गावस्कर से कोहली तक, कप्तानों की विदाई पर क्यों खड़ा होता रहा है विवाद

रोहित शर्मा
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इससे पहले कि भारतीय क्रिकेट टीम आगामी दक्षिण अफ़्रीका के दौरे के लिए उड़ान भर पाती बीसीसीआई की चयन समिति का फ़रमान आया कि विराट कोहली को एकदिवसीय क्रिकेट की कप्तानी से हटा दिया गया और टेस्ट क्रिकेट में भी अब अजिंक्य रहाणे की जगह रोहित शर्मा टीम के उप-कप्तान होंगे. यानी अब विराट कोहली केवल टेस्ट क्रिकेट में और रोहित शर्मा एकदिवसीय और टी-20 क्रिकेट में भारत के कप्तान होंगे.

वैसे विराट कोहली ने भारत के लिए 95 एकदिवसीय अंतरराष्ट्रीय मैचों में भारत की कप्तानी की, जिसमें वह 65 में जीते, 27 में हारे, एक मैच टाई रहा और दो रद्द हुए. ऐसे दमदार रिकॉर्ड के बावजूद उनकी इस प्रारूप में कप्तानी क्यों गई? क्या आईसीसी टूर्नामेंट न जीत पाना या लगातार बल्ले से नाकाम होना या और कुछ कारण है.

इसे लेकर क्रिकेट समीक्षक अयाज़ मेमन कहते हैं कि इससे ज़ाहिर है कि हवा का रुख़ बदल रहा है.

वे कहते हैं, "टी-20 की कप्तानी विराट कोहली ने ख़ुद छोड़ी, जबकि एकदिवसीय और टेस्ट क्रिकेट की कप्तानी के बारे में उन्होंने चर्चा तक नहीं की. टेस्ट क्रिकेट की कप्तानी तो अब भी उनके पास ही है, लेकिन टी-20 के बाद एकदिवसीय क्रिकेट की कप्तानी रोहित शर्मा को सौंप दी गई है.''

मेमन बताते हैं, ''इसके अलावा टेस्ट में जो उप-कप्तानी रहाणे के पास थी, उसे भी रोहित को सौंपा जाना ये बताता है कि अगर ज़रूरत पड़ी तो वे टेस्ट मैचों में भी भारतीय कप्तान बनाए जा सकते हैं."

अयाज़ मेमन कहते हैं, "इसकी वजह अजिंक्य रहाणे की दो साल से ख़राब फ़ॉर्म है. उनकी जगह फ़िलहाल टेस्ट टीम में पक्की भी नहीं मानी जा सकती. ऐसे में किसी दूसरे को उप-कप्तान बनाना होगा."

वे कहते हैं कि पिछले छह-सात महीनों से हालात बदल रहे थे. भारत ने कोई आईसीसी टूर्नामेंट भी नहीं जीता, जिससे विराट कोहली पर दबाव आ गया था.

विराट कोहली
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क्यों गई कोहली की कप्तानी?

अयाज़ मेमन बताते हैं, ''कोहली 2019 के एकदिवसीय विश्वकप के सेमीफ़ाइनल में हार गए. इस साल आईसीसी विश्व टेस्ट चैंपियनशिप के फ़ाइनल में न्यूज़ीलैंड से हार गए. टी-20 विश्वकप में नॉकआउट तक भी नहीं पहुंच सके. इससे पहले 2017 में चैंपियंस ट्रॉफ़ी के फ़ाइनल में टीम पाकिस्तान से हार गई. शायद यह एक बहुत बड़ी नाकामी थी. वहीं द्विपक्षीय सिरीज़ या मैचों में टीम का प्रदर्शन बहुत बेहतरीन रहा है.''

मेमन कहते हैं, "टेस्ट, एकदिवसीय और टी-20 में भी एक कप्तान के रूप में उनके रिकॉर्ड शानदार हैं. लेकिन जहां दो से अधिक देशों के टूर्नामेंट आते हैं, वहां वे कोई भी टूर्नामेंट नहीं जीत सके, जबकि महेंद्र सिंह धोनी ने तीन बड़े टूर्नामेंट टी-20 विश्वकप, एकदिवसीय विश्वकप और चैंपियंस ट्रॉफ़ी जीते.''

उनके मुताबिक़, ''कोहली आठ-दस सीज़न के बाद भी आईपीएल का कोई ख़िताब भी नहीं जीत सके हैं. उनके बारे में एक धारणा सी बन गई है कि क्या इनमें कोई कमी है. क्या वे अच्छी तैयारी नहीं कर पाते?''

