क्‍यों नहीं पूरा हुआ, आडवाणी का पीएम बनने का सपना

बैंगलोर (ईश्‍वर आशीष)। गुजरात में एक कार्यक्रम के दौरान आखिर भाजपा नेता लाल कृष्‍ण आडवाणी ने नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने की संभावना पर कहा कि अगर ऐसा होता है तो उन्‍हें खुशी होगी। जिसका मतलब यह निकाला जा रहा है कि अंतत: आडवाणी को पार्टी में मोदी के कद के आगे इस सच को स्‍वीकारना ही पड़ा कि अब उनका समय नहीं रहा। इसे उनकी मजबूरी और विवशता के रूप में भी देखा जा रहा है। गौर हो कि गोवा कार्यकारिणी की बैठक से पहले ही आडवाणी को पता चल गया था आगे क्‍या होने वाला है, इसलिए उन्‍होने बैठक में जाकर अपनी नाराजगी जताई।

बहरहाल मोदी की भाजपा की तरफ से प्रधानमंत्री पद की औपचारिक घोषणा के बाद यह तय हो गया है कि आडवाणी का यह सपना अब कभी नहीं पूरा होगा। हालांकि कुछ राजनीतिक विश्‍लेषक कहते हैं कि उनके पास 2004 और 2009 में अपने सपने को पूरा करने का मौका था लेकिन वह इसका फायदा नहीं उठा सके वहीं मोदी की खिलाफत करने के कारण कार्यकर्ताओं और पार्टी नेताओं के बीच अपनी ही छवि खराब की है।

कल गुजरात में मोदी की तारीफ करना उनके लिए अपनी खराब छवि की मरम्‍मत करने जैसा ही कहा जा सकता है। इससे उनका सपना भले ही न पूरा हो, लेकिन वह पार्टी को राष्‍ट्रीय स्‍तर पर लाने वाले व्‍यक्ति के रूप में जरूर सम्‍मान पा सकेंगे।

देखें ऐसे कौन कौन से कारण हैं, जिससे कि आडवाणी का पीएम बनने का सपना पूरा न हो सका।

ग्रामीण वोटरों को आकर्षित न करना

ग्रामीण वोटरों को आकर्षित न करना

सन 2004 में यूपीए का सत्‍ता में आना एक अप्रत्‍याशित घटना माना जाता है। जबकि 'इंडिया शाइनिंग' विज्ञापन के आधार पर सत्‍ता में आने का सपना देखने वाली भाजपा ग्रामीण मतदाताओं को आकर्षित नहीं कर सकी। पार्टी का प्रचार शहरों तक ही सीमित होकर रह गया।

इन चुनावों में कांग्रेस ने 145 सीटें जीती जबकि भाजपा ने 138 सीटों पर कामयाबी पाई। कुल मिलाकर अगर ग्रामीण मतदाता भाजपा के साथ होता तो पार्टी चुनावों में जीत हासिल कर सकती थी और आडवाणी का सपना भी पूरा हो जाता।

जिन्‍ना को धर्मनिरपेक्ष बताना

जिन्‍ना को धर्मनिरपेक्ष बताना

भाजपा वरिष्‍ठ नेता आडवाणी का पाकिस्‍तान जाकर मोहम्‍मद अली जिन्‍ना को धर्मनिरपेक्ष बताना। जिससे कि एक हिंदुत्‍ववादी नेता के रूप में जनता के बीच उनकी छवि संदिग्‍ध हो गयी। जबकि 'मुस्लिम टोपी' न पहनने के कारण हिदुत्‍ववादी ही सही पर जनता के बीच मोदी की छवि स्‍पष्‍ट तो है ही। गौर हो सरोजिनी नायडू के जिन्‍ना के बारे में कहे गये शब्‍द कि 'जिन्‍ना हिंदू मुस्लिम एकता के राजदूत हैं' को आडवाणी ने जिन्‍ना की मजार पर जाकर दोहराया था।

मतदाताओं के बीच लोकप्रिय नहीं

मतदाताओं के बीच लोकप्रिय नहीं

2004 के पहले भाजपा केंद्र में सरकार बनाने में भले ही सफल हो गयी हो लेकिन यह भी सच है कि भाजपा को वोट आडवाणी के नाम पर नहीं मिला बल्कि कभी अटल बिहारी वाजपेयी के नाम तो कभी अयोध्‍या मुद्दे पर मिला। वह जनता में ऐसा उत्‍साह नहीं जगा सके कि लोग उनमें देश का भविष्‍य देखें।

मोदी का अपेक्षाकृत कम उम्र का होना

मोदी का अपेक्षाकृत कम उम्र का होना

आडवाणी की उम्र इस समय 85 वर्ष की है वहीं मोदी की 63 वर्ष। देश के युवा मोदी के दृढ़ व्‍यक्तित्‍व और उनकी भाषण शैली से प्रभावित हैं और उनकी क्षमताओं पर भी यकीन करता है। जबकि आडवाणी ने न तो देश के विकास मॉडल की चर्चा की और न ही युवाओं में लोकप्रिय हैं।

संघ से दूरियां

संघ से दूरियां

आरएसएस ने अभी तक पर्दे के पीछे से ही पार्टी का समर्थन किया है लेकिन मोदी के कारण संघ खुलकर सामने आ गया। संघ कार्यकर्ता होने के कारण मोदी को संघ पदाधिकारियों का समर्थन प्राप्‍त है, जबकि आडवाणी का प्रभाव संघ पर पहले जैसा नहीं रह गया है। तभी उनके इस्‍तीफा देने के बावजूद संघ पदाधिकारियों ने मोदी की कीमत पर उनसे समझौता नहीं किया।

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