अंडमान और निकोबार की एक चोटी का नाम अब मणिपुर के नाम पर क्यों किया गया है? जानिए
पोर्ट ब्लेयर, 21 अक्टूबर : केंद्र सरकार ने अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के एक ऐतिहासिक पर्यटन स्थल 'माउंट हैरियट' का नाम बदलकर 'माउंट मणिपुर' कर दिया है। रविवार को लिए गए इस फैसले की घोषणा हाल ही में हुई है, जब केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह अंडमान और निकोबार की दो दिवसीय यात्रा पर गए थे। मणिपुर में 2022 में विधानसभा चुनाव होने हैं और इस वजह से भी केंद्र सरकार के इस कदम की अहमियत बढ़ गई है। क्योंकि, मणिपुर के लिए यह मसला उसके गौरव के साथ-साथ भावनाओं से भी जुड़ा हुआ है। इसके अलावा यह मुद्दा देश की आजादी के लिए भारतीयों की ओर से दी गई अनंत कुर्बानियों से भी संबंधित है।

अंडमान के 'माउंट मणिपुर' से मणिपुर का क्या कनेक्शन है ?
1891 के ऐंग्लो-मणिपुर युद्ध के बाद अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने वाले महाराजा कुलचंद्र ध्वाजा सिंह समेत कई मणिपुरी को ब्रिटिश सरकार ने दंड के तौर पर अंडमान द्वीप की कॉलोनी में निर्वासित कर दिया था। उस समय तक कुख्यात सेलुलर जेल (कालापानी) नहीं बनी थी। इसलिए कुलचंद्र और बाकी कैदियों को माउंट हैरियट पर ही रखा गया था, जो अब दक्षिण अंडमान जिले की फेर्रागंज तहसील की एक पहाड़ी है। मणिपुर राज्य अभिलेखागार में मौजूद ब्रिटिश-कालीन एक दस्तावेज के मुताबिक महाराजा कुलचंद्र और उनके भाइयों समेत कुल 23 लोगों को आजीवन के लिए अंडमान भेजा गया था। उनमें से कुछ की वहीं मौत हो गई, लेकिन कुलचंद्र को रिहा करके उनके निधन से पहले कहीं और शिफ्ट कर दिया था। इम्फाल के एक इतिहासकार वैंगम सोमोरजीत कि मुताबिक, ' उन 23 को मणिपुर में वॉर हीरो माना जाता है। इसीलिए माउंट हैरियट 1891 के एंग्लो-मणिपुर युद्ध का एक महत्वपूर्ण प्रतीक है।'

पहले माउंट हैरियट नाम क्यों पड़ा था ?
माउंट हैरियट अंडमान और निकोबार द्वीप समूह की तीसरी सबसे ऊंची चोटी है। अंग्रेजों के जमाने में यह वहां का ग्रीष्मकालीन मुख्यालय हुआ करता था। माना जाता है कि इस चोटी का नाम हैरियट क्रिस्टिना टाइटलर के नाम पर पड़ा था, जो कि एक ब्रिटिश आर्टिस्ट और फोटोग्राफर थी। उसके पति रॉबर्ट क्रिस्टोफर टाइटलर ब्रिटिश इंडियन आर्मी में एक सैनिक थे। 1862 और 1864 के बीच, टाइटलर पोर्ट ब्लेयर में पीनल कॉलोनी का सुप्रीटेंडेंट हुआ करता था। दक्षिण अंडमान जिले के अफसरों का कहना है कि माउंट हैरियट में एक औपनिवेशिक कालीन बंगला है, जो अब फॉरेस्ट गेस्ट हाउस बन चुका है। उसके नजदीक ही माउंट हैरियट नेशनल पार्क भी है जो विभिन्न प्रजातियों की पक्षियों के लिए चर्चित है।
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मणिपुर साम्राज्य किसके अधीन था ?
मणिपुर साम्राज्य और अंग्रेजों के बीच 1891 में हुआ युद्ध एक महीने से ज्यादा वक्त तक चला था और मणिपुर के लिए वह आज भी गौरव का प्रतीक और भावनात्मक मसला है। इस जंग की शुरुआत मणिपुर राजमहल में तख्तापलट के साथ शुरू हुई थी, जिसके अंदर खेमेबाजी हुई थी। मणिपुर राज्य अभिलेखागार की वेबसाइट के मुताबिक शाही परिवार के राजकुमारों के बीच मतभेद का अंग्रेजी हुकूमत ने फायदा उठा लिया। 1886 में, जब सुरचंद्र को अपने पिता चंद्रकीर्ति सिंह से सत्ता विरासत में मिली, मणिपुर साम्राज्य ब्रिटिशों के अधीन नहीं था, लेकिन विभिन्न संधियों के जरिए उसके ब्रिटानिया हुकूमत के साथ संबंध जरूर थे। लेकिन, सुरचंद्र का सिंहासन हासिल करने का तरीका विवादास्पद था और इसलिए उनके छोटे भाइयों - कुलचद्र, टिकेंद्रजीत ने उनके खिलाफ विद्रोह कर दिया था।

1891 के ऐंग्लो-मणिपुर युद्ध का कारण क्या था ?
इम्फाल के इतिहासकार वैंगम सोमोरजीत और सोमी रॉय ने एक कहानी लिखी है, जिसके मुताबिक 1890 में हुए तख्तापलट में सुरचंद्र को सत्ता से बेदखल कर दिया गया और दूसरे बड़े भाई कुलचंद्र को राजा बनाने की घोषणा कर दी गई। इसके बाद सुरचंद्र अंग्रेजों से मदद लेकर फिर से सिंहासन पर काबिज होने के लिए कलकत्ता भाग गए। लेकिन, अंग्रेजों ने यहीं पर खेल कर दिया। उसने असम के अपने चीफ कमिश्नर जेम्स क्विंटन को सेना के साथ इस मकसद से मणिपुर भेजा कि कुलचंद्र को राजा के रूप में इस शर्त पर मान्यता दे दी जाएगी कि वह विद्रोह करने वाले राजकुमार टिकेंद्रजीत को उसे गिरफ्तार करने देंगे और मणिपुर से निष्कासित कर देंगे। लेकिन, एक स्वयंप्रभु साम्राज्य मणिपुर के राजा अंग्रेजों की इस दखलंदाजी मानने के लिए तैयार नहीं थे और इसी की वजह से ऐंग्लो-मणिपुर युद्ध शुरू हुआ।

दो चरणों में हुई ऐंग्लो-मणिपुर जंग
पहले चरण में मणिपुर के सिपाही न सिर्फ अंग्रेजों पर भारी पड़े, बल्कि क्विंटन समेत तमाम अफसरों को आत्मसमर्पण करने को मजबूर कर दिया और उन्हें सार्वजनिक रूप से मार डाला गया। इसके बाद दूसरे चरण में अंग्रेजों ने बौखलाहट में बदले की कार्रवाई की। ब्रिटिश सेना ने मणिपुर को तीनों तरफ से घेर लिया और आखिरकार इम्फाल के कांग्ला फोर्ट पर कब्जा कर लिया। राजकुमार टिकेंद्रजीत और चार बाकी लोगों को अंग्रेजों ने फांसी दे दी और कुलचंद्र समेत 23 लोगों को अंडमान द्वीप पर निर्वासित कर दिया। भले ही इस युद्ध में अंग्रेज भारी पड़े हों, लेकिन 1857 के सिपाही विद्रोह के बाद अंग्रेजी हुकूमत को नए सिरे से चुनौती मिलने की शुरुआत हो चुकी थी। (सभी तस्वीरें प्रतीकात्मक)
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