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New Labour Code: नए लेबर कोड को लेकर मजदूर संगठन क्यों कर रहे हैं विरोध, इस पर संविधान क्या कहता है

New Labour Code: भारत सरकार ने हाल ही में देशभर के लगभग 40 करोड़ कर्मचारियों के लिए लेबर कानूनों में बड़ा बदलाव किया है। पहले मजदूरों और कर्मचारियों से जुड़े 29 अलग-अलग कानून थे, जिन्हें अब मिलाकर केवल चार लेबर कोड बना दिए गए हैं।

सरकार कहती है कि इन कोड के लागू होने से कर्मचारियों को कई तरह की राहत मिलेंगी लेकिन इन दावों के बावजूद नए लेबर कोड का देशभर में विरोध हो रहा है। मजदूर संगठनों का कहना है कि यह बदलाव कर्मचारियों के बजाय कंपनियों और मालिकों को फायदा पहुँचाएगा।

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नया लेबर कोड क्यों हो रहा विवाद?

बीबीसी की रिपोर्ट बताती है कि कई बड़े मजदूर संगठन-जैसे इंटक, एटक और सीआईटीयू-नए लेबर कोड का भारी विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि इन नियमों की वजह से कर्मचारियों की नौकरी की सुरक्षा कमजोर हो जाएगी और मालिकों को मनमानी करने का ज्यादा अधिकार मिल जाएगा।

संगठनों का सबसे बड़ा आरोप 'फिक्स्ड टर्म जॉब' मॉडल पर है। उनके मुताबिक कर्मचारी को स्थायी नौकरी का कोई भरोसा नहीं होगा। इससे नौकरी की अनिश्चितता बढ़ेगी और मजदूर हर समय असुरक्षा में रहेंगे।

मजदूरों को सबसे ज्यादा डर हड़ताल से जुड़े नियमों में बदलाव से है। अब अगर कोई संगठन हड़ताल के नियमों का उल्लंघन करता है तो उसे अवैध माना जाएगा। यूनियन की मान्यता भी रद्द हो सकती है।

इतना ही नहीं, हड़ताल करने वाले कर्मचारियों को जेल या भारी जुर्माने का सामना भी करना पड़ सकता है। पहले जरूरी सेवाओं से जुड़े मजदूरों के लिए हड़ताल से पहले 14 दिन का नोटिस देना होता था, लेकिन अब 60 दिन पहले नोटिस देना अनिवार्य कर दिया गया है। मजदूर संगठन कहते हैं कि हड़ताल मजदूरों का सबसे बड़ा हथियार होता है और अगर इसे कमजोर कर दिया जाएगा तो मालिकों की मनमानी और बढ़ जाएगी।

क्या कहता है संविधान ?

भारतीय संविधान की सातवीं अनुसूची में मजदूरों, रोजगार, ट्रेड यूनियनों और श्रमिक कल्याण जैसे विषय समवर्ती सूची (Concurrent List) में आते हैं। इसका मतलब यह है कि इन पर कानून बनाने का अधिकार केंद्र और राज्य दोनों के पास है। नए लेबर कोड पूरे देश पर लागू होंगे, लेकिन राज्यों को भी अपने-अपने नियम बनाने होंगे। इसलिए इन नए कानूनों को लागू करने में राज्यों की भूमिका बहुत बड़ी होगी।

भारत में कुल 50 करोड़ से ज्यादा कामगार हैं, जिनमें से लगभग 90 फीसदी असंगठित क्षेत्र से जुड़े हैं। नए कोड इन सभी पर लागू होते हैं। मजदूर संगठनों का कहना है कि इस सुधार से मजदूरों के मौलिक अधिकार कमजोर हो जाएंगे, खासकर असंगठित क्षेत्र के कर्मचारियों के लिए यह बदलाव अधिक नुकसानदेह साबित हो सकता है।

