कुलवंत कौर: वो बहादुर मां, जिसने राम रहीम को अंजाम तक पहुंचाकर ही दम लिया
नई दिल्ली। बलात्कारी बाबा राम रहीम आज जेल की सलाखों के पीछे पहुंच चुका है। उसे जेल में पहुंचाने में जहां दो साध्वियों और पत्रकार रामचन्द्र ने अहम रोल निभाया, वहीं रामचंद्र की पत्नी कुलवंत कौर का योगदान भी भुलाया नहीं जा सकता है। कुलवंत कौर ही वह महिला हैं, जिन्होंने इंसाफ की इस लड़ाई में अपने बेटे अंशुल छत्रपति को कभी कमजोर नहीं पड़ने दिया। जहां भी अंशुल के पैर लड़खड़ाए, वहां पर उनकी मां कुलवंत कौर ने उनका साथ दिया और इंसाफ की लड़ाई में आगे बढ़ते रहने के लिए प्रोत्साहित किया।

घर के बाहर माली थी रामचन्द्र को गोली
रामचन्द्र के 36 वर्षीय बेटे अंशुल छत्रपति ने बताया कि जब उनके पिता को साध्वी का पत्र मिला था तो उन्होंने उस पत्र को अपने अखबार में छापने का निर्णय लिया था। 24 सितंबर 2002 को पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए जांच के आदेश दिए। अंशुल ने बताया कि 24 अक्टूबर को घर के बाहर उन्हें दो लोगों ने आवाज देकर बुलाया और गोली मार दी। आपको बता दें कि रामचन्द्र पहले वकील थे, जिन्होंने 2000 में अपना अखबार 'पूरा सच' निकालना शुरू किया।

28 दिन तक दर्ज नहीं किया बयान
अंशुल ने बताया कि रामचन्द्र गोली लगने के बाद करीब 28 दिनों तक अस्पताल में जिंदगी और मौत से लड़ते रहे, लेकिन पुलिस ने मजिस्ट्रेट के सामने उनका बयान तक दर्ज नहीं कराया। इतना ही नहीं, उन्होंने राम रहीम का नाम भी लिया था, लेकिन उसका नाम एफआईआर में पुलिस ने शामिल नहीं किया। उन्होंने यह भी बताया कि उनके पिता को बार-बार जान से मारने की धमकियां मिल रही थीं, जिसकी शिकायत तत्कालीन एसएसपी से की गई, लेकिन कुछ नहीं हुआ। यहां तक कि जिस पिस्टल से हमला हुआ था, वह भी राम रहीन के लाइसेंस की बिनाह पर ली गई थी।

जज को किया सलाम
अंशुल ने कहा कि वह उस जज को सलाम करते हैं, जिसने ऐसा फैसला दिया है। आपको बता दें सीबीआई कोर्ट के जज जगदीप सिंह ने राम रहीम पर ये कड़ा फैसला सुनाया है। इस फैसले से यह संदेश जाता है कि हमारी न्यायिक प्रणाली इतनी कमजोर नहीं है कि ऐसे पाखंडी बाबाओं पर नकेल न कस सके। यहां आपको बता दें कि पत्रकार रामचन्द्र की हत्या का केस भी इसी कोर्ट में चल रहा है, जिसका फैसला 16 सितंबर 2017 को आना है।












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