फिर क्यों शुरू हुआ भारत में रॉयल्टी विवाद

बहुत लोकप्रिय नहीं हो सका हिंदी में साहित्य

मामले की शुरुआत तब हुई जब कुछ दिन पहले लेखक और अभिनेता मानव कौल ने सोशल मीडिया पर विनोद कुमार शुक्ल के साथ अपनी एक तस्वीर पोस्ट की. तस्वीर के साथ उन्होंने इस बात का जिक्र किया कि इतने बड़े लेखक जिनकी दर्जनों किताबें न सिर्फ प्रकाशित हैं बल्कि बेहद लोकप्रिय भी हैं, उन पुस्तकों की रॉयल्टी के तौर पर उन्हें महज कुछ हजार रुपये मिलते हैं.

मानव कौल ने लिखा, "पिछले एक साल में वाणी प्रकाशन से छपी तीन किताबों का इन्हें 6000 रुपये मात्र मिला है और राजकमल से पूरे साल का 8000 रुपये मात्र. मतलब देश का सबसे बड़ा लेखक साल के 14000 रुपये मात्र ही कमा रहा है. वाणी को लिखित में दिया है कि किताब न छापें पर इस पर भी कोई कार्रवाई नहीं हुई."

वाणी प्रकाशन से विनोद कुमार शुक्ल की 'दीवार में एक खिड़की रहती थी', 'कविता की किताब' जैसी मशहूर किताबें और राजकमल से 'नौकर की कमीज', 'सबकुछ होना बचा रहेगा', 'हरी घास की छप्पर वाली झोपड़ी' और 'बौना पहाड़' जैसी पुस्तकें प्रकाशित हैं.

मानव कौल की सोशल मीडिया पर आई पोस्ट के बाद खुद विनोद कुमार शुक्ल ने एक वीडियो जारी करके इस बारे में अपनी पीड़ा अपने पाठकों से साझा की. विनोद कुमार शुक्ल का कहना है कि वो कई बार पत्र के जरिए प्रकाशकों से आग्रह कर चुके हैं कि उनकी पुस्तकें अब न प्रकाशित की जाएं, लेकिन कोई जवाब नहीं मिलता है.

विनोद कुमार शुक्ल का कहना था, "मुझे अब तक मालूम नहीं हुआ था कि मैं ठगा जा रहा हूं. मेरी सबसे ज्यादा किताबें जो लोकप्रिय हैं वे राजकमल और वाणी से प्रकाशित हुई हैं. 'नौकर की कमीज' और 'दीवार में एक खिड़की रहती थी' के समय तो ई-बुक और किंडल जैसी चीजें नहीं थीं, मगर ये दोनों किताबें किंडल पर हैं."

हालांकि इस बारे में जब डीडब्ल्यू ने राजकमल प्रकाशन के प्रबंध निदेशक अशोक माहेश्वरी से बात की तो उन्होंने कहा कि रॉयल्टी का कोई विवाद नहीं है और इसका विवरण हर साल लेखकों को भेजा जाता है. उनका कहना था, "यदि कोई समस्या है भी तो बातचीत के जरिए उसे सुलझाया जा सकता है. मेरी शुक्ल जी के बेटे से इस बारे में बात भी हुई है."

कई अच्छी किताबें होने के बावजूद हिंदी साहित्य पिछड़ा ही रह गया

विनोद कुमार शुक्ल के बेटे शाश्वत गोपाल ने डीडब्ल्यू से बातचीत में कहा कि मानव कौल ने सोशल मीडिया पोस्ट पर रॉयल्टी के बारे में जो बातें लिखी हैं, वो हमने ही बताई हैं. शाश्वत गोपाल हैरानी जताते हुए कहते हैं, "तमाम नए लेखकों को हर साल रॉयल्टी के तौर पर दो-तीन लाख रुपये मिल जाते हैं जबकि पिताजी को इतनी किताबों के लिए महज कुछ हजार रुपये मिलते हैं. किसी को भी बताओ तो एक बार भरोसा ही नहीं करेगा लेकिन यह सही है."

प्रकाशकों की सफाई

विवाद सामने आने के बाद राजकमल प्रकाशन ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी करके भी स्पष्टीकरण दिया था. इसमें कहा गया था, "नौकर की कमीज' का पेपरबैक संस्करण राजकमल से छपा है. पिछले 10 वर्षों में इसके कुल पांच संस्करण प्रकाशित हुए हैं. हर संस्करण 1100 प्रतियों का रहा है जिसका ब्योरा नियमित रूप से रॉयल्टी स्टेटमेंट में जाता रहा है. इसकी ई-बुक भी राजकमल ने किंडल पर जारी की है जिसकी रॉयल्टी विनोद जी को जाती रही है. विनोद जी हमारे लेखक परिवार के बुजुर्ग और प्रतिष्ठित सदस्य हैं. उनकी इच्छा का सम्मान हमारे लिए हमेशा सर्वोपरि है. वे जो चाहते हैं, हम वही करेंगे."

वाणी प्रकाशन ने भी प्रेस विज्ञप्ति जारी करके स्पष्टीकरण देने की कोशिश की है लेकिन यह सवाल काफी अहम हो गया है कि इतने बड़े लेखक जिनकी किताबें न सिर्फ लोकप्रिय हैं और तमाम हिन्दी के पाठकों के घरों में भी रखी मिलती हैं, पुस्तकालयों में तो जाती ही हैं, उन्हें क्या हर साल इन किताबों से सिर्फ इतने ही रुपये मिलते होंगे, जितने कि विनोद कुमार शुक्ल को मिल रहे हैं?

