स्टालिन देंगे मोदी का साथ? DMK से सरकार को किस बात की उम्मीद, BJP-कांग्रेस में मची '22 सांसदों' के लिए जंग!
संसद का मॉनसून सत्र 20 जुलाई से शुरू होने जा रहा है। इस बार सबसे ज्यादा चर्चा दो बड़े संविधान संशोधन प्रस्तावों की है। पहला महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण लागू करने का रास्ता साफ करना। दूसरा लोकसभा की सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर 850 करने से जुड़ा परिसीमन बिल। इन दोनों प्रस्तावों को पास कराने के लिए सरकार को दो-तिहाई बहुमत चाहिए। यही वजह है कि इस बार पूरी लाइमलाइट एमके स्टालिन की पार्टी डीएमके (DMK) पर है।
तीन महीने पहले अप्रैल में हुए विशेष सत्र के दौरान सरकार के पास नंबर कम थे, जिसकी वजह से ये दोनों बिल लोकसभा में गिर गए थे। तब सदन में मौजूद 528 सांसदों में से केवल 298 ने बिल के पक्ष में वोट किया था जबकि 230 इसके खिलाफ थे। अब सरकार दोबारा इस मिशन में जुट गई है।

अप्रैल से जुलाई तक कैसे बदला संसद का नंबर गेम?
लोकसभा में दो-तिहाई बहुमत यानी जादुई आंकड़ा छूने के लिए सरकार को 360 सांसदों का समर्थन चाहिए। बीजेपी के नेतृत्व वाले NDA के पास अभी अपने 293 सांसद हैं। हालिया सियासी उठापटक के बाद ममता बनर्जी की टीएमसी (20 सांसद) और उद्धव ठाकरे की शिवसेना-यूबीटी (6 सांसद) के रुख में बदलाव से सरकार को राहत मिली है।
इसके साथ ही शरद पवार की पार्टी के 8 सांसदों का समर्थन मिलने से यह आंकड़ा 327 तक पहुंच जाता है। अप्रैल में 5 अन्य निर्दलीय या छोटे दलों के सांसदों ने भी सरकार का साथ दिया था, जिससे कुल नंबर 332 बनता है। इसके बावजूद सरकार बहुमत से 28 सीट दूर है। यहीं पर डीएमके एंट्री होती है, जिसके पास 22 लोकसभा सांसद हैं। अगर डीएमके साथ आ जाए, तो सरकार की राह बेहद आसान हो जाएगी।
BJP को स्टालिन की पार्टी से क्या उम्मीद है?
पिछले तीन महीनों में देश की राजनीति में काफी कुछ बदल चुका है। तमिलनाडु के सियासी समीकरण बदल गए हैं। जहां डीएमके अब सत्ता से बाहर है। इसके अलावा राज्य के नए राजनीतिक दल टीवीके (TVK) के साथ कांग्रेस के जाने के बाद डीएमके और कांग्रेस का पुराना गठबंधन टूट चुका है। डीएमके ने तो लोकसभा में कांग्रेस से अलग बैठने तक की मांग कर दी है।
केंद्रीय मंत्री रामदास अठावले का कहना है कि मानसून सत्र में दोनों बिल आसानी से पास हो जाएंगे क्योंकि कई विपक्षी दलों ने अपना मन बदल लिया है। बीजेपी रणनीतिकारों को उम्मीद है कि अगर डीएमके बिल के पक्ष में खुलकर वोट नहीं भी करती है तो वह वोटिंग के समय सदन से वॉकआउट (दूर) कर सकती है। अगर डीएमके के 22 सांसद वोटिंग में हिस्सा नहीं लेते हैं, तो सदन का कुल आंकड़ा कम हो जाएगा और सरकार कम वोटों में भी दो-तिहाई बहुमत साबित कर देगी।
परिसीमन से आखिर दक्षिण के राज्यों को क्या है डर?
डीएमके शुरू से ही परिसीमन (Delimitation) यानी लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाने का विरोध करती रही है। पार्टी का तर्क है कि यह बिल आबादी के आधार पर सीटों का बंटवारा करेगा। दक्षिण भारत के राज्यों ने सालों से जनसंख्या नियंत्रण (Population Control) पर काम किया है, जबकि उत्तर भारत के राज्यों में आबादी तेजी से बढ़ी है।
डीएमके नेता कनिमोझी करुणानिधि ने साफ कहा है कि उन्होंने परिसीमन से जुड़े कुछ गंभीर मुद्दे सरकार के सामने रखे हैं। उनका कहना है कि आबादी कंट्रोल करने के अच्छे काम के लिए दक्षिण के राज्यों को सजा नहीं मिलनी चाहिए और तमिलनाडु के हितों की रक्षा हर हाल में होनी चाहिए। हालांकि उन्होंने यह भी संकेत दिए कि सरकार इन चिंताओं पर सकारात्मक विचार करने को तैयार है, जिससे बातचीत का रास्ता खुला है।
DMK किसको करेगी सपोर्ट? कांग्रेस और बीजेपी में जंग
इस पूरे घटनाक्रम में डीएमके 'किंगमेकर' की भूमिका में आ गई है। यही वजह है कि बीजेपी और कांग्रेस दोनों ही डीएमके को अपने पाले में रखने के लिए पूरा जोर लगा रहे हैं। कांग्रेस किसी भी कीमत पर विपक्ष की एकजुटता को बनाए रखना चाहती है ताकि अप्रैल की तरह इस बार भी बिल को रोका जा सके। कांग्रेस सांसदों ने इसके लिए स्टालिन की टीम से संपर्क भी साधा है।
दूसरी तरफ बीजेपी के बड़े नेता केवल डीएमके ही नहीं, बल्कि समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के भी कुछ असंतुष्ट सांसदों से बैकचैनल बातचीत कर रहे हैं। हालांकि भाजपा की इस बार कोशिश है कि जब तक नंबर पूरी तरह पक्के नहीं हो जाते, सरकार बिल पेश करने में जल्दबाजी नहीं करेगी। अब देखना यह है कि मॉनसून सत्र में स्टालिन क्या रुख अपनाते हैं।












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