अयाज़ मेमन कहते हैं कि पिछले दो-ढाई साल से उनकी ख़ुद की फ़ॉर्म ठीक नहीं है, जब कि पहले उनके बल्ले से रनों का सैलाब सा बहता था. हालांकि वे अजिंक्य रहाणे और चेतेश्वर पुजारा जैसे बुरे फ़ॉर्म में नहीं है. लेकिन यदि इतने लंबे समय तक शतक न बने तो ऐसा लगता ही नहीं कि वे विराट कोहली हैं.

उनके अनुसार, ''ऐसे हालात में चयनकर्ता सोच रहे थे कि क्या वे कप्तानी के दबाव में हैं. वैसे भी भारत को विराट कोहली की एक कप्तान के बज़ाए बल्लेबाज़ के रूप में अधिक ज़रूरत है.''

मेमन कहते हैं कि ये सब देखकर निर्णय लिया गया कि अब सफ़ेद और लाल गेंद के कप्तानों का अलग कर दिया जाए. यानी टेस्ट मैच का कप्तान अलग हो और टी-20 और एकदिवसीय के अलग. वैसे टी-20 की कप्तानी तो विराट कोहली पहले ही छोड़ चुके हैं.

अयाज़ मेमन आगे कहते हैं, ''वैसे इंग्लैड में भी सफ़ेद गेंद के कप्तान इयॉन मोर्गन हैं तो लाल गेंद के कप्तान जो रूट. और दोनो अपनी अपनी जगह कामयाब हैं. इसका दूसरा पहलू यह भी है कि न्यूज़ीलैंड के केन विलियम्सन और पाकिस्तान के आज़म बाबर तीनों फ़ॉर्मेट के कप्तान हैं.''

उनके अनुसार, विराट कोहली कुछ वक़्त पहले तक तीनों फ़ॉर्मेट के कप्तान थे. लेकिन अब बीसीसीआई चाहती है कि दो कप्तानों का मॉडल अपनाया जाए.

लेकिन विराट कोहली को जिस तरह से बिना कोई मौक़ा दिए या बिना बताए एकदिवसीय टीम की कप्तानी से हटाया गया, क्या वो उनके लिए अपमानजनक नहीं है या ये समय की मांग थी? इस सवाल पर अयाज़ मेमन कहते हैं कि इस पूरे प्रकरण में उन्हें एक बात ज़रूर खटकी की कि इस मामले में बीसीसीआई का व्यवहार कोहली के प्रति बड़ा रुख़ा सा रहा.

विराट कोहली
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विराट कोहली

क्या कोहली को सम्मान से हटाया गया?

अयाज़ मेमन कहते हैं, ''यह बात शायद विराट कोहली भी जानते थे कि उन्हें कप्तानी से हटाया जा सकता है, क्योंकि रोहित शर्मा यदि टी-20 में कप्तानी कर सकते हैं तो एकदिवसीय में भी कर सकते हैं. लेकिन जिस तरह से प्रेस रिलीज़ में दक्षिण अफ़्रीका के दौरे के लिए चुने खिलाड़ियों के नाम बताए गए और अंत में दो लाईन लिख दी गई कि रोहित शर्मा एकदिवसीय टीम के कप्तान होंगे.''

मेमन बताते हैं, ''प्रेस रिलीज़ में एक भी लाइन नहीं है कि विराट कोहली ने एक खिलाड़ी के तौर पर जो किया, उसके लिए उनका शुक्रिया अदा करते हैं. विराट कोहली एक बड़े खिलाड़ी रहे हैं. एक बल्लेबाज़ के तौर पर वह शायद सचिन तेंदुलकर के बाद आते हैं. कप्तानी के मामले में भी कामयाब रहे हैं.''

अयाज़ मेमन कहते हैं कि यह सब उन्हें नहीं भाया और यहां बीसीसीआई का विराट कोहली के प्रति व्यवहार में रुख़ापन नज़र आया. हालांकि किसे कप्तान रखना है या नहीं, यह बीसीसीआई का काम है.

मेमन कहते हैं, ''यदि बदलाव आ रहा है और रोहित शर्मा कप्तान बनने की योग्यता साबित कर चुके हैं तो इसका ये अर्थ नहीं कि इस फ़ैसले में केवल राजनीति है. लेकिन यदि कोहली के योगदान को मान्यता न दें और उससे यदि उनके मन में कोई खटास आ जाए तो उसे समझा जा सकता है.''

सुनील गावस्कर
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सुनील गावस्कर

कप्तान बदलने का इतिहास बड़ा दिलचस्प

अब ऐसा भी नहीं है कि इससे पहले कप्तानों को बिना बताए बनाया या हटाया नहीं गया. साल 1975 में जब वेस्टइंड़ीज़ की टीम भारत आई थी, तो दिल्ली में होने वाले दूसरे टेस्ट मैच से पहले चर्चा थी कि चोटिल मंसूर अली ख़ान पटौदी की जगह फ़ारुख़ इंजीनियर कप्तान बनेंगे पर बने वेंकटराघवन. तो क्या हर बार सही कप्तान ही चुना जाता है?

