विकास की बजाय 'अब्बाजान' और 'क़ब्रिस्तान-श्मशान' जैसे मुद्दों पर क्यों टिक जाती है बीजेपी?

यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ
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यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ

पिछले महीने लखनऊ में एक कार्यक्रम में यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने जब समाजवादी पार्टी के पूर्व अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव को समाजवादी पार्टी के मौजूदा अध्यक्ष अखिलेश यादव के 'अब्बाजान' के तौर पर संबोधित किया तो एक बार ऐसा लगा कि शायद वो भूल कर गए होंगे. लोगों को उम्मीद थी कि इस संबोधन पर योगी आदित्यनाथ खेद भले न जताएं, लेकिन इसे कम से कम आगे दोहराने से ज़रूर बचेंगे.

हालांकि यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने तत्काल इस बयान की आलोचना करते हुए योगी आदित्यनाथ को उनकी भाषा के संदर्भ में आड़े हाथों लिया तो राजनीतिक गलियारों में भी ऐसी भाषा पर कई सवाल खड़े हुए. यहां तक कि बीजेपी के भी कई लोगों ने आधिकारिक रूप से भले आलोचना न की हो, पर सार्वजनिक रूप से इसका समर्थन भी नहीं किया.

लेकिन योगी आदित्यनाथ वहीं नहीं रुके बल्कि इस संबोधन को तो जैसे उन्होंने अपना 'तकिया कलाम' बना लिया. विधान परिषद में जब यह मुद्दा उठा, तो उन्होंने सीधे तौर पर कहा कि ''अब्बाजान शब्द कब से असंसदीय हो गया? सपा को मुस्लिम वोट चाहिए, लेकिन अब्बाजान से परहेज़ है.''

यही नहीं, 12 सितंबर को कुशीनगर में एक कार्यक्रम में उन्होंने कहा, "इससे पहले ग़रीबों को दिया जाने वाला राशन अब्बाजान कहने वाले हज़म कर जाते थे. तब कुशीनगर का राशन नेपाल, बांग्लादेश चला जाता था."

यूपी में बीजेपी के कुछ नेता योगी आदित्यनाथ की इस भाषा का बचाव करते भले नज़र आए हों, लेकिन विपक्ष के साथ-साथ सहयोगी दलों तक ने भी ऐसे बयानों और ऐसी भाषा की आलोचना की और योगी आदित्यनाथ को इससे बचने की सलाह दी है. राष्ट्रीय जनता दल के नेता मनोज झा ने तो उनकी आलोचना में बेहद कड़े शब्दों तक का इस्तेमाल किया और कहा कि उनके पास उपलब्धि बताने को कुछ नहीं है, तो ये सब कर रहे हैं.

समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव
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समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव

यूपी की पहचान कितनी बदली?

वहीं दूसरी ओर समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव ने योगी आदित्यनाथ की भाषा पर तल्ख़ टिप्पणी करते हुए कहा, "उनकी भाषा इसीलिए बदल गई है क्योंकि उत्तर प्रदेश की जनता अब बदलाव और ख़ुशहाली चाहती है. जिस तरह से काम समाजवादी सरकार में हो रहे थे, उन्हें दोबारा चाहती है."

योगी आदित्यनाथ ने क़ानून व्यवस्था के मुद्दे पर एक और बयान दिया जिसकी चर्चा भी इसी संदर्भ में हो रही है. अलीगढ़ में हुई एक रैली में उन्होंने कहा, "पहले उत्तर प्रदेश की पहचान अपराध और गड्ढों से होती थी. पहले हमारी बहनें और बेटियां सुरक्षित नहीं थीं. यहां तक कि भैंस और बैल भी सुरक्षित नहीं थे. आज ऐसा नहीं है."

इसी भाषण में उन्होंने आगे कहा, "पूर्वी उत्तर प्रदेश में इस प्रकार की समस्या नहीं थी, पर पश्चिमी उत्तरप्रदेश में ये समस्या थी. क्या आज कोई बैलगाड़ी के बैल या किसी भैसें को, या किसी बालिका को जबरन उठा सकता है? आज तो वो अपराधी गले में तख़्ती टांगकर थाने जाते हैं कि साहब बख़्श दो, हम सब्ज़ी बेच करके अपने बालक को पाल लेंगे."

जानकारों के मुताबिक, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के ये बयान सीधे तौर पर एक वर्ग विशेष को लक्ष्य करके दिए जा रहे हैं और इसके पीछे उनका मक़सद है कि राज्य में सामाजिक ध्रुवीकरण का माहौल बने.

