क्या भाजपा का गढ़ बन चुके भोपाल को भेद पाएंगे दिग्विजय?

भोपाल। भोपाल लोकसभा सीट से कांग्रेस के उम्मीदवार के रूप में नाम घोषित होते ही दिग्विजय सिंह ने कहा था कि उनकी पसंदीदा लोकसभा सीट राजगढ़ है, क्योंकि उनकी पूर्व रियासत राघौगढ़ राजगढ़ संसदीय क्षेत्र में ही आती है, लेकिन फिर भी मैं पार्टी का निर्देश मानते हुए भोपाल से चुनाव लड़ूंगा और जीतूंगा। कांग्रेस को दिग्विजय सिंह से बहुत आशाएं हैं।

क्या भाजपा का गढ़ बन चुके भोपाल को भेद पाएंगे दिग्विजय?

वास्तव में 1984 के लोकसभा चुनाव के बाद कांग्रेस ने भोपाल सीट कभी नहीं जीती। तब एन.के. प्रधान ने भोपाल से विजय हासिल की थी। उसके बाद हुए 4 चुनावों में भाजपा सुशील चंद्र वर्मा को टिकट देती रही और वे जीतते रहे। 1999 में उमा भारती को टिकट मिला और वे जीतीं। 2004 और 2009 में कैलाश जोशी लोकसभा में भोपाल से ही गए थे। पिछले चुनाव में भाजपा ने यहां से आलोक संजर को टिकट दिया था।

मध्य प्रदेश की राजनीति में भोपाल सीट का बहुत महत्व है

मध्य प्रदेश की राजनीति में भोपाल सीट का बहुत महत्व है

मध्यप्रदेश की राजनीति में भोपाल सीट का बहुत महत्व है। शायद इसीलिए बाबूलाल गौर ने भोपाल से टिकट चाहा था। पूर्व राष्ट्रपति शंकरदयाल शर्मा 4 बार भोपाल से चुनाव जीतकर जा चुके थे। कैलाश जोशी और उमा भारती ने मुख्यमंत्री का पद संभाला था। 1977 में भारतीय लोकदल ने यहां से आरिफ बेग को उम्मीदवार बनाया था और वे यहां से सफल हुए थे। अब मध्यप्रदेश में भारतीय लोकदल का वजूद कुछ बचा नहीं।

भारतीय जनता पार्टी को लगता था कि भोपाल की सीट उसकी निजी सीट है, लेकिन दिग्विजय सिंह की उम्मीदवारी के बाद पूरे देश की निगाहें भोपाल पर हैं। भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय का कहना है कि भाजपा अगर किसी पार्षद को भी भोपाल से उम्मीदवार बनाए, तो वह दिग्विजय सिंह को हरा सकता है। अगर आलोक संजर ही भाजपा की तरफ से लड़ते हैं, तब भी सीट भाजपा के साथ ही रहेगी।

प्रज्ञा ठाकुर को टिकट दे सकती है भाजपा

प्रज्ञा ठाकुर को टिकट दे सकती है भाजपा

भोपाल की सीट पर भाजपा की चिंता उस वक्त जाहिर हुई, जब केन्द्रीय मंत्री रहे नरेन्द्र सिंह तोमर के नाम की चर्चा भोपाल से हुई। नरेन्द्र सिंह तोमर ने ही मुरैना की जगह भोपाल से चुनाव लड़ने की मंजूरी दे दी थी, लेकिन फिर उनका नाम भी रोक लिया गया। अब भाजपा भोपाल की सीट से मालेगांव बम ब्लास्ट की अभियुक्त रही प्रज्ञा ठाकुर को टिकट दे सकती है। प्रज्ञा ठाकुर को टिकट देने के पीछे उनका अतिवादी रवैया तो है ही, दिग्विजय सिंह के विरुद्ध उनकी निजी खटास भी है। उन्हें लगता है कि मालेगांव बम ब्लास्ट मामले में उन्हें फंसाने की पूरी ‘साजिश' दिग्विजय सिंह ने की थी और वे दिग्विजय सिंह से किसी भी तरह बदला जरूर लेंगी। न्यायालय ने प्रज्ञा ठाकुर को बरी कर दिया है।

साध्वी प्रज्ञा ठाकुर भिंड जिले की हैं और भाजपा के एक वर्ग में बेहद सम्माननीय भी हैं। अगर उन्हें टिकट मिला, तो एक बड़ा वर्ग उन्हें जिताने के लिए मैदान में आ जाएगा। दूसरी तरफ भाजपा के नेताओं के कहना है कि अगर दिग्विजय सिंह राजगढ़ छोड़कर भोपाल से चुनाव लड़ रहे हैं, तो भाजपा भी विदिशा संसदीय क्षेत्र से लोकसभा सदस्य रहे शिवराज सिंह चौहान को मौका दे सकती है।

