विधानसभा चुनाव: आख़िर क्यों ख़ास है दिल्ली?
नयी दिल्ली। पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव आज अपने आखिरी दौर में है। दिल्ली चुनाव के बाद चुनावी शोर खत्म हो जायेगा और तब बढ़ेंगी धड़कनें और फिर 8 दिसंबर को परिणाम आने पर कहीं बजेंगे ढोल नगाड़े तो कहीं मातम छा जायेगा। हर बार की तरह इस बार भी दिल्ली का चुनाव सत्ता के सेमिफाइनल मैच की तरह है। चनाव अगर खेल का मैदान हो, तो इसे फाइनल और सेमी फाइनल की शब्दावली में बांधने की कोशिश भी होती है।
ऐसे में कांग्रेस और भाजपा दोनों के लिए अगले साल होनेवाले लोकसभा चुनाव के लिए दिल्ली विधानसभा का चुनाव ओपिनियन पोल का काम करेगा। इसे लिटमस पेपर के तौर पर देखा जा रहा है। कहते है कि लोकसभा चुनाव के लिए दिल्ली एक बेहतरीन बैरोमीटर के रूप में उभर रहा है।
दिल्ली विधानसभा कुल 70 विधायकों का सदन है। दिल्ली पूर्ण राज्य भी नहीं है। इस लिहाज से इसका राजनीतिक महत्व कुछ भी नहीं है, फिर भी दिल्ली से उठने वाली हवा के झोंके पूरे देश को प्रभावित करते हैं। ऐसे सिर्फ इसलिए क्योंकि दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी है। जहां पर राजनीतिक दलों की दखलअंजादी बाकी राज्यों के मुकाबले ज्यादा होती है। सबसे ज्यादा जो फैक्टर दिल्ली को बाकी राज्यों की राजनीति से अलग करती है वो ये कि दिल्ली का पॉलिटिकल एजेंडा केन्द्र के एजेंडा के मेल खाता है।
तो आइये एक नजर डालिये स्लाइडर में जहां हम आपको कुछ ऐसे फैक्ट बता रहे हैं जो दिल्ली को खास बनाते हैं।

युवाओं का गढ़ है दिल्ली
देश का एक बड़ा शहर होने के नाते दिल्ली इस आयु और मध्य आय वर्ग का बेहतरीन नमूना है। यहां हर जगह से आकर लोग बसते है। दिल्ली को युवाओं का गढ़ माना जाता है। ऐसे में दिल्ली का चुनाव सिर्फ स्थानीय मुद्दों पर केन्द्रित नहीं रहता।

दिल्ली राजनीति का गढ़
दिल्ली की राजनीति में केन्द्र का हस्तक्षेप होता है। राजनीति का गढ़ होने के कारण दिल्ली का चुनाव केन्द्र के समीकरण को प्रभावित करता है। दिल्ली से उठने वाली हवा के झोंके पूरे देश को प्रभावित करते हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में दिल्ली की सातों संसदीय सीटों पर कांग्रेस के प्रत्याशी जीते थे।

युवाओं की शक्ति का होगा अंदाजा
दिल्ली में युवाओं की तादात कतहीं ज्यादा है। बाहरी युवा भी दिल्ली में बसते है। ऐसे में दिल्ली चुनाव 2014 के चुनाव में भारत के शहरी युवाओं की भावनाओं का पता लगाएगा कि वे किस प्रकार की राजनीति चाहते हैं।

कांग्रेस या भाजपा
दिल्ली विधानसभा चुनाव में दो मुख्य पार्टियों में सीधी टक्कर है। यही दो पार्टियां केन्द्र की सत्ता में दांव खेलती है। ऐसे में दिल्ली का चुनाव सत्ता का सेमिफाइनल होता है।

तीसरी पार्टी बना मुद्दा
दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी भ्रष्टाचार के मुद्दे को लेकर चुनाव लड़ रही है। ऐसे में अगर आम आदमी पार्टी दिल्ली विधानसभा चुनाव में अच्छा प्रदर्शन करती है तो लोकसभा चुनाव के लिए भ्रष्टाचार के मुद्दे को बल मिल जाएगा।

स्थानीय मुद्दों के बजाए राष्ट्रीय मुद्दों का अहमियत
दिल्ली विधानसभा चुनाव में बाकी राज्यों के चुनावी मुद्दों की तरह स्थानीय मुद्दों को ज्यादा तव्वजों नहीं दी गई है। यहां भ्रष्टाचार, घोटालें, सरकार का नाकामियों को चुनाव में ज्यादा महत्व दिया गया है। कह सकते है कि दिल्ली चुनाव के अधिकांश मुद्दे केन्द्र की राजनीति से मिलते- जुलते है।

राहुल VS मोदी
दिल्ली विधानसभा चुनाव को राहुल गांधी और नरेन्द्र मोदी के बीच की लड़ाई के तौर पर देखा जा रहा है। दिल्ली की फाइट तय करेगी लोकसबा चुनाव में देश में मोदी फैक्टर काम करेगा या फिर राहुल का जादू।

सोशम मीडिया का रोल होगा क्लीयर
दिल्ली विधानसभा चुनाव में जिस तरह से सोशल मीडिया का इस्तेमाल हुआ है वो तय करेगा कि लोकसभा चुनाव 2014 में इस का रोल क्या होगा। दिल्ली का चुनाव केन्द्र की राजनीति में सोशल मीडिया की भूमिका जाहिर करेगी।

आप का टेस्ट
दिल्ली में इस बार एक और परीक्षण चल रहा है। आम आदमी पार्टी यानी ‘आप' का परीक्षण। एक साल से भी कम समय में एक पार्टी बन कर खड़ी हो गयी और इस समय वह कांग्रेस और भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती के रूप में खड़ी है। यह चुनाव ‘आप' जैसी राजनीति के लिए कसौटी है।

आप का धर्मसंकट केन्द्र के लिए ट्रेलर
‘आप' ने दिल्ली में एंटी क्लाइमैक्स तैयार कर दिया है। अंदेशा है कि दिल्ली का वोटर त्रिशंकु विधानसभा चुनकर दे सकता है। ऐसा हुआ तो ‘आप' के सामने बड़ा धर्मसंकट पैदा होगा। यह उस धर्मसंकट का ट्रेलर भी होगा, जो 2014 के लोकसभा परिणामों के बाद जन्म ले सकता है।












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