OPINION: तेलंगाना की राजनीति में BJP अध्यक्ष की दौड़!
OPINION: जी किशन रेड्डी के केंद्रीय मंत्री बनने के बाद से तेलंगाना बीजेपी फुल टाइम प्रदेश अध्यक्ष का इंतजार कर रही है। जुलाई 2023 में, किशन रेड्डी ने बंदी संजय कुमार के बाद प्रदेश अध्यक्ष का पद संभाला। हालांकि, साल 2023 में हुए विधानसभा चुनाव के ठीक पहले उनकी नियुक्ति के बाद पार्टी को डर था, लेकिन 2024 लोकसभा चुनाव में पार्टी 8 सीटें जीतने में सफल रही।
पार्टी को दमदार चेहरे की है तलाश
2024 में अच्छे परिणाम आने के बावजूद पार्टी बिखरती हुई दिख रही है। Greater Hyderabad Municipal Corporation Election चुनावों और उसके बाद हुए उपचुनावों में मिली सफलता के बाद पार्टी ने 2021 में प्रमुख विपक्षी दल की जगह खुद को स्थापित करने का दावा किया था, लेकिन पॉलिटिकल पोजिशनिंग के लिहाज से इस वक्त भाजपा तीसरे पायदान खड़ी है।

तेलंगाना की राजनीति में एटाला राजेंद्र का उभरता हुआ चेहरा
कभी एटाला राजेंद्र ने तेलंगाना की राजनीति के जाने माने चेहरा मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के विरुद्ध चुनाव लड़ने का साहस किया, जिसकी चर्चा पूरे देश में हुई। एटाला ने सियासत में छात्र जीवन से ही बहुत संघर्ष किया है।
एटाला राजेंद्र की छवि एक कद्दावर नेता की है। वे मंत्री रह चुके हैं, 7 बार के विधायक हैं और वर्तमान में मल्काजगिरी से सांसद हैं। इस वक्त एटाला की गिनती तेलंगाना बीजेपी अध्यक्ष की रेस में सबसे प्रबल दावेदारों में है। 60 वर्षीय एटाला राजेंद्र के BRS से बीजेपी में शामिल होने और आलाकमान द्वारा उन्हें मिल रहे तवज्जो से पार्टी का एक धरा असहज महसूस करते हैं। उन्होंने बीआरएस में 18 साल राजनीति की है, इसलिए उनका राजनीति में लंबा अनुभव और पकड़ रहा है। इस लिहाज से भी उनकी दावेदारी प्रबल हो जाती है।
रेस में ये नाम भी हैं शामिल
निज़ामाबाद के सांसद, अरविंद धर्मपुरी का नाम भी प्रदेश अध्यक्ष के रेस में है। अरविंद उस परिवार से ताल्लुक रखते हैं, जो पिछले तीन दशक से जिला और राज्य की राजनीति में सक्रिय है। उनके पिता, धर्मपुरी श्रीनिवास पहली बार 1989 में विधायक के रूप में चुने गए और 2004-2009 के बीच कांग्रेस शासन के दौरान मंत्री के रूप में काम किया। अरविंद के दादा धर्मपुरी वेंकट राम भी जनसंघ का हिस्सा थे। 2019 लोकसभा चुनाव से पहले अरविंद धर्मपुरी बीजेपी में शामिल हुए और और अपना पहला चुनाव तेलंगाना के तत्कालीन मुख्यमंत्री KCR की बेटी और बीआरएस की मौजूदा सांसद के कविता के खिलाफ जीता। पार्टी के एक वर्ग को उनके कट्टर हिंदुत्ववादी नेता की छवि पसंद है, लेकिन शहरी मतदाताओं के साथ कनेक्शन की कमी उनकी दावेदारी के लिए चुनौती बन सकती है। इसलिए उनकी दावेदारी को कमजोर आंकी जा सकती है।
भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और महबूबनगर सांसद डीके अरुणा के नाम की भी खूब चर्चा हो रही है। 2009-2014 के बीच विभिन्न मंत्रालयों की जिम्मेदारी संभाल चुकीं अरुणा की पार्टी आलाकमान से करीबी दूसरे नेताओं के लिए बड़ा चुनौती बन गई हैं। दरअसल, जिन तीन दावेदारों की चर्चा हो रही है, उनमें से दो, एटाला और अरुणा, उन लोगों में से थे, जिन्हें 2024 में केंद्रीय मंत्री के रूप में पदोन्नत किए जाने की उम्मीद थी और इसलिए उनमें से एक को पार्टी प्रमुख की जिम्मेवारी देने की संभावना है। इन सबके बीच, रघुनंदन राव और रामचंदर राव जैसे नाम भी अक्सर सुर्खियों में रहते हैं।
जातिगत समीकरण और बीसी वोट पर भी भाजपा की नजर
भारतीय जनता पार्टी ने एक कई बार ऐलान किया है कि अगर पार्टी सत्ता में आती है तो राज्य की जनता बीसी नेता को सीएम के तौर पर कार्यभार संभाल सकते हैं। तेलंगाना में ओबीसी मतदाताओं की हिस्सेदारी 50 फीसदी से अधिक है और यदि पार्टी इस समुदाय को अपने पक्ष में करने में कामयाब होती है, तो यह निर्णायक साबित होगा। इस लिहाज से रेड्डी समुदाय से आने वाली डीके अरुणा जैसी नेता के लिए मुश्किलें बढ़ गई हैं। भाजपा के पिछले 2 अध्यक्ष, मुन्नुरू कापू (ओबीसी) और रेड्डी समुदायों से थे, इसलिए, इनमें से किसी एक का अगला अध्यक्ष बनना राज्य की सियासत में हलचल पैदा कर सकता है। वैसे, जातिगत समीकरणों और पार्टी के अतीत पर गौर करें तो, एटाला राजेंदर, अरविंद और अरुणा से आगे निकल सकते हैं।
क्या सेक्युलर फेस पर दांव खेलेगी पार्टी?
तेलंगाना BJP के शीर्ष सूत्रों की मानें तो, पार्टी इस बार 'धर्मनिरपेक्ष' नहीं तो किसी 'अर्ध-धर्मनिरपेक्ष' चेहरे की तलाश में है। वनइंडिया से बातचीत करते हुए बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, 'इस बार जो भी अध्यक्ष होगा वह धर्मनिरपेक्ष होगा। मेरे जैसे कट्टर चेहरे को किनारे लगाया जा सकता है। इस बात को याद रखियेगा। यह एक निर्णायक कारक बन जाता है, तो एटाला जैसा कोई व्यक्ति, जो किशन रेड्डी की तरह, बीआरएस के साथ रहने के दौरान अपनी छवि सेक्युलर नेता के रुप में स्थापित करने में कामयाब हुए हैं, वे एक दमदार विकल्प हो सकते हैं।
हालांकि तेलंगाना में भाजपा के भविष्य को लेकर अभी भी कई सवालों का जवाब आना बाकी है, लेकिन पार्टी को जल्द अपना विजन साफ करना चाहिए और राज्य के सुदूर क्षेत्रों में प्रवेश करने के लिए अपनी राजनीतिक ताकत का इस्तेमाल करना चाहिए। अध्यक्ष की नियुक्ति इस दिशा में पहला कदम हो सकता है और यही राज्य में भगवा दल का भविष्य तय करेगा। अगर नवनियुक्त प्रदेश अध्यक्ष जमीनी स्तर पर पार्टी को एकजुट रखने में कामयाब होते हैं, तो तेलंगाना में बीजेपी के लिए अपार संभावनाएं हैं, वरना बीआरस जैसी कैडर आधारित दल जगह लेने के लिए तैयार बैठी है।
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