BJP को अचानक क्यों बदलनी पड़ी पश्चिम बंगाल में TMC को मात देने की रणनीति?
नई दिल्ली- पश्चिम बंगाल में 2021 के विधानसभा चुनावों के लिए भारतीय जनता पार्टी ने कम से कम 250 सीटें जीतने का लक्ष्य तय किया है। 294 सदस्यों वाली विधानसभा के मद्देनजर बीजेपी का 'मिशन 250' बहुत बड़ा लक्ष्य है। इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए ही बीजेपी ने टीएमसी समेत कांग्रेस और सीपीएम से भी नेताओं को पार्टी में शामिल कराने का एक अभियान चलाया था। पार्टी को इसमें काफी कामयाबी भी मिली और कई विधायक, काउंसिलर टीएमसी के अलावा बाकी विपक्षी पार्टियों को तोबा कहकर भाजपा में शामिल हुए भी। लेकिन, पार्टी ने अचानक इस अभियान पर ब्रेक लगाने का फैसला किया है। अब यह समझने वाली बात है कि आखिर पार्टी को किन मजबूरियों के चलते ऐसा फैसला करना पड़ा है।

'मिशन 250' पूरा करना है लक्ष्य
2019 के लोकसभा चुनाव में पश्चिम बंगाल में भाजपा को मिले 40.5 फीसदी वोट शेयर ने पार्टी के नेताओं से लेकर कार्यकर्ताओं तक का हौसला कई गुना बढ़ा दिया है। लोकसभा में पार्टी अपने सांसदों की संख्या 2 से 18 कर चुकी है, अब लक्ष्य विधानसभा में 6 विधायकों की संख्या को बढ़ाकर 250 तक ले जाने का है। इस लोकसभा चुनाव ने असल में बंगाल की दशकों की राजनीति की दशा और दिशा ही बदल दी है। ममता बनर्जी की टीएमसी सांसदों का ग्राफ 34 से घटकर 22 रह गया है, कांग्रेस 4 से कम होकर आधी बची है और 34 साल तक एकतरफा राज कर चुके सीपीएम या लेफ्ट फ्रंट का खाता भी नहीं खुला है। 2021 के विधानसभा चुनाव के लक्ष्य को लेकर पश्चिम बंगाल में बीजेपी के प्रभारी महासचिव कैलाश विजयवर्गीय कहते हैं, "लोकसभा चुनाव में हमने 23 का टारगेट र

टीएमसी नेताओं की एंट्री पर ब्रेक!
अभी हाल तक कैलाश विजयवर्गीय दावा कर रहे थे कि सीरीज में टीएमसी के एमएलए और बाकी नेताओं-कार्यकर्ताओं को भाजपा में शामिल कराने के कई एपिसोड देखने को मिलेंगे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक चुनाव रैलियों में 40 टीएमसी विधायकों के संपर्क में होने की बात कर रहे थे। लेकिन, पार्टी ने अपनी इस रणनीति को अचानक रोक दिया है। एक सीनियर बीजेपी नेता ने नाम नहीं लेने की शर्त पर बताया है कि, "कुछ समय के लिए टीएमसी नेताओं को पार्टी में शामिल करना रोक दिया गया है, खासकर विधायकों और वरिष्ठ नेताओं को। अब टीएमसी नेताओं को पार्टी में शामिल करने से पहले क्रॉस चेक मेकेनिज्म की व्यवस्था शुरू की जाएगी।" उन्होंने साफ किया कि, "बीजेपी में सिर्फ उन्हें शामिल किया जाएगा, जो अच्छे नेता हैं, जिनकी जनता में छवी अच्छी है और जिनके पास संगठन चलाने का हुनर है।"

