कांग्रेस का दम निकलने के बाद क्या भाजपा ही भाजपा को हराएगी?
नई दिल्ली। कहा जाता है कि इतिहास खुद को दोहराता है। मूल कथन इस तरह है कि इतिहास खुद को दोहराता है, पहले त्रासदी की तरह, दूसरे एक मजाक की तरह। हालांकि आगे चलकर इसमें यह भी जोड़ दिया जाने लगा कि इतिहास हमेशा एक ही तरह से खुद को नहीं दोहराता। कई बार वह भिन्न रूप में भी सामने आता है। ऐसे प्रसंग अक्सर सामने आते हैं जब इस तरह के सूक्त वाक्यों के जरिये अपनी बातें की जाती हैं। कुछ इसी तरह की बातें पांच वर्षों में गाहे ब गाहे की जाती रही हैं कि आने वाले दिनों में कभी खुद भाजपाई ही भाजपा को हराएंगे। 2019 के लोकसभा चुनावों के बाद नए सिरे से इसे कहा जाने लगा है। ऐसा कहते हुए इसका उदाहरण भी दिया जाता है कि जिस तरह कभी सर्वशक्तिमान बन चुकीं इंदिरा गांधी को खुद कांग्रेसियों ने मिलकर हराया था, उसी तरह भाजपा के साथ भी हो सकता है। ऐसी बातें करने वाले केवल आत्मसंतोषी नहीं लगते बल्कि उन्हें इसकी संभावना इस आधार पर लगती है कि जब भी कोई शासक खुद को सबसे ऊपर और सर्वशक्तिमान मानकर काम करने लगता है, तो उसके अपने ही उससे विमुख हो जाते हैं और झंडा बुलंद कर खुद का शासन स्थापित करने लगते हैं।

भाजपा की मनःस्थिति काफी हद तक इंदिरा गांधी वाली स्थिति में
भाजपा के बारे में भी इस तरह की सोच-समझ रखने वालों की संख्या कम नहीं है जो यह मानकर चल रहे हैं कि आज की भाजपा की मनःस्थिति काफी हद तक इंदिरा गांधी वाली स्थिति में पहुंच चुकी है। लोग भूले नहीं होंगे जब कांग्रेसी ‘इंदिरा इज इंडिया' कहने लगे थे। इंदिरा गांधी को दुर्गा तक कहा गया था। उन्होंने खुद को एक तरह की ऐसी सर्वशक्तिमान नेता के रूप में स्थापित करने में सफलता पाई थी कि उनके आसपास दूर-दूर तक कोई दूसरा नेता नहीं दिखाई देता था। तब कोई आसानी से यह सोचने की भी स्थिति में नहीं होता था कि कभी इंदिरा गांधी को भी हराया जा सकता है अथवा सत्ता से बाहर किया जा सकता है। लेकिन न केवल उन्हें लोगों ने सत्ता से बाहर कर दिया बल्कि तब ऐसा भी कहा जाने लगा था कि अब वह कभी भी उतनी मजबूत नहीं बन सकेंगी। यह काम किसी और ने नहीं, बल्कि कांग्रेसियों ने ही अलग होकर किया था और कारण बना था आपातकाल जो इंदिरा गांधी ने 1975 में लगाया था। इसके बाद कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता पार्टी छोड़कर चले गए और अपनी पार्टियां बना लीं। बाद में सभी ने मिलकर जनता पार्टी बनाई और चुनाव कराए गए तो इंदिरा गांधी को करारी शिकस्त मिली और जनता पार्टी सत्ता में आ गई। इन नेताओं में मोरारजी देसाई से लेकर चौधरी चरण सिंह, जगजीवन राम, हेमवती नंदन बहुगुणा, चंद्रशेखर और रामधन जैसे कई नाम प्रमुख रहे हैं। आपातकाल के बाद 1977 में हुए चुनाव में खुद इंदिरा गांधी को रायबरेली से पराजय का मुंह देखना पड़ा जो एक तरह की कांग्रेस की स्थायी सीट मानी जाती थी। तब समाजवादी नेता राजनारायण ने उन्हें अदालत में जाकर हराया था।

