यूपी चुनाव : मोदी-योगी के गढ़ में क्या अखिलेश 'खेला' कर पाएंगे?
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में आख़िरी दो चरणों की वोटिंग बाक़ी है.
इन इलाकों में 3 और 7 मार्च को वोटिंग होगी.
3 मार्च को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के गढ़ गोरखपुर में वोटिंग है.
और 7 मार्च को पीएम मोदी के गढ़ वाराणसी में वोटिंग होगी.
इसी फेज़ में आज़मगढ में भी वोटिंग होगी, जहाँ से ख़ुद अखिलेश यादव लोकसभा सांसद है. ये बात और है कि विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए उन्होंने करहल की सीट चुनी.
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, पीएम नरेंद्र मोदी और समाजवादी पार्टी नेता अखिलेश यादव - तीनों दिग्गजों की राजनीतिक कर्मभूमि होने की वजह से ये इलाका यूपी चुनाव के अंतिम दौर में चर्चा का विषय बना हुआ है.
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छोटी पार्टियों और बाग़ियों का लिटमस टेस्ट
पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा ने इस इलाके में 100 से ज़्यादा सीटों पर जीत दर्ज की थी.
लेकिन विश्लेषकों की राय में इस बार मुक़ाबला एकतरफ़ा नही है, बीजेपी को इस बात की टेंशन है. नवंबर-दिसंबर के दो महीने में भी पीएम मोदी पूर्वांचल का छह बार दौरा कर चुकें है.
चर्चा है कि पीएम मोदी, जो वाराणसी से सांसद भी हैं आख़िरी चरण में दो-तीन दिन लगातार इसी इलाके में चुनाव प्रचार में व्यस्त रहेंगे.
मोदी के दौरे को भाजपा की टेंशन से जोड़ कर देखा जा रहा है.
लेकिन वरिष्ठ पत्रकार और वाराणसी में रहने वाले असद कमाल लारी कहते हैं, "समाजवादी पार्टी के लिए ये दोनों चरण 'लिटमस टेस्ट' की तरह हैं. चुनाव से पहले छोटे दलों के साथ जो उन्होंने गठबंधन किया है, उसका फ़ायदा और नुक़सान भी इन्हीं चरणों में पता चलेगा.
स्वामी प्रसाद मौर्य हों या फिर बीजेपी छोड़ समाजवादी पार्टी में आए ओपी राजभर हों, या फिर भाजपा के साथ इन चुनावों में निषाद पार्टी हो - इनका प्रभाव पहले कितना था और इस बार कितना बरकरार है, इस बात का फ़ैसला भी इन्हीं दो चरणों में होना है. बीजेपी के लिए भी पूर्वांचल की चुनावी पिच इस बार थोड़ी बदली हुई है."
ग़ौरतलब है कि ओपी राजभर की सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी पिछले चुनाव में बीजेपी के साथ थी, लेकिन इस बार समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन में है और 18 सीटों पर चुनाव लड़ रही है.
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इनका प्रभाव क्षेत्र पूर्वांचल को ही माना जाता है. साल 2017 में ओपी राजभर ने बीजेपी के साथ गठबंधन करके चार सीटें हासिल की थीं और इस चुनाव के बाद से अशोक राजभर की महत्वकाँक्षाएं बढ़ी हैं.
दूसरी तरफ़ निषाद पार्टी है, जो बीजेपी के साथ गठबंधन में है. वो 16 सीटों पर चुनाव लड़ रही है, जिनमें से 5 सीटों पर अगले दो चरण में चुनाव होने बाक़ी हैं.
इसके अलावा बीजेपी से बग़ावत कर समाजवादी पार्टी में शामिल हुए स्वामी प्रसाद मौर्य जैसे नेताओं में से कुछ की किस्मत का फ़ैसला भी इन्हीं आख़िरी चरणों में होगा.
इस चुनाव में समाजवादी पार्टी ने बड़ी पार्टियों के बजाए छोटी पार्टी के साथ गठबंधन की रणनीति अपनाई थी. इस लिहाज से भी
असद कमाल लारी की 'लिटमस टेस्ट' वाली बात को वजन मिलता है.
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पूर्वांचल के शहरी और ग्रामीण इलाकों के मुद्दे अलग
वो साथ ही ये भी कहते हैं कि पूर्वांचल में दोनों मुख्य पार्टियों की चुनौतियों को समझने के लिए ग्रामीण और शहरी इलाकों को अलग अलग समझने की ज़रूरत है. पूर्वांचल में जहाँ अंतिम दो चरण में चुनाव होना है वहाँ, ज़्यादातर इलाका ग्रामीण है. शहरी इलाकों में वाराणसी और गोरखपुर अहम हैं.
ग्रामीण इलाकों में भाजपा की चुनौतियों के बारे में वो कहते हैं, " यहाँ आवारा पशुओं का मुद्दा है जो छोटी जोत के किसानों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है, इस इलाके में पश्चिमी इलाके की तुलना में ग़रीबी ज़्यादा है और इस वजह से बेरोज़गारी का मुद्दा है, राज्य कर्मचारियों के लिए पुरानी पेंशन स्कीम का ना होना भी सरकार से नाराज़गी का सबब है. जातिगत जनगणना को भी समाजवादी पार्टी भुनाने की कोशिश में जुटी है.
