भारत में तबाही मचाने वाले आक्रमणकारियोंं के नाम पर मिसाइल का नाम क्यों रखता है पाकिस्तान?
नई दिल्ली। भारत और पाकिस्तान के बीच मिसाइल बनाने को लेकर लगातार होड़ मची रहती है, कई दशकों से दोनों देशों एक दूसरे के खिलाफ मिसाइल विकास के कार्यक्रम में लगे रहते हैं। हालांकि दोनों देश यह कहते हैं कि वह मिसाइलों को विकास किसी भी स्थिति निपटने के लिए करते हैं। पाकिस्तान में 1987 में मिसाइल निर्माण का कार्यक्रम शुरु हुआ था, यह कार्यक्रम भारत के मिसाइल कार्यक्रमों के जवाब में शुरू किया गया था। इस मिसाइल कार्यक्रम में तत्कालीन प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो ने काफी तेजी से और आक्रामकता के साथ आगे बढ़ाया था। उन्होंने यह अभियान भारत पाक के बीच मिसाइल के बीच बढ़ रहे अंतर को कम करने के लिए शुरू किया था। 1990 में भारत ने पृथ्वी-1 मिसाइल का परीक्षण किया था।

मुस्लिम हमलावरों ने के नाम पर मिसाइल
पाकिस्तान की आक्रामक सैन्य रणनीति और लगातार न्युक्लियर हथियारों का निर्माण ना सिर्फ भारत बल्कि दुनियाभर के देशों के लिए एक बड़ी चिंता का विषय है। पिछले कुछ समय में पाकिस्तान ने अपने मिसाइल अभियान में काफी जबरदस्त इजाफा किया है और उसे इसमे सफलता भी मिली है। पाकिस्तान अब्दाली, गजनवी, गौरी, शाहीन, बाबर नाम की तमाम मिसाइलों का निर्माण कर चुका है। लेकिन इन सबके बीच एक सवाल यह उठता है कि पाकिस्तान ऐसे लोगों के नाम पर ही अपने मिसाइल कार्यक्रम का नाम क्यों रखता है जिसने भारत पर समय-समय पर आक्रमण करके उसकी ऐतिहासिक, सांस्कृति औऱ धार्मिक धरोहर को नुकसान पहुंचाया। महमूद गजनवी, मोहम्मद गोरी औऱ तैमूर लंग ने भारत में बर्बर आक्रमण करके काफी खून खराबा किया, लूटपाट की और स्थानीय लोगों को मौत के घाट उतार दिया। इन लोगों ने मंदिरों को तोड़ा, लोगों का जबरन धर्म परिवर्तन कराया गया।

पहुंचाया बड़ा नुकसान
गजनवी ने 11वीं शताब्दी में भारत पर हमला किया और उसने भारत पर लगातार 17 बार हमला किया, उसने सोमनाथ मंदिर को भी तोड़ा और जमकर लूटपाट की। वहीं अहमद शाह अब्दाली ने 18वीं शताब्दी में सिखों को बड़ी संख्या में मौत के घाट उतारा। 1748 से 1765 के बीच उसने भारत पर 7 बार हमला किया। । वहीं तैमूर लंग ने 1398 में दिल्ली पर हमला किया और बड़ी संख्या में लोगों को मौत के घाट उतार दिया। हालांकि बाबर इन आक्रमणकारियों से अलग था, लेकिन उसने भी कई मंदिरों को तोड़ा।

स्कूल के पाठ्यक्रम में भी मुस्लिम शासक
ऐसे में पाकिस्तान में मिसाइल कार्यक्रम का नाम ऐसे आक्रमणकारियों के नाम पर रखे जाने के पीछे की वजह को अगर तलाशे तो यह बात सामने आती है कि पाकिस्तान आज भी इस सोच से बाहर निकलने को तैयार नहीं है कि मुस्लिम शासकों ने जो भी किया सही किया और वह सही थे। यहां तक कि पाकिस्तान में जो इतिहास पढ़ाया जाता है उसमे भी मुगल काल के दौरान इस्लामिक काल के बारे में ज्यादा पढ़ाया जाता है बजाए वेदिककाल या स्वतंत्रता आंदोलन के।
मुस्लिम शासको को बेहतर बताने का प्रयास
महात्मा गांधी का भी जिक्र पाकिस्तान की स्कूल की किताबों में बहुत कम मिलता है, उनके अलावा अन्य स्वतंत्रता सेनानियों का भी जिक्र बहुत कम है। यहां के पाठ्यक्रम के जरिए यह बताए जाने की कोशिश होती है कि मुस्लिम शासक बेहतर थे औऱ हिंदुओं ने उनसे सत्ता छीन ली। 1947 के विभाजन के बाद पाकिस्तान का निर्माण हुआ और यह पूरी तरह से इस्लाम धर्म को लेकर हुआ। ऐसे में इन आक्रमणकारियों के नाम पर मिसाइल का नाम रखकर एक बार फिर से पाकिस्तान उसी सोच को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहा है कि मुस्लिम शासक बेहतर थे।












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