भाजपा का कांग्रेस मुक्त भारत का दावा काम कर रहा
भाजपा के बढ़ते ग्राफ, कांग्रेस के लगातार कमजोर होते जाने और भाजपा के एजेंडों ने इस आशय की आशंकाओं को बल प्रदान किया है हालांकि 2019 के आम चुनाव में मतदाताओं ने फिर से मोदी की सरकार के लिए जनादेश दे दिया और वह भी पहले से ज्यादा संख्या बल के साथ। इस चुनाव में भाजपा को 303 सीटों पर जीत मिली। 2014 में उसे 282 सीटों पर जीत मिली थी। मतलब उसका ग्राफ बढ़ गया। इसके विपरीत हालांकि कांग्रेस की सीटें कुछ बढ़ीं जरूर लेकिन वह पिछले चुनाव से कुछ ही ज्यादा रहीं। कांग्रेस को 2014 में 44 सीटें मिली थीं। 2019 में यह संख्या 52 तक ही पहुंच सकी। इससे यह माना जा रहा है कि भाजपा का कांग्रेस मुक्त भारत का दावा काम कर रहा है। अब दूसरी जीत के बाद सियासी हलकों में इस आशय की चर्चाएं भी जोर पकड़ने लगी हैं कि जो काम भाजपा सरकार अपने पहले कार्यकाल में नहीं कर सकी थी वह अब जरूर करेगी। इसमें ऐसे बहुत सारे मुद्दे रहे हैं जिन्हें भाजपा के खांटी मुद्दे माना जाता है। इनमें धारा 370 से लेकर 35 ए, राम मंदिर निर्माण, एनआरसी, हिंदुत्व, जैसे कितने ही मुद्दे शामिल हैं। इनमें से कोई भी मुद्दा कब बड़ा हो जाएगा, कहा नहीं जा सकता और तब उस तरह की स्थिति उत्पन्न हो सकती है जैसी इंदिरा गांधी के समय हुई थी।

सांगठनिक स्तर पर कांग्रेस और भाजपा में बुनियादी अंतर
इस संदर्भ में कुछ बातें ऐसी भी हैं जिनको नजरंदाज नहीं किया जाना चाहिए। सांगठनिक स्तर पर कांग्रेस और भाजपा में कुछ बुनियादी अंतर भी हैं जो दोनों को एक दूसरे से अलग करते हैं। कांग्रेस शुरू से ही ऐसा संगठन रहा है जिसमें तमाम तरह के विचारों वाले रहते रहे हैं। भाजपा के साथ कभी भी ऐसा नहीं रहा है। अब जरूर ऐसा हुआ है कि चुनाव में जीत की गारंटी के लिए भले ही किसी को भी पार्टी में शामिल कर टिकट दे दिया जा रहा हो, लेकिन अभी भी वहां किसी को भी पार्टी लाइन से इतर जाने की इजाजत नहीं मिल पाती है। वैसे भी बाहर से भाजपा में आए नेताओं में किसी की ऐसी हैसियत नहीं लगती कि वह उससे अलग होकर कुछ कर सकेगा जिस तरह की क्षमता वाले उस समय के कांग्रेसी नेता थे। इसी तरह भाजपाई नेताओं के बारे में भी यह कहा जा सकता है कि उनमें से कोई भी एक तो विद्रोह करने और अलग होने की मानसिकता वाला नहीं लगता। दूसरे वह कुछ कर सकता है, इसकी संभावना भी बहुत कम लगती है। इसके उदाहरण लालकृष्ण आडवाणी से लेकर मुरली मनोहर जोशी समेत तमाम नेताओं के मद्देनजर आसानी से देखे जा सकते हैं। यशवंत सिन्हा और अरुण शौरी जैसे नेता विरोध में जरूर खड़े हैं, लेकिन वह भी बहुत कुछ कर नहीं पा रहे हैं। किसी के लिए यह मानना भी आसान नहीं लगता कि कांग्रेस इस देश की राजनीति से कभी पूरी तरह समाप्त हो जाएगी। फिर भी संभावनाओं को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता क्योंकि राजनीति को संभावनाओं का खेल भी माना जाता है। इसीलिए यह भी कहा जाता है कि राजनीति कब किसे कहां ले जाएगी, कहा नहीं जा सकता। ऐसे में यह केवल देखने की ही बात होगी कि इतिहास खुद को दोहराता है अथवा नहीं और अगर दोहराता है तो किस रूप में।












Click it and Unblock the Notifications