इसे लेकर अयाज़ मेमन कहते हैं कि सब अलग-अलग दौर से गुज़रे हैं. 1975 में तो शायद फ़ारुख़ इंजीनियर टॉस के लिए भी तैयार हो गए थे, लेकिन अंतिम समय पर वेंकटराघवन कप्तान घोषित हुए.

वैसे मेमन बताते हैं कि पिछले 20-25 सालों में क्षेत्रीय राजनीति कम हुई है, हालांकि ये पूरी तरह ख़त्म तो नहीं हुई है. वहीं अब पहले की तरह कोई किसी के मामले में टांग नहीं अड़ाता, फ़िर चाहे क्रिकेट बर्बाद ही क्यों न हो जाए. और भारत की कप्तानी की तो एक बहुत ही रंगीन सी कहानी है. शुरू से देखें तो सीके नायडू को जब कप्तान बनाया गया तो उससे पहले विजयनगरम को आधिकारिक कप्तान बनाया गया था. और वह खिलाड़ी भी नहीं थे. वह सीके नायडू के मुक़ाबले कहीं ठहरते भी नहीं थे.

अयाज़ मेमन कहते हैं, ''कप्तानी का मामला हमेशा से विवादास्पद रहा है. जब सीनियर नवाब पटौदी कप्तान बने तो कहा गया कि विजय मर्चेंट क्यों नही बने. जब विजय हज़ारे को कप्तान बनाया तो विजय मर्चेंट क्यों नही बने. 1958-59 की एक सिरीज़ में तो भारत के चार कप्तान थे. कप्तानी में निरंतरता मंसूर अली ख़ान पटौदी के कप्तान बनने के बाद आई, जो 21-22 साल की उम्र में ही कप्तान बनने के बाद छह-सात साल तक बने रहे.

मेमन के अनुसार, कप्तानी आगे-पीछे जाने का सिलसिला हमेशा से रहा है. कपिल देव और सुनील गावस्कर तो टेबल टेनिस के खिलाड़ी की तरह कप्तान के रूप में बदले जा रहे थे. कभी कपिल कप्तान तो कभी गावस्कर कप्तान. ये सब बीसीसीआई के अधिकारियों के कारण होता था, जो अपनी प्राथमिकताएं लेकर आते थे, न कि वे क्रिकेट के बारे में सोचते थे.

अयाज़ मेमन आगे कहते हैं, ''बीसीसीआई के इसी रवैए के चलते सुनील गावस्कर ने 1985 में चैंपियन ऑफ चैंपियंस ट्रॉफ़ी जीतने के बाद कप्तानी छोड़ दी. उसी तरह राहुल द्रविड़ ने भी 2007 में कप्तानी छोड़ दी, जबकि वे इंग्लैंड के ख़िलाफ सिरीज़ जीत चुके थे. उन्होंने कहा कि वह अपनी बल्लेबाज़ी पर ध्यान केंद्रित करना चाहते हैं.''

मेमन आगे बताते हैं कि सचिन तेंदुलकर भी दो बार कप्तान बने. दूसरी बार उन्होंने भी बल्लेबाज़ी पर बढ़ते दबाव की बात कहकर कप्तानी छोड़ दी. उनके बाद सौरव गांगुली ने कामयाब कप्तानी की, क्योंकि तब कप्तान को बहुत सारे अधिकार मिल चुके थे. वे अपनी मर्जी से खिलाड़ी चुन सकते थे. महेंद्र सिंह धोनी ने भी टेस्ट क्रिकेट की कप्तानी छोड़ी. मोहम्मद अज़हरूद्दीन लम्बे समय तक भारत के कप्तान रहे पर मैच फ़िक्सिंग के आरोपों के कारण उनकी टीम से छुट्टी हो गई.

रोहित शर्मा
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रोहित शर्मा

रोहित को क्यों मिली कप्तानी?

अयाज़ मेमन कहते हैं कि विराट कोहली पर दबाव इसलिए भी बढ़ रहा था, क्योंकि उनके सामने एक रोहित शर्मा के रूप में ऐसा दावेदार आ गया जो उनके बराबर ही रन बना रहा था और उनकी जगह भी टीम में पुख़्ता थी. जब कपिल देव और सुनील गावस्कर थे तो दोनों ही सुपरस्टार थे. एक नहीं था तो दूसरा विकल्प के तौर पर था. मोहम्मद अज़हरूद्दीन कप्तान थे तो तेंदुलकर विकल्प थे. सौरव गांगुली आए तो राहुल द्रविड़ विकल्प थे. लेकिन जब उनका झगड़ा कोच ग्रेग चैपल के साथ हो गया तो तुरंत नए कप्तान राहुल द्रविड़ बना दिए गए जिनके पास विशाल अनुभव था.

