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कौड़ी के भाव प्याज होने पर हंगामा क्यों नहीं होता

प्याज़ का बाज़ार
EPA
प्याज़ का बाज़ार

सितंबर के महीने में भारतीय बाज़ार में औसतन छह लाख मिट्रिक टन प्याज़ उतरता है. लेकिन इस साल 22 सितंबर तक भारतीय बाज़ारों में महज 3.1 लाख मिट्रिक टन ही प्याज पहुंचा है.

आपूर्ति की तुलना में मांग ज़्यादा होने के चलते प्याज की क़ीमतें बढ़ रही हैं. महानगरों में प्याज की क़ीमतें पेट्रोल की क़ीमत से होड़ लेने लगी थीं.

लेकिन बीते गुरुवार को यानी 26 सितंबर को कृषि उत्पादों की बाज़ार समिति में प्रति क्विंटल प्याज की क़ीमत एक हज़ार रुपए कम हुई है.

इस पर किसानों ने अपनी निराशा ज़ाहिर की है और आरोप लगाया है कि सरकार प्याज की क़ीमत को कम करने के लिए दख़ल दे रही है. मराहाष्ट्र के किसानों के समूह 'स्वाभिमानी संगठन' के गणेश घोटेकर दावा करते हैं कि प्याज खाने वालों को लुभाने के नाम पर राजनीति हो रही है.

प्रति क्विंटल हज़ार रुपये की गिरावट

नासिक के नज़दीक लासालगाँव कृषि उत्पादन बाज़ार समिति को एशिया में प्याज की सबसे बड़ी मंडी माना जाता है. हमें इस बाज़ार समिति में ऐसे किसान मिले जो सरकार के फ़ैसले से निराश थे.

मीडिया में लगातार प्याज़ की बढ़ती क़ीमत से जुड़ी ख़बरें आ रही हैं, इसके चलते ही सरकार ने प्याज़ की क़ीमतों को कम करने का फ़ैसला लिया है. लेकिन इन किसानों का कहना है कि मीडिया में उनकी मुश्किलों के बारे में भी बताना चाहिए.

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तीन दिन पहले प्रति क्विंटल प्याज़ की कीमत 4,400 रुपए थी जो अब गिरकर 3,300 रुपए रह गई है.

थाडी सारोला गाँव (निफाड) के एक किसान ने बताया, "पिछले हफ़्ते प्याज की क़ीमत 3500 रुपए क्विंटल थी, जो अब घटकर 2500-2600 रुपए रह गई है. कुछ लोगों का कहना है कि मिस्र से प्याज़ मंगाया जा रहा है. मेरे जैसे किसान अपने प्याज को स्टोर कर रहे हैं."

"ये लगातार चौथा महीना है जब प्याज की आधी फसल भारी बरसात के ख़राब हुई है और अब सरकार ने बाज़ार में क़ीमत कम कर दी हैं. इसका दोष किसको दें?"

"सरकार के क़र्ज़ माफ़ी की घोषणा के बाद अब कोई हमें क़र्ज़ देने को तैयार नहीं है. हमें प्याज से अच्छी आमदनी की उम्मीद थी, लेकिन यह भी निराशा में बदल गई है."

प्याज़ का बाज़ार
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निफाड से ही आने वाले एक दूसरे किसान विकास डारेकर ने बताया, "एक किलो प्याज़ के उत्पादन की लागत 15 रुपया है. हम इसे स्टोर करते हैं तो इसके वजन में कमी आती है. ऐसे में अगर औसत क़ीमत 40-45 रुपए भी हो जाए तो भी किसान 200-300 रुपए प्रति क्विंटल ही कमा पाएगा. यह कोई बड़ा मुनाफ़ा तो नहीं है."

वो बताते हैं, "जब प्याज की क़ीमत बढ़ती है तब तो सरकार तेजी से सक्रिय होती है लेकिन जब किसान अपने प्याज़ को 200 प्रति क्विंटल भेजने को मजबूर होते हैं तब सरकार तत्परता क्यों नहीं दिखाती? उस वक़्त किसानों को सरकारी अनुदान मिलना चाहिए और सरकार को चाहिए कि वह कम से कम 1500 रुपए प्रति क्विटंल के भाव से ख़रीदारी करे."

हमने लासालगाँव के प्याज़ कारोबारी मनोज जैन से भी बातचीत की. उन्होंने बताया, "मान लीजिए कि कहीं नौ क्विंटल प्याज़ की बिक्री 5000 रुपए की दर से हुई, तो इसे मुद्दा नहीं बनाया जाना चाहिए. मौलिक दर तो 4000 रुपए प्रति क्विंटल ही है. मध्य प्रदेश सरकार ने जून में न्यूनतम सहायता मूल्य की दर से ख़रीदारी की. उस राज्य में प्याज़ की बिक्री जून में हुई, तो इसके बाद जून, जुलाई, अगस्त में होने वाली प्याज़ की आपूर्ति प्रभावित होगी."

वो बताते हैं, "बारिश के चलते भी लाल प्याज़ बाज़ार में देरी से पहुंच रहा है. किसी और दिन 4200 रुपए प्रति क्विंटल की दर से ख़रीदा गया प्याज़ आज बाज़ार में 3300-3400 रुपए प्रति क्विंटल की दर से बेचा जा रहा है, ऐसे में तो हमें नुक़सान ही होगा. बाज़ार की अस्थिरता से भी किसान और कारोबारी प्रभावित होते हैं. अगर बाहर से भी मंगाया जा रहा है तो भी लोग महाराष्ट्र और नासिक के प्याज़ को उसके स्वाद के चलते 10 रुपये प्रति किलो महंगा ख़रीदने को तैयार हो जाएंगे. इसका जीआई रेटिंग भी बेहतर है."

