क्या 15 विपक्षी दल एक सिंबल पर लड़ेंगे चुनाव ? अगर नहीं तो 2024 में मोदी को हराना मुश्किल
क्या पटना महासम्मेलन के बाद विपक्ष उस स्थिति में पहुंच सकता है कि वह 2024 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को सत्ता से बेदखल कर दे ? लोकसभा चुनाव में अभी तक विपक्ष पीएम मोदी के खिलाफ एकजुट नहीं हो पाया है। 2014 में भी और 2019 में भी। अगर 2024 में विपक्षी एकजुटता संभव होती है तो एक नया राजनीतिक परिदृश्य होगा। लेकिन सवाल ये है कि इस एकजुटता का स्वरूप क्या होगा ? इस मामले में दो उदाहरण सामने हैं। इन दो विपक्षी एकता के नतीजों से समझा जा सकता है 2024 में क्या तस्वीर हो सकती है।
1977 में चार दल लड़े थे हलधर किसान छाप पर
1977 में इंदिरा गांधी की सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए चार विपक्षी दलों ने विलय कर एक नये सिंबल (हलधर किसान) पर चुनाव लड़ा था। एक नयी पार्टी बनी थी जिसका नाम था जनता पार्टी। जनता पार्टी को चुनाव में बहुमत मिला और इंदिरा गांधी की सरकार का पतन हो गया। 1989 में राजीव गांधी सरकार के खिलाफ विपक्ष की एकजुटता आधी-अधूरी थी। जनता दल ने अलग चुनाव लड़ा था। इसके अलवा सीपीआइ और सपीपीएम अलग थीं। दक्षिण भारत में तेलगू देशम पार्टी, द्रमुक और अन्ना द्रमुक ने अलग अलग चुनाव लड़ा था। कांग्रेस को 197, जनता दल 143 और भाजपा को 85 सीटें मिलीं थीं। बहुमत किसी को नहीं मिला। यानी अधूरे गठबंधन के कारण विपक्ष को बहुमत नहीं मिला। जनता दल को भाजपा और अन्य दलों के सहयोग से सरकार बनानी पड़ी।

क्या 15 विपक्षी दल एक सिंबल पर चुनाव लड़ेंगे ?
2024 की विपक्षी एकता कैसी होगी ? क्या 15 दल अपनी पहचान छोड़ कर एक नये सिंबल पर चुनाव लड़ने के लिए राजी होंगे ? या ये 15 दल अलग अलग चुनाव लड़ेंगे ? एक सिंबल पर चुनाव लड़ने से घटक दलों के बीच तालमेल और अपनापन पैदा होता है। 1977 में यह साहसिक प्रयोग इससलिए सफल रहा था क्योंकि उस समय जयप्रकाश नारायण के रूप में एक करिश्माई नेता मौजूद थे। उनका नेतृत्व इसलिए असरदार था क्योंकि उन्हें सत्ता और पद से कोई मोह नहीं था। उन्होंने अपनी इच्छाओं का त्याग कर जनता की भलाई के लिए जनता पार्टी बनवायी थी। जनसंघ, भारतीय लोकदल, संगठन कांग्रेस और सोशलिस्ट पार्टी ने विलय कर जनता पार्टी बनायी थी और हलधर किसान छाप के सिंबल पर चुनाव लड़ा था। इन सभी दलों की अलग पहचान थी और इनका चुनाव चिह्न भी अलग अलग था। लेकिन जयप्रकाश नारायण की प्रेरणा से ये दल अपनी पहचान छोड़ कर एक सिंबल पर लड़े और पूर्ण बहुमत को प्राप्त किया। लेकिन 2023 में क्या विपक्षी दलों से ये त्याग संभव है ? अब न तो जेपी जैसा कोई प्रेरणादायी नेता है और न वैसी परिस्थितियां।
कैसे तय होगा 'एक के खिलाफ एक’ ?