अयाज़ मेमन के अनुसार, शायद 2019 के एकदिवसीय विश्वकप में जहां रोहित शर्मा ने पांच शतक लगाए और उसके बाद टेस्ट क्रिकेट में सलामी बल्लेबाज़ के रूप में वे बेहद कामयाब साबित हुए तो एक विकल्प पैदा हो गया. इसके बाद विराट कोहली के कोई आईसीसी टूर्नामेंट न जीतने से ऐसी बातों में ज़्यादा वज़न आ गया. यह सवाल भी उठा कि क्या कोई विराट कोहली से ज़्यादा अच्छी कप्तानी कर सकता है. क्या विराट कोहली से कप्तानी लेने के बाद उनकी बल्लेबाज़ी का स्तर बढ़ सकता है? ये दो बातें चयनकर्ताओं के मन में आईं. विराट कोहली ने भी टी-20 की कप्तानी छोड़ दी, तो चयनकर्ताओं ने उनसे एकदिवसीय की कप्तानी छीन ली.

वे कहते हैं कि चयनकर्ताओं ने यह संदेश भी दिया कि जो भारत हमेशा से एक ही कप्तान में भरोसा करता था, अब दो कप्तान रखे. ऐसा पहले बहुत कम देखने को मिला, सिवाए इसके कि धोनी लाल गेंद में कप्तान थे और विराट कोहली सफ़ेद गेंद में, क्योंकि धोनी ने टेस्ट क्रिकेट छोड़ दी थी.

उनके अनुसार, इसकी एक ख़ास वज़ह यह भी है कि अगले साल एक और टी-20 विश्वकप आने वाला है, जिसमें उन्हें रोहित शर्मा के रूप में एक कप्तान चाहिए और शायद एकदिवसीय क्रिकेट और टी-20 में भी समान खिलाड़ी हों. ऐसे में रोहित शर्मा अपने खिलाड़ियों को ऐसी दिशा देने देंगे कि वे एकदिवसीय में भी काम आ सकें और विराट कोहली टेस्ट क्रिकेट में जगह संभाल सकें.

आख़िर में अयाज़ मेमन कहते हैं कि यदि टेस्ट क्रिकेट में विराट कोहली की फ़ॉर्म अच्छी नहीं रही और परिणाम भी उम्मीदों के अनुसार नहीं आए तो रोहित शर्मा के उप-कप्तान होने के कारण यह भी हो सकता है कि टेस्ट कप्तानी भी विराट कोहली से ले ली जाए.

विराट कोहली, रोहित शर्मा
DIBYANGSHU SARKAR
विराट कोहली, रोहित शर्मा

इस बारे में अशोक मल्होत्रा क्या कहते हैं

इसी मसले को लेकर भारत के पूर्व क्रिकेटर और चयनकर्ता अशोक मल्होत्रा कहते हैं कि जब विराट कोहली ने टी-20 की कप्तानी छोड़ी, तभी दीवार पर इबारत की तरह लिखा था कि उनकी एकदिवसीय क्रिकेट की कप्तानी भी जाएगी, क्योंकि सफ़ेद गेंद के दो कप्तान नहीं हो सकते. विराट कोहली को भी शायद इस बात का अंदाज़ा था, जिसके चलते उन्होंने टी-20 की कप्तानी छोड़ दी ताकि उनकी टेस्ट और एकदिवसीय क्रिकेट की कप्तानी बच जाए.

क्या बीसीसीआई ने सम्मान के साथ विराट को कप्तानी छोड़ने का मौक़ा नहीं दिया? इस सवाल पर अशोक मल्होत्रा कहते हैं कि बोर्ड ने तो उन्हें अवसर दिया था. बोर्ड ने तो पहले ही उन्हें कप्तानी से हटाने का फ़ैसला कर लिया था और उनसे कहा भी, लेकिन विराट कोहली को ये जायज़ नहीं लगा, क्योंकि शायद वे एकदिवसीय विश्वकप 2023 की कप्तानी करना चाहते थे. बोर्ड ने विराट कोहली को 48 घंटे का समय दिया था कि आप इज़्ज़त से कप्तानी छोड दें नहीं तो हम रोहित शर्मा को कप्तान बनाने का एलान करने वाले हैं.

जो भी हो इससे एक बात साबित हो गई है कि भारत में क्रिकेट टीम की कप्तानी भले ही एक कांटों भरा ताज है, फ़िर भी इसे कोई भी खिलाड़ी आसानी से नही छोड़ता.

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