दुर्गा की मूर्तियों के लिए तवायफ़ों के आंगन की मिट्टी क्यों ली जाती है?

तवायफ, दूर्गा पूजा
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तवायफ, दूर्गा पूजा

जब भी दुर्गा पूजा नज़दीक आती है, 1947 के दौर से पहले दिल्ली के चावड़ी बाज़ार में लोगों के दिलों पर राज करने वाली शन्नो बाई की यादें ताज़ा हो जाती हैं.

यह साल 1970 में उस दौर की बात है जब शन्नो बाई 68 साल की थीं. जवानी की परछाई उनसे उतर रही थी और वो वृद्धावस्था में प्रवेश कर चुकी थीं.

एक दौर था जब अमीर और बाहुबली उनका मुजरा सुनने आते थे और रात की महफिल में चुनिंदा मेहमानों को ही जगह मिल पाती थी.

शन्नो उस समय हैरान रह गईं जब मूर्तियां बनाने वाला एक कुम्हार उनके कोठे में आया और पूछा कि क्या वह उनके आंगन से थोड़ी मिट्टी ले सकता है. बेहद दुबले से उस बुज़ुर्ग से शन्नो बोलीं, "किसलिए चाहिए?" उसने जवाब दिया, "मां दुर्गा की मूर्ति बनाने के लिए."

"मैं वो महिला हूं जिसे समाज अपवित्र मानता है. तो फिर तुम्हें यहां की मिट्टी क्यों चाहिए? और वैसे भी तुम देख सकते हो कि ये आंगन कच्चा नहीं है. तो फिर मिट्टी कैसे ले जाओगे?"

प्रतिमा बनाने वाला वह शख़्स थोड़ा उलझन में पड़ गया मगर फिर उसका चेहरा अचानक खिल उठा. उसने कुछ गुलदस्तों की ओर इशारा किया और कहा, "मैं इनसे मिट्टी ले सकता हूं. ये भी तो आपके आंगन का ही हिस्सा हैं."

शन्नो बाई मुस्कुराईं और गर्दन हिलाकर उन्होंने सहमति दे दी. जब यह आदमी चला गया तो शन्नो बाई ने एक बड़ी बाई से पूछा कि दुर्गा की मूर्ति बनाने के लिए तवायफ़ के आंगन की मिट्टी क्यों चाहिए होती है.

देवकी बाई ने कहा कि उन्होंने एक कहानी सुनी है कि यह मिट्टी समाज की लालसाएं हैं जो कोठों पर जमा हो जाती हैं. इसे दुर्गा को अर्पित किया जाता है ताकि जिन्होंने ग़लतियां की हैं, उन्हें पापों से मुक्ति मिल जाए.

तवायफ, दूर्गा पूजा
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देवी ने कहा- तवायफों के कोठे से कीचड़ लाओ, तब प्राण प्रतिष्ठा सफल होगी

आगे उन्होंने कहा कि एक बार एक ऋषि ने देवी की प्रतिमा बनवाई और बड़े गर्व से इसे अपने आश्रम के सामने स्थापित कर दिया ताकि लोग आएं और नौ दुर्गा या नवरात्रि में वहां आकर पूजा कर सकें. उसी रात को देवी उस ऋषि के सपने में आई और कहा कि मेरी नजर में घमंड की कोई इज्जत नहीं है. देवी ने बताया कि उन्हें इंसानियत और बलिदान चाहिए और इसके बिना आस्था खोखली है.

फिर ऋषि ने पूछा, "हे देवी, फिर मैं क्या करूं?" तब देवी ने कहा कि शहर में रहने वाली तवायफों के कोठे से कीचड़ लाओ और कुम्हार से कहो कि इसे मिट्टी में मिलाकर मेरी नई प्रतिमा बनाए. तभी मैं उस प्रतिमा को इस लायक मानूंगी कि जब पुजारी इसमें प्राण प्रतिष्ठा करे, मैं उसमें प्रवेश कर सकूं.