बीजेपी को क्यों बदलनी पड़ गई रणनीति?
दरअसल, बीजेपी में हाल ही में शामिल किए टीएमसी एमएलए मनिरुल इस्लाम का काफी विरोध हुआ है। बीजेपी कार्यकर्ताओं और नेताओं की शिकायत है कि मनिरुल इस्लाम जैसे लोगों की वजह से ही भाजपा को वहां संकटों का सामना करना पड़ा है। इसलिए, उनकी एंट्री को बंगाल के कार्यकर्ता हरगिज पचाने के लिए तैयार नहीं हो रहे थे। बंगाल इकाई में अपनी एंट्री के खिलाफ मचे बवाल पर इस्लाम ने खुद से इस्तीफे की भी पेशकश की थी। अंत में पार्टी के बड़े नेता भी मानने लगे कि यह फैसला गलत हो गया और पार्टी जिस चीज का विरोध करके ममता बनर्जी का सामना करना चाहती है, अगर वैसे ही लोग पार्टी में शामिल हो जाएंगे, तो कार्यकर्ता क्या मुंह लेकर लोगों के बीच जाएंगे। बीजेपी के एक सीनियर नेता ने भी माना है कि, उन्हें शामिल करने से आम लोगों के बीच गलत मैसेज गया है और "हम बेहतर विकल्प के रूप में उभरना चाहते हैं, टीएमसी का प्रतिरूप बनकर नहीं।"

परफॉर्मेंस के आधार बनेगी सीटों कैटेगरी
सूत्रों के मुताबिक बीजेपी लोकसभा चुनाव में पार्टी की परफॉर्मेंस के आधार पर पश्चिम बंगाल में विधानसभा सीटों की 'ए, बी, सी और डी' कैटेगरी बनाएगी। 'ए' कैटेगरी में वो 130 सीटें होंगी जहां पार्टी ने लोकसभा चुनाव में लीड किया है। 'बी' कैटेगरी में वो 65 सीटें हैं, जहां मामूली अंतर से पार्टी दूसरे नंबर पर रही है। इसी तरह जहां पार्टी दूसरे नंबर पर तो रही, लेकिन हार का मार्जिन बहुत ज्यादा था, उसे 'सी' कैटेगरी और जिन सीटों पर वह तीसरे नंबर पर रही उसे 'डी' कैटेगरी में रखा गया है। पार्टी 'मिशन 250' लक्ष्य हासिल करने के लिए 'ए, बी और सी' कैटेगरी की सीटों पर ही ज्यादा जोर लगाएगी और इन सभी सीटों को जीतने के लिए अभी से काम करेगी। इसी कड़ी में विजयवर्गीय ने भी कहा है कि, "हम जिलों में और जिस इलाके में कमजोर हैं, वहां पार्टी संगठन में सुधार करेंगे। जिन जिलों में और स्थानीय इलाकों में जहां नेताओं को सिर्फ नियुक्ति के लिए नियुक्त किया गया है, वहां उन्हें हटाकर अच्छे और कुशल लोगों को लाया जाएगा। लेकिन, जो अच्छे संगठनकर्ता और नेता काफी समय से हैं उन्हें नई कमेटियों में जगह दी जाएगी। "

इलाके के मुताबिक बनेगा मुद्दों का रोडमैप
बीजेपी की रणनीति ये है कि वह बंगाल के अलग-अलग हिस्सों के मुताबिक अलग-अलग मुद्दों पर जोर देगी। मसलन बीजेपी के एक नेता ने बताया है कि जैसे सिंगूर में उसका जोर इंडस्ट्री बढ़ाने पर रहेगा, जहां ममता बनर्जी की निगेटिव पॉलिटिक्स के चलते टाटा मोटर्स अपना प्लांट नहीं लगा पाया। इसी तरह बॉर्डर इलाकों में शरणार्थियों को नागरिकता देने वाला सिटिजेनशिप (अमेंडमेंट) बिल पर जोर रहेगा और घुसपैठियों को बाहर करने के लिए एनआरसी मुख्य चुनावी मुद्दा होगा। ऐसे ही किसी जगह पर खेती और किसानों के मुद्दों पर बात की जाएगी। बीजेपी इस योजना पर भी काम कर रही है कि उसके 18 सांसद, 6 विधायक और नगरपालिका सदस्य आम लोगों तक भाजपा के विकास एवं गुड गवर्नेंस के एजेंडे को पहुंचाकर उनका पार्टी प्रति भरोसा कायम करें। पार्टी को लगता है कि इन मुद्दों के जरिए वह टीएमसी के हथकंडों को मात दे सकती है।
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