मालदीव के कड़े तेवर को क्यों नहीं संभाल पा रहा भारत

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अब भारत के पड़ोसियों से रिश्ते इस पर निर्भर करता है कि वहां चीन की मौजूदगी किस हद तक है. दक्षिण एशिया में ऐसा कोई देश नहीं है जिसकी क़रीबी चीन और भारत दोनों से है.

मालदीव से भारत का संबंध कुछ साल पहले तक काफ़ी गहरा था, लेकिन जैसे-जैसे चीन वहां अपनी मौजूदगी बढ़ाता गया वैसे-वैसे भारत के पांव उखड़ते गए.

हालात ये हैं कि मालदीव ने भारत से कह दिया है कि उसने राहत बचाव के लिए जो दो हेलिकॉप्टर उपहार स्वरूप दिए थे, उन्हें वापस ले जाए.

यहां तक कि मालदीव की कंपनियों ने अपने विज्ञापन में कह दिया कि भारतीय नौकरी के लिए आवेदन नहीं करें, क्योंकि उन्हें वर्क वीज़ा नहीं मिलेगा.

इस साल फ़रवरी महीने में मालदीव के राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन ने आपातकाल लगाने की घोषणा की थी तो भारत ने इसका कड़ा विरोध किया था और उसके बाद से ही दोनों देशों के संबंधों में कड़वाहट आती गई.

मालदीव की अब्दुल्ला यामीन सरकार ने दोनों हेलिकॉप्टरों के लिए भारतीय पायलटों के वीज़ा को भी रद्द कर दिया.

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मालदीव में भारत की जगह ली चीन

मालदीव और भारत के संबंधों को लेकर अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का कहना है कि जो काम वहां भारत करता था अब वो चीन कर रहा है. इस बीच 20 जून को भारत सरकार के वाणिज्य मंत्रालय ने एक एडवाइजरी जारी कर मालदीव को निर्यात किए जाने वाले समानों की सीमा तय कर दी.

भारत सरकार के इस क़दम को मालदीव से ख़राब संबंधों के तौर पर देखा जा रहा है. मालदीव के मीडिया में कहा गया कि भारत के इस क़दम से ज़रूरी खाद्य सामग्री आलू, अंडा, प्याज, चावल, आटा, चीनी और दाल की कमी हो सकती है.

हालांकि भारत के विदेश मंत्रालय का कहना है कि मालदीव को भेजे जाने वालों समानों में कोई कटौती नहीं की गई है बल्कि ज़रूरत के हिसाब से चीज़ों को तय किया गया है.

भारतीय विदेश मंत्रालय ने एक प्रेस रिलीज में कहा है कि भारत मालदीव के साथ 1981 में हुए व्यापार समझौते के आधार पर ही निर्यात करता है.

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दिसंबर 2017 में चीन और मालदीव के बीच 12 समझौतों पर हस्ताक्षर हुए थे. इनमें चीन की महत्वाकांक्षी योजना वन रोड वन बेल्ट के तहत कई समझौते हुए हैं. चीन का उद्येश्य हिन्द महासागर में आर्थिक और रणनीतिक सहयोग को बढ़ाना है.

हिन्द महासागर में चीन के विस्तार का भारत विरोध कर रहा है. दूसरी तरफ़ चीन बड़े प्रोजेक्टों पर हिन्द महासागर में काम कर रहा है. इनमें ख़ासकर नए पोर्ट का निर्माण मुख्य तौर पर शामिल है.

चीन का सामना नहीं कर पा रहा भारत

एशियाई सुरक्षा पर काम करने वाले थिंक टैंक सिक्यॉरिटी रिस्क ऑफ़ एशिया के प्रमुख राहुल भोसले ने इस मसले पर आइरिश टाइम्स से कहा है कि मालदीव की तरफ़ से भारत को हेलिकॉप्टर ले जाने के लिए कहा जाना भारत की सैन्य और राजनयिक नीतियों के लिए तगड़ झटका है.

उन्होंने कहा कि इससे साफ़ पता चलता है कि इस इलाक़े में भारत चीन का सामना नहीं कर पा रहा है.

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इससे पहले पूर्वी अफ़्रीकी देश सीशेल्स भारत को झटका दे चुका है. सीशेल्स ने अपने एक द्वीप पर भारत को उस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया था जिसमें एक सैन्य ठिकाना बनाने की बात थी. सीशेल्स ने भारत के इस प्रस्ताव को ख़ारिज कर दिया.