"जिन लोगों को समाज में उपेक्षित कर दिया जाता है, जिन्हें बुरा या पापी समझा जाता है, वे अपनी मर्जी से ऐसे नहीं होते बल्कि जो लोग उनका शोषण करते हैं, वे उन्हें ऐसा बनाते हैं. वे भी मेरे आशीष के हक़दार हैं", देवी ने कहा और अंतर्धान हो गईं.

ऋषि ने उठकर वही किया जो देवी ने कहा था. तभी से मूर्ति बनाने वाले (कुम्हारटोली वाले भी) इसी पुरानी परंपरा का पालन करते हैं.

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शन्नो बाई को जब भीख मांगनी पड़ी

शन्नो बाई जब बूढ़ी हो गई थीं तो ग्राहकों ने आना बंद कर दिया था. जीवन के आख़िरी दौर में उन्हें विभाजन के बाद जी.बी. रोड पर बने नए कोठों की सीढ़ियों पर भीख मांगनी पड़ी थी.

उनके एक हाथ में हार रहता और दूसरे हाथ की हथेली भीख के लिए खुली रहती. अगर कोई आदमी उन्हें दस रुपये देता तो वह उसे हार दे देतीं ताकि उस हार को वह आदमी उस लड़की को तोहफ़े में दे सके जिसका मुजरा देखने वह आया है.

1960 में 10 रुपये की कीमत आज के 100 रुपये के बराबर थी. एक बार एक विदेशी पत्रकार लंदन के एक अख़बार के लिए दिल्ली की नाचने वाली लड़कियों पर स्टोरी लिख रहा था.

उसकी मुलाक़ात सीढ़ियों पर बैठी शन्नो बाई से हुई. उनकी कहानी सुनने के बाद उस पत्रकार ने उन्हें 100 रुपये दिए और इसके बाद एक हफ़्ते से ज़्यादा समय तक वह नज़र नहीं आईं.

आज भी जब लोग पूजा वाले दिनों में किसी पंडाल में जाते हैं, शन्नो बाई और उनकी बताई कहानी की उन्हें याद आ जाती है.

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कुछ और कहानियां

एक बिज़नसमैन के कार ड्राइवर बनर्जी एक और कहानी सुनाते हैं. वह बताते हैं कि दुर्गा अष्टमी के दिन एक ग़रीब नाचने वाली लड़की चिड़चिड़ी सी बैठी थी. वह अपनी दुर्दशा पर आंसू बहा रही थी क्योंकि उसके पास कोई ग्राहक नहीं था और ग्राहक नहीं था तो पैसे भी नहीं थे. वे सभी पूजा करने गए हुए थे.

अचानक उसने सामने बिजली सी कौंधी और सामने एक देवी प्रकट हो गई. उसने लड़की से सिर पर हाथ रखा और खुश होने को कहा. इसके बाद से मूर्ति बनाने वाले उसके और उस जैसी अन्य लड़कियों के कोठे पर जाते और आंगन से मिट्टी ले जाते ताकि मूर्ति बना सकें. इसके बाद कभी उस नाचने वाली लड़की को पैसों की कमी नहीं हुई.

कुछ और कहानियां भी हैं. कुछ में अकबर की राजपूत पत्नियों और राजा मान सिंह का अपनी बुआ और अक़बर की पटरानी मरियम ज़मानी के साथ मिलकर भवानी की पूजा करने का भी जिक्र है.

लेकिन यौन कर्मी दुर्गा माई के पक्की उपासक होती हैं. ऐसी ही एक भूमिका शर्मिला टैगोर ने निभाई है, जिसमें उनके कोठे पर राजेश खन्ना नशे में लड़खड़ाते हुए आते और उन लोगों को पीटते जो उन पर ऐसी महिला के पास जाने का आरोप लगाते.

मगर अफ़सोस, पंडालों में आजकल नई पीढ़ी के कम ही लोग मिलेंगे जो ऐसी कथाओं में दिलचस्पी रखते हों.



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