांग की गई थी लेकिन अच्छी बात ये रही कि इसे विधेयक में शामिल कर लिया गया है.
यानी अभी पेट्रोल और डीज़ल पर जीएसटी भले न लागू हो, भविष्य में जब भी सहमति बनेगी, जीएसटी कांउसिल इसे अपने समान टैक्स दायरे में ला सकती है.
क्या पेट्रोल-डीज़ल की क़ीमतों पर असर पड़ेगा?
नैचुरल गैस, कच्चा तेल, पेट्रोल, डीज़ल और विमानों के तेल को जीएसटी के दायरे से बाहर रखा गया है.
लेकिन इनकी प्रोसेसिंग में इस्तेमाल होने वाले पदार्थों और उपकरणों पर जीएसटी लगेगा. प्रोसेसिंग में नैफ़्था एक ज़रूरी प्रोडक्ट होता है, इसके अलावा मशीनरी, कैटेलिस्ट (रसायन), नैफ़्था ऑयल और सेवाओं पर जीएसटी के कारण रिफ़ाइनिंग कंपनियों की लागत बढ़ेगी.
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नैफ़्था ऑयल पेट्रोलियम पदार्थों की प्रोसेसिंग का बहुत महत्वपूर्ण हिस्सा है.
जीएसटी 18 से 28 प्रतिशत के बीच रहने वाली है.
फ़ेडरेशन ऑफ़ इंडियन पेट्रोलियम इंडस्ट्रीज़ के अनुसार, इसके कारण पेट्रोलियम कंपनियों की लागत में प्रतिवर्ष 15,000 करोड़ रुपये का भार पड़ेगा.
जबकि सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी के एक सर्वे के अनुसार, लागत में ये वृद्धि हर साल 25,000 करोड़ रुपए तक हो सकती है.
ज़ाहिर सी बात है, कंपनियां इतने बड़े बोझ को खुद नहीं वहन करेंगी और इसका भार ग्राहकों पर डाला जाएगा.
फ़र्टिलाइज़र्स की क़ीमतों पर भी इसका असर पड़ेगा?
फ़र्टिलाइज़र्स का मुख्य कच्चा माल नैचुरल गैस होता है. जब पेट्रोलियम कंपनियां जब गैस बेचेंगी तो वो एक्साइज़ और वैट आदि टैक्स देंगी.
यानी ये टैक्स तो लागत में जुड़ेगा लेकिन जब फ़र्टिलाइज़र कंपनियां बेचेंगी तो उन्हें जीएसटी देना पड़ेगा और उन्हें इसमें पहले दिए टैक्स की छूट भी नहीं मिलेगी.
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पेट्रोलियम कंपनियों की लागत में एक बड़ा हिस्सा सेवाओं का भी होता है जिस पर उन्हें जीएसटी के हिसाब से टैक्स देना पड़ेगा.
इससे कुल मिलाकर लागत बढ़ेगी और क़ीमतों पर असर भी पड़ेगा.
इससे या तो सरकारी सब्सिडी बढ़ेगी या फिर इसका भार ग्राहकों पर पड़ेगा.
क्या पेट्रोल डीज़ल की क़ीमतों में एक जुलाई से कोई बदलाव देखने को मिलेगा?
क़ीमतों में तत्काल कोई बदलाव नहीं आएगा लेकिन आने वाले समय में इस पर असर ज़रूर पड़ेगा.
सरकार ने इसी महीने 16 जून को पेट्रोल और डीज़ल की क़ीमतों को अंतरराष्ट्रीय क़ीमतों में प्रतिदिन होने वाले बदलाव से जोड़ने का फैसला किया है.
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यानी पेट्रोल और डीज़ल की क़ीमतें सरकारी नियमन से पूरी तरह मुक्त हो गई हैं.
लेकिन जब क़ीमतें हर रोज़ बदलेंगी तो पेट्रोलियम कंपनियां नहीं चाहेंगी जीएसटी से पड़ने वाले भार को वो वहन करें.
वो इस भार को ग्राहकों पर डालने की पूरी कोशिश करेंगी.
अगर पेट्रोलियम पदार्थों को जीएसटी के दायरे में लाया जाता तो क़ीमतें कम होतीं?
मौजूदा समय में पेट्रोल डीज़ल पर क़रीब 48 प्रतिशत तक टैक्स लगता है. जीएसटी के तहत टैक्स अधिकतम 28 प्रतिशत तक हो सकता है.
ये तो नहीं कहा जा सकता कि जीएसटी के दायरे में पेट्रोलियम पदार्थों को लाने से दामों में ज़्यादा फ़र्क पड़ता. लेकिन ये ज़रूर है कि इससे क़ीमतें नहीं बढ़तीं.
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अब जब जीएसटी लागू होने वाला है तो कंपनियों को इसके हिसाब से कच्चा माल और मशीनरी पर जीएसटी देना पड़ेगा लेकिन जब वो बिक्री करेंगी और उस पर वैट देना पड़ेगा तो वो इसका फायदा भी नहीं उठा पाएंगी.
इससे न केवल डीज़ल, पेट्रोल, सीएनजी और फ़र्टिलाइज़र्स के दाम बढ़ेंगे. इसका अर्थव्यवस्था पर व्यापक असर पड़ेगा और मुद्रास्फ़ीति यानी महंगाई बढ़ेगी.
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