पुराने 44 कानून बनाम नए चार कोड

भारत में मजदूरों ने लंबे संघर्ष के बाद कुल 44 कानून बनवाए थे। इन कानूनों ने कर्मचारियों को कई अधिकार दिए थे-जैसे निर्धारित काम के घंटे, यूनियन बनाने का अधिकार, सामूहिक बातचीत (Collective Bargaining) और कामगारों की सुरक्षा के नियम जैसे प्रावधान शामिल थे।

लेकिन नए कोड लागू होने के बाद मजदूर संगठनों का आरोप है कि 15 पुराने कानून खत्म कर दिए गए और जो बचे उन्हें मिलाकर ऐसा कानून बनाया गया है जो मजदूरों की जगह मालिकों के हित में ज्यादा दिखता है। नए प्रावधान मालिकों के हित में रखे गए उनके मुताबिक नए नियमों से मजदूरों के अधिकारों में कटौती दिखाई देती है।

बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार, पहले किसी भी फैक्टरी में अगर 100 से ज्यादा कर्मचारी काम करते थे और मालिक उसे बंद करना चाहता था तो उसे सरकार से मंजूरी लेनी पड़ती थी। नए कोड में यह संख्या बढ़ाकर 300 कर दी गई है। यानी अगर किसी फैक्टरी में 300 से कम लोग काम करते हैं तो मालिक बिना किसी सरकारी मंजूरी के उसे बंद कर सकता है।

इसके बारे में विशेषज्ञ कहते हैं कि आज मशीनों की वजह से फैक्टरियों में कर्मचारियों की संख्या पहले से ही कम हो गई है। ऐसे में बड़े शहरों में जहां जमीन की कीमत बहुत ज्यादा है, वहां मालिक फैक्टरी बंद करके जमीन बेचकर भारी मुनाफा कमा सकते हैं। मजदूर संगठनों को डर है कि 'ईज़ ऑफ डूइंग बिजनेस' के नाम पर मजदूरों की सुरक्षा कमजोर की जा रही है।

कांग्रेस ने क्या लगाए आरोप

कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने नए लेबर कोड को मजदूर-विरोधी बताया है। उन्होंने कहा है कि यह सुधार मजदूरों की मूल मांगों को नजरअंदाज करता है। उन्होंने पूछा कि क्या सरकार मनरेगा में न्यूनतम मजदूरी बढ़ाएगी, क्या मजदूरों को 'राइट टू हेल्थ' दिया जाएगा, क्या रोजगार की गारंटी दी जाएगी और क्या असंगठित क्षेत्र के मजदूरों को सामाजिक सुरक्षा मिलेगी?

उनका कहना है कि सरकार को कर्नाटक और राजस्थान की तरह गिग वर्करों के लिए नए कानून बनाने चाहिए, जिन राज्यों ने मजदूरों के हितों की रक्षा के लिए बेहतर कदम उठाए हैं। कांग्रेस का कहना है कि सरकार को कर्नाटक और राजस्थान की तरह गिग वर्करों के लिए पक्के कानून बनाने चाहिए, जहाँ मजदूर अधिकारों को मजबूत किया गया है।

मजदूरों और सरकार का टकराव जारी रहेगा

नया लेबर कोड एक बड़ा बदलाव है, जिसे सरकार सुधार बता रही है। सरकार का कहना है कि इससे उद्योग बढ़ेगा, रोजगार आएगा और कर्मचारियों को भी नई सुविधाएँ मिलेंगी। लेकिन मजदूर संगठन इसे मालिकों के हित में उठाया गया कदम मानते हैं। उन्हें लगता है कि इससे नौकरी की सुरक्षा खत्म होगी, यूनियन कमजोर होंगी और मजदूरों की आवाज़ दब जाएगी। इतना तय है कि नया लेबर कोड भारत के मजदूरों, फैक्टरियों और रोजगार व्यवस्था पर बड़ा असर डालने वाला है।

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