वहीं पूर्वांचल के शहरी सीटों के समीकरण पर वो कहते हैं कि चूंकि दोनों इलाके भाजपा के दिग़्ग़ज नेताओं के हैं, तो वहाँ विकास का काम हुआ है. एक्सप्रेस वे का बनना, गैस पाइपलाइन, अस्पताल, काशी कॉरिडोर ये सब भाजपा के लिए वोट लाने का काम कर सकते हैं.
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पूर्वांचल का 'मंडल' गणित क्या कहता है?
वरिष्ठ पत्रकार योगेश मिश्रा पूर्वांचल के गणित को योगी गढ़, मोदी गढ़ और सपा के गढ़ के हिसाब से समझाते हैं.
वो कहते हैं, अगर यहाँ के चुनाव को मंडलों में बांटे तो पाँच मंडल हैं.
योगी गढ़ में वो गोरखपुर मंडल और बस्ती मंडल को गिनते हैं, जहाँ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का प्रभाव है. वाराणसी और मिर्जापुर मंडल जिसे वो मोदी गढ़ का नाम देते हैं. और आज़मगढ़ जहाँ समाजवादी पार्टी मज़बूत है.
असद कमाल लारी की ही तरह वो भी कहते हैं कि योगी गढ़ ( गोरखपुर मंडल और बस्ती मंडल) की समस्या गन्ना और धान के किसानों की है. साथ ही यहाँ टिकट बंटवारे की वजह से भी कई सीटों पर मुकाबला कांटे का हो गया है. सालों बाद इस इलाके में सवर्णों के वोट का बंटवारा होता दिख रहा है. ब्राह्मणों और ठाकुरों में जबरदस्त लड़ाई देखने को मिल रही है.
योगेश मिश्रा, मोदी गढ़ में वाराणसी और मिर्ज़ापुर मंडल को शामिल करते हैं. इस इलाके के लिए वो कहते हैं, योगी सरकार के विकास कार्यों के बावजूद पीएम को यहाँ अंत समय में कैंप करने की ज़रूरत पड़ रही है. इसका फ़ायदा भाजपा को ज़रूर मिलेगा.
लेकिन आज़मगढ़, मऊ, गाज़ीपुर, बलिया सीटों पर राजभर बहुत हैं. वहाँ समाजवादी पार्टी को ओम प्रकाश राजभर की पार्टी के साथ होने का फ़ायदा ज़रूर मिल सकता है.
योगेश मिश्रा आगे कहते हैं कि ओबीसी वोटरों का एक बड़ा तबका जिसका वोट 2017 में भाजपा को मिला था, वो टूट सकता है, सवर्णों में भी अगर टूट होगी तो समाजवादी पार्टी को फ़ायदा होगा. बीजेपी के ख़िलाफ़ सत्ता विरोधी लहर भी समाजवादी पार्टी के हित में काम करेगी.
भाजपा के फ़ायदे में योगेश मिश्रा दो योजनाओं के लाभार्थियों की बात कहते हैं.
उनके मुताबिक़ भाजपा के लिए सत्ता विरोधी लहर की काट है ग़रीब कल्याण योजना में जनता को मिला 'मुफ़्त राशन' और 'किसान सम्मान निधि' में खेती करने वालों को मिला पैसा. अगर ये दोनों योजनाएँ और उनके लाभार्थियों की संख्या इतनी नहीं होती तो मामला कांटे का नहीं होता. ऐसा इसलिए भी क्योंकि पूर्वांचल में यूपी के दूसरे इलाकों की तुलना में ग़रीब ज़्यादा हैं.
नीति आयोग की एक ताज़ा रिपोर्ट के मुताबिक़ उत्तर प्रदेश, भारत का तीसरा सबसे ग़रीब राज्य है.
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पिछले तीन चुनाव में पूर्वांचल पर कब किसका दबदबा रहा
पूर्वांचल की कोई सीमा आधिकारिक तौर पर काग़ज़ों में निर्धारित नहीं की गई है.
माना जाता है कि पूर्वांचल में उत्तर प्रदेश विधानसभा की क़रीब 160 सीटें हैं.
2007 के विधानसभा चुनाव में इस इलाक़े में बीएसपी ने सबसे ज़्यादा सीटें जीतीं और सरकार बनाई.
2012 में समाजवादी पार्टी ने इनमें से तकरीबन सौ से ज़्यादा सीटें जीतीं और अखिलेश सत्ता में आए.
2017 में इस इलाक़े में बीजेपी को लगभग 115 सीटें मिलीं और योगी आदित्यनाथ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने.
इन आँकड़ों से साफ़ हो जाता है कि उत्तर प्रदेश में पूर्वांचल को जिस पार्टी ने साध लिया, सत्ता की चाबी उन्हीं के हाथ लगी.
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