लखनऊ में वरिष्ठ पत्रकार शरत प्रधान कहते हैं, "इसका सीधा मतलब है कि पश्चिमी यूपी में जाटों को साल 2013 की याद दिलाना. किसान आंदोलन की वजह से ऐसे तमाम प्रयास अब तक विफल हो चुके हैं, लेकिन बार-बार प्रयास करना ये अपना धर्म समझते हैं."

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'ये बयान बताते हैं कि बीजेपी ने कोई काम नहीं किया'

समाजवादी पार्टी के नेता और विधायक उदयवीर सिंह कहते हैं कि उनके ये बयान इस बात के परिचायक हैं कि उन्होंने पांच साल में कोई काम नहीं किया.

उदयवीर सिंह कहते हैं, "योगी जी ने पांच साल सरकार चलाई, पांच बजट इस्तेमाल किए, लेकिन उपलब्धि के नाम पर उनके पास कुछ नहीं है. यदि वो पिछली सरकार में अपराध की ही बात करते हैं तो ये बताएं कि उन्होंने अपराधियों को क्या सज़ा दी. राशन अब्बाजान वाले खा जाते थे तो उन्होंने काला बाज़ारी करने वाले कितने लोगों को जेल भेजा? जिस सरकार के प्रमुख को अपने काम के बारे में बातें करना चाहिए वो समाज को बांटने का काम रहा है. योगी जी विज़न वाले नेता तो थे नहीं, लेकिन पिछली सरकार को देखकर ही कुछ कर लिए होते तो उनके पास बताने के लिए काफ़ी कुछ होता."

विपक्ष का आरोप है कि योगी सरकार किसान आंदोलन, कोविड में हुई मौतों, डेंगू के प्रकोप, बेरोज़गारी, महंगाई जैसे मुद्दों से ध्यान हटाने के लिए इस तरह की बातें कर रही है.

कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू कहते हैं, "सरकार के कामकाज से समाज का हर तबका नाराज़ है. ध्रुवीकरण इनका सबसे कारगर अस्त्र है. पूरे चुनाव को सांप्रदायिक स्थिति में लाने का इनका प्रयास है, लेकिन यूपी का नौजवान इनसे नौकरियों के बारे में सवाल पूछने के लिए तैयार बैठा है."

योगी आदित्यनाथ के निशाने पर सबसे ज़्यादा समाजवादी पार्टी और उसके नेता अखिलेश यादव हैं. जानकारों के मुताबिक, बीजेपी समाजवादी पार्टी को ही मुख्य रूप से लड़ाई में मान रही है, इसलिए निशाने पर भी वही है.

पूर्व मंत्री और समाजवादी पार्टी के नेता अभिषेक मिश्र कहते हैं, "कार्यकाल लगभग पूरा करने के बाद भी यदि आपको प्रचार के लिए फ़्लाईओवर बंगाल से उधार लेना पड़ रहा है तो वो सरकार धर्म और जाति के आधार पर बांटने का ही काम करेगी. यह सरकार हर मोर्चे पर विफल रही है और इसे पता है कि इन्हें वापस सत्ता में नहीं आना है."

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'योगी सरकार ने कोई भेदभाव नहीं किया'

लेकिन विपक्ष के ऐसे आरोपों को भारतीय जनता पार्टी के नेता सिरे से ख़ारिज करते हैं.

बीजेपी प्रवक्ता हरिश्चंद्र श्रीवास्तव कहते हैं कि विपक्ष के पास कहने को कुछ नहीं है, इसलिए वह ध्रुवीकरण का आरोप लगा रहा है.

वो कहते हैं, "योगी जी की सरकार के यूपी में विकास कार्य अप्रतिम हैं. एअरपोर्ट, विश्वविद्यालय, कॉलेज, मेट्रो ये सब योगी जी ने दिया है. राज्य भर में एक्सप्रेसवे का जाल बिछा दिया गया है.''

उनके अनुसार, ''राज्य में औद्योगिक निवेश हो रहा है. गन्ना किसानों को पिछली सरकार की तुलना में कहीं ज़्यादा भुगतान किया गया. दरअसल, विकास के जितने काम हुए हैं, उन्हें देखकर विपक्ष बौखलाया हुआ है. जो लोग केवल मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति करते हैं वो सच का सामना करने में तिलमिला क्यों जाते हैं. मुलायम सिंह ने बड़े फ़ख़्र के साथ कहा था कि 16 कारसेवक गोली से मरे थे और ज़रूरत पड़ने पर मैं और भी गोली चलवाता. तो जब सच का सामना करना पड़ता है तो ये लोग घबराने लगते हैं."