बारिश के कारण भी पड़ा बाज़ार पर असर

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नेशनल एग्रीकल्चर कोऑपरेटिव मार्केटिंग फेडरेशन ऑफ इंडिया (एनएएफईडी) के निदेशक नाना साहेब पाटिल बताते हैं, "प्याज का उत्पादन बहुत अच्छा रहा है, लेकिन बारिश के चलते प्याज की आपूर्ति कम हुई है. ये कमी प्रकृतिक कारणों के चलते हो रही है."

पाटिल के मुताबिक़, "आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश और कर्नाटक में भारी बरसात के चलते प्याज़ की फसल प्रभावित हुई है. बरसात के बाद मौसम में नमी के चलते स्टोर किया गया प्याज भी ख़राब हो रहा है. आम तौर पर स्टोर किए प्याज में से 15 प्रतिशत प्याज ख़राब हो जाता है लेकिन इस बार यह आँकड़ा बढ़कर 35 प्रतिशत तक पहुंच गया है."

"देश के दक्षिणी हिस्से से सितंबर-अक्टूबर में आने वाला प्याज़ भी एक महीने की देरी से पहुँच रहा है. महाराष्ट्र के सोलापुर और मावल जैसे क्षेत्रों में भी प्याज की फसल बारिश के चलते प्रभावित हुई है. यह सारा प्याज बाज़ार में एक महीने की देरी से नवंबर के पहले सप्ताह में पहुंचेगा."

पाटिल यह भी कहते हैं, "इन सभी बातों ने सितंबर में प्याज की आपूर्ति को प्रभावित किया है. एक तरफ़ मांग ज़्यादा थी तो दूसरी तरफ़ आपूर्ति कम थी. मेरे ख्याल से यही स्थिति अगले एक महीने तक भी रहेगी. प्याज़ की पैदावार 26 राज्यों में होती है लेकिन आज की तारीख़ में इसे केवल महाराष्ट्र से जोड़कर देखा जा रहा है."

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बीबीसी ने नासिक में मौजूद एनएचआरडीएफ यानी (नेशनल हॉरिटकल्चरल रिसर्च एंड डिवलपमेंट फाउंडेशन) संपर्क किया. यह संस्था प्याज की फसल, उससे संबंधित नई रिसर्च और उसके बाज़ार पर नजर रखती है. लेकिन इसके अधिकारी बात करने के लिए तैयार नहीं है.

एनएचआरडीएफ के पास मौजूद आंकड़ों के मुताबिक़ बीते पाँच साल से पूरे भारत में सितंबर महीने में औसतन छह लाख मिट्रिक टन प्याज़ की आपूर्ति होती है. लेकिन इस साल, 22 सितंबर तक, भारतीय बाज़ारों में महज 3.1 लाख मीट्रिक टन प्याज ही पहुंचा है.

अगर इसी अनुपात में देखें तो सितंबर के अंत तक औसत की तुलना में प्याज़ की आपूर्ति 50-60 प्रतिशत ही रही होगी. स्पष्ट है कि प्याज की कमी है.

ठीक यही स्थिति 2015 में भी सामने आई थी. उस वक्त 3.8 लाख मीट्रिक टन प्याज़ की आपूर्ति हुई थी और प्याज़ की कीमत अधिकतम 4400 रुपए प्रति क्विंटल तक पहुंचा था.

पिछले चार सालों में प्याज़ की कीमत संबंधित आंकड़े-

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बीते दस सालों में सरकार ने इस मुद्दे पर कभी ध्यान नहीं दिया है.

लासालगाँव बाज़ार समिति के पूर्व निदेशक और अध्यक्ष जयदत्त होल्कर ने बताया, "सरकार को वास्तविकता दर्शाने वाले आँकड़े पेश करने चाहिए, जैसे कि कितने प्याज़ का उत्पादन हुआ, देश में प्याज की कितनी ज़रूरत है, कितना प्याज निर्यात करने की ज़रूरत है, लेकिन पिछले साल के आँकड़ों में फेरबदल करके नए आँकड़े जारी कर दिए जाते हैं."

जयदत्त होल्कर के मुताबिक़, "किसी को वास्तविकता के बारे में जानकारी नहीं है ना ही उन्हें कमी की वजहों के बारे में पता है. उन्हें किसानों को प्रोत्साहित करना चाहिए और उनके लिए उच्च सुविधाओं वाले गोदाम बनाने की ज़रूरत है."

"सक्षम अधिकारियों को वास्तविकता दर्शाने वाले आंकड़े जमा करने के काम पर लगाना चाहिए. इसके लिए सर्वेक्षण भी कराया जाना चाहिए. तब जाकर हमारे पास इन सवालों के जवाब मिलेंगे."

"कुछ समय पहले, मुख्यमंत्री ने आकर कोल्ड स्टोरेज के निर्माण का उद्घाटन किया था, लेकिन उसके बाद कुछ नहीं हुआ. यह प्रोजेक्ट रेल विभाग की ज़मीन पर तैयार करना चाहिए ताकि कमी होने पर प्याज़ को तत्काल कहीं भी भेजना संभव हो."

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