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मणिपुर विधानसभा चुनाव: क्या 2017 का करिश्मा 2022 में भी दोहरा पाएगी भाजपा ?

नई दिल्ली, 11 दिसंबर। म्यांमार की सीमा पर बसा मणिपुर भारत का एक संवेदनशील राज्य है। यहां विधानसभा का कार्यकाल 19 मार्च 2022 को खत्म हो रहा है। दो-ढाई महीने बाद चुनाव होने हैं। मणिपुर में भाजपा की सरकार है और उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती सरकार बचाने की है। 2022 में उसने 40 सीटों पर जीत का लक्ष्य निर्धारित किया है। इस लक्ष्य को पाना आसान नहीं है।

will bjp be able to win Manipur Assembly Elections 2022 as like 2017?

2017 में भाजपा को 60 में 21 सीटें मिलीं थीं और उसे गठबंधन सरकार के लिए मजबूर होना पड़ा था। इस बार वह अकेले बहुमत का आंकड़ा पार करना चाहती है। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए ही भाजपा ने एक तेज-तर्रार महिला नेता ए शारदा देवी को प्रदेश की कमान सौंपी है। भाजपा का मुकाबला कांग्रेस से है। मणिपुर एक छोटा राज्य है। यहां एक विधानसभा क्षेत्र में औसतन करीब 30 हजार वोटर ही होते हैं। इसलिए यहां की चुनावी रणनीति अन्य राज्यों से अलग है।

2017 में भाजपा ने किया था करिश्मा

2017 में भाजपा ने किया था करिश्मा

पूर्वोत्तर के मणिपुर में भाजपा ने 2017 में चमत्कार किया था। पिछले दो चुनावों में जिस दल का खाता तक नहीं खुला उसने 2017 में सीधे सरकार ही बना ली थी। भाजपा ने ये चमत्कार किया था कांग्रेस के एक पुराने नेता एन बीरेन सिंह के दम पर। वे चुनाव से चार महीना पहले (2016) कांग्रेस छोड़ कर भाजपा में शामिल हुए थे। उस समय अमित शाह कांग्रेस के अध्यक्ष थे। उन्होंने बीरेन सिंह के साथ मिल बेजान भाजपा को मणिपुर में एक मुख्य प्रतिदंवद्वी के रूप में खड़ा कर दिया। एन विरेन सिंह ने अपने जनाधार का इस्तेमाल कर भाजपा को मजबूत बनाया। 2017 के चुनाव में 21 सीटें जीत तक भाजपा दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बन गयी। 28 सीटें जीत कर भी कांग्रेस सरकार नहीं बना सकी। एन बीरेन सिंह ने क्षेत्रीय दलों के साथ मिल कर सरकार बना ली। भाजपा ने केवल चार महीने की मेहनत में करिश्मा कर दिया। उसने 15 साल से कायम कांग्रेस की सत्ता उखाड़ फेंकी।

दल-बदल का बोलबाला

दल-बदल का बोलबाला

मणिपुर की राजनीति में विचारवाद से अधिक अवसरवाद प्रभावी रहा है। दल-बदल यहां एक सामान्य प्रवृति है। इसकी वजह से राजनीतिक हालात के बदलते देर नहीं लगती। 2017 में भाजपा ने (21) नेशनल पीपल्स पार्टी (4), नगा पीपल्स फ्रंट (4), लोजपा (1) और दो अन्य विधायकों के सहयोग से सरकार बनायी थी। एन बीरेन सिंह मुख्यमंत्री बने थे। जून 2020 में छह विधायकों ने सरकार से समर्थन वापस ले लिया था। सरकार अल्पमत में आ गयी। तब कांग्रेस ने बीरेन सरकार के खिलाफ सदन में अविश्वास प्रस्ताव पेश कर दिया। कांग्रेस के 28 विधायक जीते थे लेकिन तब 24 ही बचे थे। सदन की सदस्य संख्या 60 के बदले 53 रह गयी थी। अगस्त 2020 में मतविभाजन हुआ। कांग्रेस के 8 सदस्य सदन से गैरहाजिर हो गये। मतविभाजन हुआ तो भाजपा सरकार के पक्ष में 28 वोट पड़े। कांग्रेस के केवल 16 विधायक सदन में मौजूद थे जिसकी वजह से वीरेन सरकार ने विश्वास मत आसानी से जीत लिया। यानी कांग्रेस के विधायकों ने गैरहाजिर हो कर भाजपा सरकार को गिरने से बचा लिया था।

कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष बन चुके हैं भाजपा नेता

कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष बन चुके हैं भाजपा नेता

भाजपा ने जून 2021 में ए शारदा देवी को प्रदेश अध्यक्ष बना कर बहुत बड़ा दांव खेला था। मणिपुर के सामाजिक जीवन में महिलाओं का अहम स्थान है। राजधानी इम्फाल में एक ऐसा बाजार है जहां की चार हजार से अधिक दुकानें सिर्फ महिलाएं ही चलाती हैं। ग्रामीण जीवन में भी महिलाएं घर-गृहस्थी का मुख्य आधार हैं। शरदा देवी ने अध्यक्ष बनते ही राज्य के कोने-कोने में यात्रा कर भाजपा की पहुंच को बढ़ाया है। उनके अध्यक्ष बनने के एक महीने बाद ही मणिपुर कांग्रेस के अध्यक्ष गोबिनदास कोंथोजम पार्टी छोड़ कर भाजपा में शामिल हो गये। कांग्रेस के कई विधायक भी भाजपा में शामिल हुए। भाजपा अन्य दलों के मजबूत नेताओं को जोड़ कर अपना विस्तार कर रही है। अभी जो स्थिति है उसके मुताबिक सबसे अधिक भाजपा के टिकट की मांग है। अधिकतर नेता भाजपा से टिकट पाने के लिए भाग-दौड़ कर रहे हैं। दूसरी प्राथमिकता नेशनल पीपल्स पार्टी है। इसका भी प्रभाव हाल के दिनों में बढ़ा है। पर्वतीय इलाकों में नगा पीपल्स फ्रंट का जनाधार है। यहां एनपीएफ के टिकट के लिए मारामारी है। जहां तक कांग्रेस पार्टी का सवाल है तो वह पिछले कुछ समय में और कमजोर हुई है। मजबूत और प्रभावशाली नेता पार्टी छोड़ चुके हैं। अब उसे नये चेहरों के दम पर चुनाव में उतरना होगा। तृणमूल कांग्रेस ने भी इस बार मणिपुर में जोरशोर से चुनाव लड़ने की तैयारी की है। 2012 में वह यहां 7 सीट जीत चुकी है। 2017 में उसे एक सीट मिली थी। तृणमूल के लड़ने से यहां मुकाबला त्रिकोणीय हो सकता है।

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