हरिश्चंद्र श्रीवास्तव दावा करते हैं कि बीजेपी की सरकार में किसी के साथ भी भेदभाव नहीं हुआ.

उनके मुताबिक, "मुझे तो सपा के मुस्लिम नेताओं ने बताया है कि उनके इलाक़ों में मुस्लिम समुदाय के लोगों को सरकारी योजनाओं का सबसे ज़्यादा लाभ मिला. तो मुसलमानों के साथ या किसी भी समुदाय के साथ योगी जी की सरकार ने कोई भेदभाव नहीं किया."

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, योगी आदित्यनाथ

'चुनाव तक ऐसी बातें होती रहेंगी'

जहां तक ध्रुवीकरण का सवाल है तो जानकारों के मुताबिक, बीजेपी चुनाव तक ऐसी कोशिश करती रहेगी और चुनावों की दिशा को ध्रुवीकरण की ओर ज़रूर मोड़ेगी.

अब्बाजान जैसे योगी आदित्यनाथ के बयान की तुलना राजनीतिक जगत में साल 2017 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस भाषण से की जा रही है जिसमें उन्होंने कहा था, "गांव में अगर क़ब्रिस्तान बनता है तो गांव में श्मशान भी बनना चाहिए. अगर रमज़ान में बिजली मिलती है, तो दीवाली पर भी बिजली मिलनी चाहिए. भेदभाव नहीं होना चाहिए."

लेकिन वरिष्ठ पत्रकार सिद्धार्थ कलहंस कहते हैं कि इन दोनों बयानों में काफ़ी अंतर है और इन बयानों के राजनीतिक प्रभाव में भी फ़र्क दिखेगा.

सिद्धार्थ कलहंस के मुताबिक, "क़ब्रिस्तान-श्मशान उस वक़्त इसलिए चल गया था क्योंकि तब बीजेपी विपक्ष में थी और चुनाव से कुछ ही समय पहले कई जगह क़ब्रिस्तान की बाउंड्री बन रही थी. लोगों को दिख रहा था, इसीलिए उसका असर भी दिखा. आज आप सत्ता में हैं. आपको उपलब्धियां गिनाने की ज़रूरत है.''

वो कहते हैं, ''वैसे अब्बाजान बेहद सतही बात है. मज़ाक उड़ रहा है. मीम बनने लगे हैं और इसका असर हल्का हो गया है. दूसरी बात ये कि ऐसे मुद्दे बहुत देर तक क़ायम नहीं रह पाते. क़ब्रिस्तान-श्मशान की तरह अब्बाजान भी ऐसा जुमला बन जाएगा कि आप चुनाव जीत जाएंगे, ऐसा मुश्किल है. इसका कोई मारक असर नहीं होने वाला."

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बीजेपी जिस तरीक़े से चुनावी मुद्दे को ध्रुवीकरण की ओर मोड़ने की कोशिश कर रही है, विपक्षी दल उनके जाल में उलझते भी दिख रहे हैं. प्रियंका-राहुल के बाद आम आदमी पार्टी के नेताओं का मंदिर जाना, बहुजन समाज पार्टी की सभाओं में 'जय श्रीराम' का उद्घोष होना और समाजवादी पार्टी नेता अखिलेश यादव का कई बार ख़ुद को 'अधिक हिन्दू और धार्मिक' के रूप में दिखाने की कोशिश को इसी रूप में देखा जा रहा है.

लेकिन सिद्धार्थ कलहंस इसकी वजह कुछ और बताते हैं, "दरअसल, विपक्ष चाह रहा है कि उसके ऊपर मुस्लिमपरस्त होने का ठप्पा न लगे. यह वोटों के ध्रुवीकरण को बचाने का प्रयास है. दिलचस्प बात यह है कि ऐसे मामलों में मुसलमानों की तरफ़ से कोई प्रतिक्रिया नहीं हो रही है. इससे पहले भी कई मामलों में मुस्लिम समुदाय में एहतियात बरता जा रहा है. दूसरे, विपक्ष के लोग इसलिए धार्मिक बातें कर रहे हैं ताकि बीजेपी से यह टैग छीना जा सके कि सिर्फ़ वही हिन्दुओं की रक्षक है."

सिद्धार्थ कलहंस कहते हैं कि यह शायद पहला चुनाव है जिसमें मुसलमान ग़ायब है क्योंकि न तो कोई नेता चादर चढ़ा रहा है, न कोई उलेमा के घर जा रहा है और न ही कोई उनके इलाकों में ख़ासतौर पर सम्मेलन कर रहा है.

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