भारत ने सीशेल्स में ऐसा हिन्द महासागर में अपनी मौजूदगी बढ़ाने के लिए करने का फ़ैसला किया था.

सीशेल्स में भारत के इस सैन्य ठिकाने को लेकर काफ़ी विवाद था. विपक्ष की तरफ़ से इस प्रस्तावित सैन्य ठिकाने को लेकर काफ़ी विरोध हो रहा था.

सीशेल्स के राष्ट्रपति डैनी फ़ावरे भारत के दौरे पर हैं उन्होंने साफ़ कर दिया है कि भारत के साथ द्विपक्षीय वार्ता मैं सैन्य ठिकाना विकसित करने का मामला शामिल नहीं है.

हिंद महासागर द्वीप समूह के देशों में मालदीव एकमात्र ऐसा देश है जहां पिछले चार सालों में नरेंद्र मोदी का दौरा नहीं हुआ है.

मोदी का मालदीव दौरा रद्द

मार्च 2015 में मोदी को मालदीव जाना था, लेकिन भारत समर्थक नेता मोहम्मद नाशीद को जेल में डाले जाने के बाद इस दौरे को रद्द कर दिया गया था.

मालदीव इंडिपेंडेंट ने लिखा है कि दोनों के राजनीतिक संबंध पटरी से उतरने के बाद नागरिकों के संबंधों के बीच भी दीवार खड़ी हो गई है.

बड़ी संख्या में मालदीव में काम करने वाले भारतीयों के वीज़ा का नवीनीकरण नहीं किय गया. अख़बार का कहना है कि मालदीव को मज़दूरों की ज़रूरत है, लेकिन राष्ट्रपति यामीन नहीं चाहते हैं कि भारतीय आएं.

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इतना कुछ होने के बावजूद भारत ने संयुक्त राष्ट्र के सुरक्षा परिषद में इंडोनेशिया का विरोध कर मालदीव को अस्थायी सदस्य बनाने का समर्थन किया था.

आख़िर भारत मालदीव के ख़िलाफ़ आक्रामक रुख़ क्यों नहीं अख़्तियार कर रहा है? कई विश्लेषकों का मानना है कि भारत तेलों का आयात जिस समुद्री मार्ग से करता है वो मालदीव से होकर ही आता है. ऐसे में भारत पूरी तरह से उपेक्षा नहीं कर सकता.

हालांकि सुरक्षा परिषद में अस्थायी सदस्य की दौड़ में भारत के समर्थन के बावजूद मालदीव को इंडोनेशिया से मुंह की खानी पड़ थी. भारत के इस क़दम के बाद लग रहा था कि दोनों देशों के बीच संबंध सुधरेंगे, लेकिन ऐसा होता नहीं दिख रहा है.

जब भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मार्च 2015 में मालदीव का दौरा रद्द किया था तभी पता चल गया था कि दोनों देशों के संबंधों में कड़वाहट और बढ़ गई है.

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मालदीव भारत के लिए क्यों ज़रूरी

जुलाई 2015 में मालदीव ने अपने संविधान में संशोधन कर व्यवस्था बनाई कि मालदीव में दूसरे देश भी ज़मीन ख़रीद सकते हैं.

मालदीव के इस क़दम के बाद भारत की आशंका गहरा गई कि चीन द्वीपों के इस देश में रणनीतिक ठिकाने विकसित कर सकता है.

अप्रैल 2016 में मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद यामीन भारत के दौरे पर आए और दोनों देशों के बीच कई समझौते हुए. हालांकि इस दौरे से भी दोनों देशों के रिश्तों पर जमी बर्फ़ नहीं पिघली.

चीन अगर मालदीव में अपना पैर जमा लेता है तो वो भौगोलिक रूप से भारत के और क़रीब आ जाएगा. इसके साथ ही मालदीव अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्ग के पास है और भारत तेल का आयात इसी मार्ग से करता है.

अगर मालदीव में चीन में नवल बेस बना लेता है तो भारत की सुरक्षा के लिहाज से ख़तरा होगा. भारत की इस चिंता के अपने आधार भी हैं.

अगस्त 2017 में तीन चीनी पोत मालदीव की राजधानी माले पहुंचे. मालदीव ने भारत के साथ 6 से 13 मार्च तक साझा सैन्याभ्यास में भी शामिल होने से इनकार कर दिया था.

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