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साहित्य की दुनिया में छुपी धांधलियां

कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रकाशनों के साथ काम कर चुके और अभी भी दिल्ली के एक नामी प्रकाशक के यहां ऊंचे पद पर कार्यरत एक अधिकारी नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं, "कई बार कुछ लोग रॉयल्टी के मोटी धनराशि के चेक सोशल मीडिया पर साझा करते हैं कि उन्हें इतने पैसे प्रकाशक ने दिए हैं जबकि बड़े लेखक अक्सर प्रकाशकों के साथ धोखाधड़ी की शिकायत करते हैं. दरअसल, प्रकाशक हमेशा अपने लाभ के लिए ही काम करता है और जिन लोगों को असाधारण रूप से रॉयल्टी मिलती है, वह सिर्फ किताबों की बिक्री से प्राप्त धनराशि का निश्चित हिस्सा ही नहीं होता बल्कि दोनों के बीच आपसी संबंध और कुछ अन्य व्यापारिक रिश्ते भी होते हैं. यह बहुत बड़ा खेल है."

इस कथित 'खेल' को स्पष्ट करते हुए ये अधिकारी मोटे तौर पर यही कहते हैं कि कई बार कुछ लेखकों के निजी प्रभाव की वजह से प्रकाशक को लाभ होता है जिसका असर उनकी रॉयल्टी की राशि में दिख जाता है. हालांकि उनका यह भी कहना है कि प्रकाशक इन किताबों से करोड़ों कमा रहा है और लेखक को वह कम हिस्सा दे रहा है, ऐसा भी नहीं है.

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पारदर्शिता से परहेज

उनके मुताबिक, "पूरा सिस्टम खराब है. प्रकाशन के क्षेत्र में पारदर्शिता कभी नहीं थी और न ही आज है. लेखक भी वस्तुस्थिति को नहीं समझते हैं, हालांकि कुछ लोग समझते भी हैं. कुछ लेखक तो ऐसे हैं जो प्रकाशकों को प्रलोभन भी देते हैं. दूसरी ओर, सिस्टम की वजह से प्रकाशक को कितना लाभ होता है, वो किन परिस्थितियों में पुस्तकों की बिक्री करता है, लाइब्रेरी में पुस्तकें पहुंचाने के लिए क्या-क्या करना पड़ता है, पैसा वसूलने में कितना पापड़ बेलता है, ये शायद लेखक नहीं समझते हैं."

रॉयल्टी विवाद पर कई और लेखकों ने भी प्रकाशकों की कार्यशैली पर सवाल उठाए हैं. मशहूर लेखक असगर वजाहत सोशल मीडिया पर लिखते हैं, "मैं भी लंबे अरसे से सोच रहा हूं कि विधिवत तरीके से राजकमल प्रकाशन, दिल्ली को अपनी लगभग आठ किताबों के भार से मुक्त कर देना चाहिए. जिन मित्रों ने राजकमल के लिए मेरी किताबों को संपादित किया है उन्हें छोड़ दिया जाना चाहिए."

कैसे कैसे अनुभव

दिल्ली में खुद का प्रकाशन चला रहे गौरीनाथ पहले हंस पत्रिका में काम करते थे. गौरीनाथ लेखक भी हैं और अंतिका प्रकाशन नाम से पिछले कुछ साल से प्रकाशन के क्षेत्र में सक्रिय हैं. कहते हैं कि अनुभव बहुत अच्छा तो नहीं है लेकिन विवशता है कि एक बार शुरू करके बंद कैसे करें. वो कहते हैं, "हिन्दी में प्रकाशकों की संख्या बहुत ही कम है. बड़े प्रकाशक तो सौ के ही भीतर होंगे. लोगों का यह आरोप कि सारे प्रकाशक बहुत अमीर हैं, ऐसा नहीं है. कई लोग तो ऐसे हैं जो प्रकाशन शुरू करने के बाद बंद कर दे रहे हैं. कोरोना काल में तो कई प्रकाशन बंद हो गए. लेकिन ऐसा भी नहीं है कि प्रकाशक बेईमानी नहीं कर रहे हैं. करते हैं, पर ऐसा भी नहीं है कि इसमें सिर्फ लेखकों का ही शोषण हो रहा है. प्रकाशकों को बेईमानी इसलिए करनी पड़ती है क्योंकि सिस्टम की बेईमानी का उन्हें शिकार होना पड़ता है. पुस्तकों की बिक्री का हाल बहुत अच्छा नहीं है, खासकर हिंदी में."

गौरीनाथ यह भी कहते हैं कि यदि लेखक जागरूक रहे तो वो खुद भी अपनी पुस्तकों की बिक्री और रॉयल्टी की स्थिति के बारे जानकारी ले सकता है. गौरीनाथ कहते हैं, "राजा राम मोहन राय लाइब्रेरी फाउंडेशन एक एक्ट के तहत इसीलिए बनवाया गया था ताकि लेखकों का शोषण न हो सके. नेहरू ने निराला का प्रकाशकों से विवाद होने के कारण इसे बनवाया था. सरकारी योजनाओं के तहत खरीद की जाती है, उसका हिसाब रखा जा सकता है. एक्ट के तहत प्रकाशक दोषी पाया जाता है तो तीन साल के लिए उसे प्रतिबंधित किया जा सकता है. लेखक चाहें तो इसके जरिए अपनी रॉयल्टी का स्टेटस चेक कर सकते हैं."

लेखक विनोद कुमार शुक्ल छत्तीसगढ़ के राजनंदगांव के रहने वाले हैं और उन्होंने कई बेहतरीन उपन्यास लिखे हैं. साल 1999 में उन्हें 'दीवार में एक खिड़की रहती थी' के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार दिया गया था. उनके कई उपन्यासों और कहानियों पर फिल्में भी बन चुकी हैं.

Source: DW

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