2023 में विपक्षी एकता कायम करने और 2024 में मोदी सरकार को हराने के लिए एक फारमूला लाया गया है- एक के खिलाफ एक। यानी भाजपा के उम्मीदवार के खिलाफ विपक्ष का कोई एक उम्मीदवार उतारा जाएगा। भाजपा विरोधी मतों में बंटवारा रोकने के लिए ऐसा करना जरूरी है। लेकिन क्या यह संभव है ? किसी सीट पर कौन दल मजबूत है, इसका निर्धारण कैसे होगा ? 1977 में तो जयप्रकाश नारायण ने ये गुत्थी सुलझा ली थी लेकिन 2024 में ऐसा कोई व्यक्ति दिखायी नहीं पड़ रहा। जब विपक्षी दल एक सर्वमान्य नेता के नाम पर सहमत नहीं हैं तो फिर वे एक-एक सीट पर समझौता के लिए कैसे राजी होंगे।
मायावती के बाहर रहने से भाजपा को फायदा
सबसे बड़ी बात ये कि मायावती को एकता की मुहिम में शामिल नहीं किया गया है। उत्तर प्रदेश में सबसे अधिक 80 लोकसभा सीटें हैं। अगर वहां मायावती चुनाव लडेंगी तो जाहिर है भाजपा विरोधी वोट ही काटेंगी। अगर सबसे अधिक लोकसभा सीटों वाले उत्तर प्रदेश में ही विपक्षी एकता सफल नहीं होगी तो फिर इसका फायदा क्या ? जाहिर भाजपा को ही इससे फायदा मिलेगा। इतना ही नहीं मायावती की बहुजन समाज पार्टी मध्यप्रदेश और राजस्थान में भी असर रखती है। 2018 के विधानसभा चुनाव में वह साबित कर चुकी है। यानी बसपा उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान में अकेले चुनाव लड़ कर अगर विपक्ष का वोट काटती है तो यह भाजपा के हक में जाएगा।
चुनाव कोई अंकगणित नहीं
कभी कभी मत प्रतिशत के आंकड़ों से जीत का फारमूला निकालने की कोशिश होती है। लेकिन चुनाव कोई अंकगणित का सवाल नहीं कि इतनी आसानी से हल कर लिया जाय। अभी विपक्षी दल कह रहे हैं कि 2019 के चुनाव में भाजपा को सिर्फ 37.36 फीसदी वोट मिले थे और वह सत्ता में आ गयी थी। उनके मुताबिक, करीब 62 फीसदी वोट भाजपा के खिलाफ हैं। लेकिन विपक्षी दलों के अलग अलग लड़ने के कारण ये मत बिखरे हुए हैं। अगर विपक्ष एकजुट हो जाए तो उसका मत प्रतिशत भाजपा से अधिक हो जाएगा और मोदी सरकार सत्ता से बाहर हो जाएगी। लेकिन चुनाव आंकड़ों का खेल नहीं। जैसे 1984 का लोकसभा चुनाव कांग्रेस के लिए रिकॉर्डतोड़ कामयाबी लेकर आया था। उसे 516 में 404 सीटें मिली थीं। पंडित जवाहर लाल नेहरू के जमाने में भी कांग्रेस को इतनी सीटी नहीं मिलीं थी। 1984 में कांग्रेस को 49.10 फीसदी वोट मिले थे। यानी कांग्रेस की आंधी में भी उसे 50 फीसदी वोट नहीं मिले थे। अगर ये कहा जाय कि उस समय कांग्रेस के विरोध में 50 फीसदी से अधिक वोट थे और विपक्ष एकजुट रहता तो उसे हराया जा सकता था, क्या ऐसा कहना सही होगा ? पटना सम्मेलन को हुए अभी हफ्ता भी नहीं गुजरा है कि अरविंद केजरीवाल और ममता बनर्जी कांग्रेस पर निशाना साधने लगे हैं। विपक्षी दलों की इसी गैरईमानदारी के कारण भाजपा की राह आसान होती रही है।












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