दिग्विजय को भोपाल की सीट से उतारने के पीछे कमलनाथ का ये है दांव

दिग्विजय को भोपाल की सीट से उतारने के पीछे कमलनाथ का ये है दांव

भाजपा दिग्विजय सिंह की उम्मीदवारी को यह कहकर प्रचारित कर रही है कि मुख्यमंत्री कमलनाथ ने दिग्विजय सिंह के राजनीतिक भविष्य को दांव पर लगाने के इरादे से ही उम्मीदवार बनवाया है। अगर दिग्विजय सिंह भोपाल से जीतते है, तो कमलनाथ कहेंगे कि कांग्रेस के नेताओं ने दिग्विजय सिंह को इस महत्वपूर्ण सीट पर टिकट दिलवाया और जितवाया और अगर दिग्विजय सिंह हार जाते हैं, तो कमलनाथ के सामने एक शैडो मुख्यमंत्री की किरकिरी खत्म हो जाएगी।

भोपाल लोकसभा सीट में भोपाल और निकटवर्ती सीहोर जिले का एक हिस्सा शामिल है। यहां विधानसभा की 8 सीटें है, जिनमें से 5 बार भाजपा का कब्जा है। राजधानी होने के नाते भोपाल में सरकारी कर्मचारियों का एक बड़ा वर्ग है। सरकारी कर्मचारियों की संख्या और जाति का आंकड़ा देखते हुए ही भाजपा यहां से सुशील चंद्र वर्मा को टिकट देती आई थी और वे चार बार जीते भी। कांग्रेस ने यहां से सुरेश पचौरी को टिकट दिया था, लेकिन वे नहीं जीत पाए।

कांग्रेस यहां से भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान नवाब मंसूर अली खान पटौदी को भी चुनाव लड़ा चुकी है। मुस्लिम मतदाताओं की बड़ी संख्या होने के बाद भी वे यहां से नहीं जीत सके। भोपाल में बड़ी संख्या में कायस्थ और ब्राह्मण रहते है। सुरेश पचौरी ब्राह्मण होने के बाद भी यहां से जीत हासिल नहीं कर पाए। ऐसे में जाति समीकरण भोपाल में कोई बड़ा काम शायद नहीं कर पाए।

भोपाल से बीजेपी किसे देगी टिकट?

भोपाल से बीजेपी किसे देगी टिकट?

दिग्विजय सिंह की उम्मीदवारी के पीछे एक प्रमुख कारण यह माना जाता है कि 10 वर्ष तक मुख्यमंत्री और 5 वर्ष तक प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रहने के दौरान दिग्विजय सिंह ने स्थानीय कांग्रेस कार्यकर्ताओं से नजदीकी बना ली थी। जब वे मुख्यमंत्री नहीं रहे, तब भी उनके संपर्क लगातार बने रहे। मुख्यमंत्री रहने के दौरान उन्होंने सरकारी कर्मचारियों के लिए कई सुविधाओं की घोषणा की थी, जिस कारण शासकीय कर्मचारियों का एक वर्ग उनके साथ जा सकता है। भोपाल के कांग्रेस कार्यकर्ता मानते है कि दिग्विजय सिंह कांग्रेस के अखिल भारतीय स्वरूप के प्रतिनिधि है। चुनाव के दौरान कांग्रेस कार्यकर्ता एक मत होकर दिग्विजय सिंह के लिए कार्य करेंगे।

भारतीय जनता पार्टी भोपाल से किसको टिकट देगी, इस पर सभी की निगाहें टिकी हुई हैं। पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर भोपाल के दिग्गज नेता हैं। वे मुख्यमंत्री रह चुके हैं और उनकी पुत्रवधु कृष्णा गौर भोपाल की मेयर रह चुकी हैं। बाबूलाल गौर अपनी बहू के लिए भी टिकट मांग चुके हैं। भाजपा फैसला नहीं कर पा रही है कि नरेन्द्र सिंह तोमर को टिकट दें या किसी अन्य को। अगर बाबूलाल गौर को टिकट मिलता, तो चुनाव दिलचस्प होता, क्योंकि दो पूर्व मुख्यमंत्रियों की टक्कर भोपाल में होती। भाजपा टिकट वितरण में जो देर कर रही है, उससे लगता है कि अंदरूनी खेमे में घबराहट जरूर है। इस बार भाजपा को कड़ी टक्कर का सामना करना पड़ेगा।

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